इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 10 जून 2013

भूख का दर्द

  • दादूलाल जोशी ' फरहद'
मैं अठारह दिसम्बर से चौबीस दिसम्बर तक गुरूघासीदास जयंती के उपलक्ष्य  में उपवास कर रहा हूं । मेरा इतना ही कहना था कि दोनों मित्र ठहाका मार कर हंस पड़े. उनकी हँसी में खिल्ली उड़ाने का भाव था. एक क्षण मैं हक्‍का - बक्‍का रह गया. सोचा था कि जिस संजीदगी के साथ मैं अपनी बातें रख रहा हूं, उसे सुनकर मित्र लोग मुझे शाबासी देंगे. मेरा समथर्न करेंगे किन्तु उनका व्यवहार ही निराला था. इससे मैं स्तबध तो था ही कुछ शमर् भी महसूस कर रहा था.
यह काफी हाऊस का एक कमरा था, जहां मेरे साथ रमेश बन्धे और दिनेश देशलहरा बैठे हुए थे. हम तीनों नौकरी और घर गृहस्थी के काम से निवृत होकर शाम छ: बजे एकत्रित होते और कभी पार्क में, कभी सड़कों पर पैदल चलते हुए या कभी काफी हाऊस में बैठकर सुख - दुख बांट लिया करते थे. उस दिन भी हम तीनों बैठे हुए थे. रमेश बन्धे ने काफी का आर्डर दिया और मेरे मुंह से उपवास वाली बात निकल गई.
- अरे यार ! कुर्रे जी, तुम्हारा भी जवाब नहीं. इस वैज्ञानिक युग में भी तुम अंधविश्वास पर भरोसा करते हो.'' रमेश बन्धे ने कहा.
-मैं अंधविश्वासी नहीं हूं. लेकिन मेरी बात तो सुनो.'' मैंने सफाई देने वाले अन्दाज में कहा.
- हां बोलो...।'' उन दोनों ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा.
बात उन दिनों की है जब मैंने एम.ए. के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. मेरे माता - पिता जीवित थे. हमारी चालीस एकड़ जमीन गांव में थी. जिनमें भरपूर फसल होती थी. चार भाईयों में मैं तीसरा हूं. काँलेज से निकलने के बाद मेरे मन में कुछ महान कार्य करने का सनक सवार हो गया था. मैं सोचता था - कुछ ऐसा महान कार्य करूं, जिसके फलस्वरूप लोग मुझे हजारों वर्षों तक याद रखें. इसी धुन में दोस्तों के साथ यहां - वहां घूमता रहता था.
मैंने अपने मन में तय  किया कि क्‍यों न समाज के मजबूर और दुखी लोगों की सहायता करके अपना काम प्रारंभ करूं. अत: जहां से भी इस तरह के पीड़ित लोगों की खबर आती, मैं अपने एक दो मित्रों के साथ वहां पहुंच  जाता और पीड़ितों की भरसक मदद करता. पैसे की मेरे पास कमी नहीं थी. दो साल ऐसे ही गुजर गये. मैं समाज में काफी लोकप्रिय  हो गया था.
एक दिन अखबार में पढ़ा कि बरखापुर के आसपास के गांवों में पेचीस से सैकड़ों लोग कालकवलित हो रहे हैं. मैं स्वयं को रोक नहीं सका. एक मित्र को साथ लेकर दोपहर में ही बरखापुर के लिए रवाना हो गया. मेरे गांव से बरखापुर की दूरी लगभग डेढ़ सौ कि.मी. है. बस से हम दोनों चले थे. रात दस बे हम वहां पहुंच  गये. वहां मालूम हुआ कि जिन गांवों में पेचीस फैली है, वह तो बरखापुर से बीस कि.मी. आगे हैं. वहां बैलगाड़ी या सायकल से ही पहुंचा जा सकता था. जंगली और पहाड़ी इलाका था.
किसी तरह हमने सायकल की व्यवस्था की और चल पड़े. पहाड़ी इलाका होने के कारण बार - बार सायकल से उतरना पड़ता था. गर्मी का मौसम था. दो घंटे में हम एक गांव में पहुंचे. गांव के बाहर डाक्‍टरों का टेन्ट लगा हुआ था. रात हमने एक टेन्ट में गी गुजारी. सुबह गांव वालों से मिले. वहां की स्थिति ददर्नाक थी. लगभग पचास लोगों की मृत्यु हो चुकी थी. हमने देखा गांव वाले गड्ढ़ों और नाले का पानी पी रहे हैं. पीने के पानी की व्यवस्था थी नहीं. मेरे पास एक हजार रूपये थे. सरपंच  की सहायता से हमने रूपये पीड़ित परिवारों में बांट दिए. उन्हें पानी उबालकर पीने की सलाह दी. वैसे डाक्‍टरों एवं नर्सों की टीम ने स्थिति पर काबू पा ली थी. मैंने तय किया कि इस गांव में नलकूप लगवा दिये जाये. इस कार्य हेतु जिलाधीश महोदय  से चर्चा करने की जरूरत थी. दिन भर हम पीड़ित लोगों से मिलते रहे. शाम को हम दोनों लौट पड़े.
बरखापुर कस्बे में हम पहुंचे तो रात 9 बज चुके थे. वहां से अपने गांव लौटने का कोई साधन रात में था नहीं. अत: रात वहीं गुजारना जरूरी हो गया. हम कहां ठहरे ? यही चिन्ता सता रही थी. तभी मेरे साथी ने कहा - कुर्रे भै¸या, मेरे दूर के एक रिश्तेदार यहां रहते हैं. कुछ इंतजाम हो जायेगा.''
- और कभी रिश्तेदार के घर आये हो कि नहीं.''  मैंने पूछा.
- आया तो कभी नहीं, माँ ने बताया था कि यहां मेरे मामा के साले साहब रहते हैं.'' मेरे साथी ने कहा.
- ठीक है, चलो.'' मैंने आखिरकार जाना स्वीकार कर लिया. मकान कस्बे के एक मुक्‍कड़ में था. उस मोहल्‍ले में सभी मकान मिट्टी के थे. जिनमें खपरैलों की छतें थीं. सचमुच यह मेहनतकश लोगों का मुहल्‍ला था. नगरपालिका के द्वारा लगाये गये स्ट्रीट लाइट के प्रकाश में हम गंदे पानी की पतली नाली के ऊपर चलते हुए एक संकरी गली में घुसे. नाली से बदबू आ रही थी. गली में रोशनी कम थी. मुझे लगा कि मैं कोई अंधेरी सुरंग में जैसे घुस गया हूं. हम कुछ ही कदम चले थे कि गली की चौड़ाई बढ़ गई और बांई ओर एक छोटा सा आंगन वाला मकान दिखाई दिया. यही जगतू बंजारे का घर था. वस्तुत: जिसे मैं आंगन समझ रहा था वह मकान की छपरी (बरामदा) थी. नाली के किनारे पर बिजली का पोल था. जिसमे लगे बल्ब से पीली रोशनी निकल रही थी.
छपरी में एक खाट पर एक अधेड़ आदमी लेटा हुआ था. मेरे साथी ने आगे बढ़कर उसका चरण छुआ और अपना तथा मेरा परिचय  दिया. जगतू बंजारे ने उठते का प्रयास किया किन्तु इतने से ही वह हाँफ गया. साथ ही खांसने भी लगा. वह काफी बीमार लगता था. मैंने उसकी हालत देखकर उसे लेटे रहने को कहा. आश्‍चर्य, दुख और खुशी के मिले जुले भावों को प्रकट करता हुआ, उसने हमें पास की खाट पर बैठने को कहा.
हम दोनों खाट पर बैठ गये. मेरी खोजी नजरें घर का जायजा लेने लगी. पूरा घर गरीबी का दास्तान कह रहा था. बांई ओर रसोई घर था. जहां एक खूबसूरत अठारह - उन्‍नीस साल की गोरी चिट्टी लड़की पीढ़ा पर बैठी हुई थी और तवा पर रोटी सेंक रही थी. शायद अंगाकर रोटी थी वह. मैंने अंदाज लगाया कि हो न हो यह जगतू बंजारे की लड़की है. उससे छोटे - छोटे चार बच्‍चे उसे घेरे हुए बैठे थे. जिनमें से दो बालक और दो बालिकाएं थी.
मुझे भूख लग रही थी. सुबह से हमने कुछ भी नहीं खाया था. मैं मन ही मन सोच रहा था कि जगतू बंजारे हमें खाने के लिए जरूर कहेगा. लेकिन वह तो दूसरी ही बात कर रहा था. वह बता रहा था कि वह पिछले तीन महीने से बीमार है. उसकी पत्नी को गुजरे तीन बरस बीत गये हैं. बड़ी लड़की घर को सम्हाल रही है. एक लांघन एक फरहार करके दिन बीत रहे हैं आदि - आदि. मेरे मित्र उसकी बातें सुन रहा था लेकिन मेरा ध्यान नहीं था उधर. मुझे बार - बार भोजन की याद आ रही थी.
रसोई घर से बच्‍चों की आवाजें आने लगी थी - दीदी, पहले मुझे दो.'' सबसे छोटी लड़की ने कहा वह पांच  बरस की लगती थी.
- नहीं दीदी, मुझे पहले दो.'' यह लड़का था सात बरस का. बाकी एक लड़का और एक लड़की चुपचाप कभी अपनी दीदी के चेहरे को देखते थे तो कभी तवा के अंगाकर रोटी को. सबसे छोटे दोनों बच्‍चों में अब तू - तू, मैं - मैं होने लगी थी. चुप रहो. एक बार बड़ी लड़की ने उन्हें डांटा भी. परन्तु उनकी आवाजें बंद नहीं हुई.
शायद रोटी सिंक चुकी थी. कपड़े के सहारे लड़की ने रोटी उठाई और बच्‍चों से कहा - चलो, आंगन में....।
चारों बच्‍चे आंगन में आ गये. आंगन से लगी हुई नगर पालिका द्वारा बनाई गई गंदे पानी की पक्‍की नाली थी. आंगन बहुत छोटा था. बड़ी लड़की ने अंगाकर रोटी के पांच  टुकड़े किये और सभी बच्‍चों को एक - एक टुकड़ा बांट दिया. सभी बच्‍चें खाने लगे. रोटी काफी गरम थी. इसलिए चौथे नम्बर का लड़का हाथों में रोटी को गेंद की तरह उछाल - उछाल कर खा रहा था. अभी वह छोटा सा हिस्सा ही खाया था कि पूरा टुकड़ा हाथ से उछलकर नाली में जा गिरा. लड़के के चेहरे में हवाईयां उड़ने लगी. उसने आव देखा न ताव सबसे छोटी लड़की के हाथों से रोटी का टुकड़ा छीन लिया और पूरा का पूरा अपने मुंह में ठूंसने लगा. छोटी लड़की जोर से चिल्‍ला उठी. यह देखकर बड़ी लड़की अपना गुस्सा नहीं रोक पाई. उसने खींचकर एक तमाचा लड़के के गाल पर मारी. तमाचा पड़ते ही लड़के के मुंह से रोटी बाहर आ गई.
यह सब देखकर मैं स्वयं को रोक नहीं सका. मैंने बड़ी लड़की को डांटा - यह क्‍या कर रही हो बेबी ? छोटे बच्‍चें को क्‍यों मारती हो ? अगर रोटी छीन ही लिया तो क्‍या हुआ ?''
लड़की की आंखों से अंगारे बरस रहे थे. उसने भी क्रोध भरी ऊँची आवाज में जवाब दिया - आप यिा जानोगे भूख के ददर् को ? दो दिन से घर में चूल्हा नहीं जला था. आज एक किलो आटा लाई थी. किसी का भी हिस्सा छिनने से उसकी मौत हो सकती है.
ऐसी हृदय  विदारक घटना मेरे समक्ष्ा कभी घटी नहीं थी. मेरे अंदर दुख, लƒा एवं अफसोस की त्रिवेणी फूट पड़ी थी. मुझसे उत्तर देते नहीं बन रहा था. च लो उठो अचानक मैंने निणर्य  लिया और साथी से कहा .
- कहां ? मेरा साथी भी हOा बOा रह गया. वह इतना ही बोला.
- किसी किराने की दुकान पर, चांवल और दाल लायेंगे. मैंने Òढ़ शबदों में बोला.
- लेकिन भाई रात दस बज चुके हैं, सभी दुकानें बंद हो चुकी है. उसने थोड़ी घबराई हुई आवाज में कहा.
- दुकानें बंद हो गई है तो खुलवाई जा सकती है. तुम पास के किसी दुकान पर मुझे ले च लो. इतना कहकर मैं उठकर खड़ा हो गया.
मेरा साथी जानता था कि जब मैं किसी बात का निश्च य  कर लेता हूं तो उसे पूरा किये बगैर मानता नहीं हूं. उसने बहस करने के बजाय  साथ च लना ही उचि त समझा.
थोड़ी ही दूर पर एक दुकान थी. दुकान बंद हो चुकी थी किन्तु दुकानदार दरवाजे के पास खाट डालकर  लेटा हुआ बीड़ी पी रहा था. मेरे साथी ने ही उसे समझाया. वह सामान देने के लिए तैयार हो गया. हमने पांच  किलो चांवल, एक किलो दाल और अन्य  जरूरी वस्तुएं लेकर जगतू बंजारे के घर पहुंचे. य ह सब देखकर जगतू बंजारे की आंखों से आंसू बहने लगे. पता नहीं य ह आंसू शमर् के कारण था या अपनी असहाय  होने के कारण था वही जाने.
- ये यिा कर रहे हैं आप लोग ? यिों लाये हैं ये सब ? बड़ी लड़की ने आवेश में कहा.
- देखो बहन, हम दोनों भूखे हैं. हमारे लिए भोजन बना दो और साथ ही ब‚ों को भी खिला दो. मैंने नम्रता पवर्क उससे बोला.
- हम किसी की दान में दी गई चीजें नहीं खाते. समझे आप लोग ? लड़की लगभग चीखती हुई सी बोली.
- मैंने तुम्हें बहन कहा है. अपने बड़े भाई की बात नहीं रखोगे ? मैंने स्नेह प्रकट करते हुए उसे समझाया. अब तक लड़की की आंखों से आंसू छलक पड़े.
उसने चूल्हा जलाया और डेढ़ दो घंटे में भोजन तैयार कर दिया. मैंने सबसे पहले चारों ब‚ों को भोजन देने के लिए कहा और साथ ही उसे भी खाने कहा. वह ब‚ों को खाना खिलाई परन्तु स्वयं नहीं खाई. जब मैं मेरे साथी और जगतू बंजारे खा चुके तब वह खाना खाई. रात के लगभग दो बज चुके थे. अब हम सो गये.
सुबह वही लड़की पानी लेकर आई तो मेरी नींद खुली. आठ बज चुके थे. सब जाग गये थे. मैं ही सोया हुआ था. हाथ मुंह धोकर मैं जगतू बंजारे के पास ही बैठ गया. तब तक लड़की ने बगैर दूध की चाय  ले आई. वह मुझे चाय  थमा कर जाने लगी. मैंने कहा - बेबी जरा सुनना. वह रूक गई. मैंने आगे कहा - तुम्हारा नाम यिा है ?
- कु. कुन्ती बंजारे. उसने जवाब दिया.
- किस कक्ष्ाा में पढ़ती हो ?
- मेटि¬क के बाद पढ़ाई छोड़ दी है. सिलाई बुनाई करके भाई बहनों को पाल रही हूं. उसने सिर झुकाकर कहा.
- सुनो कुन्ती, आज से तुम मेरी बहन हो. तुम जुलाई से आगे की पढ़ाई शुरू करोगी. पूरा खच र् मैं दंूगा. मैंने प्रतीज्ञापूणर् आवाज में कहा. कुन्ती की आंखों से आंसू छलक पड़े. कृतज्ञता के आंसू. हां एक बात और कुन्ती. तुमने रात में य ही कहा था न - आप यिा जानोगे भूख के ददर् को ...? मैं कभी इस ददर् को महसूस करने का प्रयास करूंगा.
सुनकर कुन्ती ने अविश्वास भरी नजरें मुझ पर टिका दी. मैंने कहा - मैं अपने वच न पर तटस्थ हूं. इस भूख को निक्श्च त अनुभव करने का प्रयास करूंगा...।
हम दोनों मित्र वहां से लौट आये. एक सÄाह बाद मैं बरखापुर गया और सबसे पहले एक सिलाई मशीन खरीदकर कुन्ती को दिया. कुछ पैसे भी दिये.
ठीक एक महीने बाद कुन्ती की चि ट्ठी आई उसने लिखा था कि सिलाई मशीन से वह रेडीमेड कपड़े सी कर बेच ने लगी है. आमदनी ठीक है. अब पिताजी भी स्वस्थ्य  हो गये हैं और काम पर जाने लगे हैं. संभवत: मैं आगे की पढ़ाई भी कर लूंगी.
पत्र पढ़ कर मुझे बहुत अच्छा लगा. अब मुझे भूख का ददर् महसूस करना था. मैं दस वषोY से 18 दिसम्बर से 24 दिसम्बर की अवधि में उपवास रह कर भूख के ददर् को महसूस करता हूं.....।
दोनों मित्र मेरी बातें सुनकर आश्च य र् से मेरी ओर देखने लगे. रमेश बन्धे ने पूछा - फिर कुन्ती का यिा हुआ ? यिा वह पढ़ पाई. . यिा वह अब भी सिलाई का काम करती है या फिर पढ़ लिख कर नौकरी लग गई. अब वह कहां रहती हैं ?
- च लो अब य हां से, काफी वI हो चुका है. मैंने उठते हुए कहा. हम तीनों काफी हाऊस से निकल कर पैदल च लने लगे.
- कुरेर् जी, तुमने जवाब नहीं दिया. कुन्ती अब कहां है और यिा करती है ? रमेश ने फिर पूछा.
- हां यार, बताओ ने कुन्ती का यिा हुआ ? इस बार दिनेश देशलहरा ने पूछा.
मैं चुप रहा. मेरी चुप्पी से उन दोनों की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी.
- बोलो न यार, कुछ तो बोलो. दोनों ने अधीर होते हुए कहा.
- पता नहीं. मेरा संक्ष्ािÄ उत्तर था.
- यिा, तुम्हें पता नहीं ? तुम उस घटना के बाद बरखापुर गये ही नहीं ? रमेश ने विस्मय  से पूछा.
- नहीं...। मेरा संक्ष्ािÄ जवाब था.
- आखिर यिों यार, किसलिए तुमने कुन्ती का हालचाल मालूम नहीं किया ? दिनेश ने फिर प्रश्न उछाला.
- मैंने जरूरी नहीं समझा...।
अब हम तीनों के मध्य  चुप्पी छा गई. च लते - च लते हम उस च ौक पर पहुंच  गये थे जहां से हम प्रतिदिन अपने - अपने मकान का रास्ता पकड़ते थे. च ौक पर मैं रूक गया. वे दोनों भी ठहर गये. मैंने उन दोनों से हाथ मिलाते हुए कहा - अच्छा दोस्तो, अब च ले, कल फिर मिलेंगे.
मैंने अनुभव किया -  कुन्ती के बारे में जानने की उनकी लालसा प्रबल हो चुकी है. मेरी बुद्धि तकर् दे रही थी- किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करना अपराध है. मुझे भरतमुनि का नाट्य  शाÍ याद आने लगा था - धीरोदत्त नाय क के साथ दशर्क या श्रोता तादात्म्य  कर लेता है. उस अवस्था में य दि किसी प्रकार का झटका दिया जाता है तो दशर्क अथवा श्रोता घाय ल जरूर होता है.मैंने अपने प्रिय  मित्रों को ही किसी न किसी रूप में घाय ल कर दिया था. हल्का सा अपराध बोध मेरे अंदर होने लगा था. आखिरकार रमेश और दिनेश के एक एक हाथ को अपने हाथों में लेकर मैंंने कहा - मित्रों ! तुम दोनों एक कुन्ती के लिए इतने जिज्ञासु यिों हो ? तुम अगर ढ़ूंढ़ना चाहो तो तुम्हें इस देश के प्रत्येक गांव में प्रत्येक शहर में एक कुन्ती भूख के ददर् से छटपटाती हुई मिलेगी. बस, उन्हें देख सकने की क्षमता वाली आंखें चाहिए ....।
इतना कहकर मैं उनसे हाथ छुड़ा आगे बढ़ गया. मैंने पीछे मुड़ कर देखने की आवश्य कता भी नहीं समझी.

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