इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 27 जून 2013

आ अब लौट चलें




-  गोपाल सिंह कलिहारी  -

कितने ही सवाल,कितने ही अंतर्द्धद्व उसके भीतर उमड़ने - घुमड़ने लगे। वह सोफे पर यों पसर गई जैसे उसके शरीर में जान ही न हों। अकेले में बैठा व्यक्ति जब तूफान से घिर जाता है तब उसके भीतर हलचल मचने लगती है। और वह स्वत: ही बीती बातों का विश्लेषण करने लग जाता है।
पास पड़ोस के लोग न तो उसे बुलाते हैं और न ही उसके घर जाते हैं। उसके रिश्तेदार भी उससे कोसों दूर रहते हैं। जो साम्राज्य उसने खड़ा किया था, क्या वह अकेली रह गई है ?
जिस परिवेश में बच्चा पलता - बढ़ता है, माँ बाप का प्रतिबिम्ब, वह जीने का ढंग, नजरिया, व्यवहार सब कुछ परिवेश के अनुसार ढल जाता है और बचपन की नीव इतनी मजबूत होती है कि बड़े होने तक भी यथावत रहती है। दोष यही है कि वक्त रहते अपने को बदलने की कोशिश नहीं की इसलिए अपने साम्राज्य में प्रीति आग लगा बैठी।
वे बहुत सारे थे और वह अकेली। बरसों से या यूँ कहे सदियों से। वह लोगों के साथ चलने की कोशिश करती मगर चल नहीं पाती। उसे हर बार कहना पड़ता - मैं तुम्हारे साथ हूं। कोई उसकी ओर देखता नहीं था। क्योंकि लोगों को मालूम हो गया था कि वह पंचवटी की मोहनी सूर्पनखा है।
समय ने करवट बदला। उसका स्थानान्तरण सुदूर वीरान जंगल ग्राम से गुंजन आबादियों में हो गया। स्वागत के रुप में सोनू ने उसे धन्यवाद दिया।
अब उसे सन्नाटे से डर लगता है। सन्नाटे से वह चीख उठती है तो कभी धीमी आवाज में ... मैं मौजूद हूं। तुम्हार अपना। मुझे देखो, मुझे पहचानो, मुझे सुनो। एक उम्र हो गई है - तुम्हे नमस्ते किए। अन्त में भाग कर जायेगा कहाँ सोनू। मैं कोई बीमार तो हूं नहीं, वह भी छूत की। हाँ मेनिका हूं मैं, मेनिका। मैं तुम्हारी अपनी। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि तुम टूटे हुए हो और मुझे आवश्यकता भी है।
परित्यक्तता घर से उपेक्षिता, लांछिता पुकार सुन - सुन कर, लोगों के साथ चल - चल कर बुरी तरह थक चुकी हूं। मेरी जान निकली जा रही है। मुझे लोगों ने भुला दिया है। कोई मुझे, मेरे अस्तित्व को पहचानता ही नहीं। कोई मुझसे बात नहीं करता। मैं इस भरी दुनिया में अकेली पड़ गई हूं। मुझे बचा लो सोनू। ये सन्नाटे एक रोज मेरी जान ले लेगें। सोनू, आओ और मेरी गेसुओं की छाँव में विश्रांति ले लो। तुमको अपनी पहचान के लिए, श्लथ हो चुके पाँव, अपना गम, अपनी परेशानी मुझे दे दो सोनू। मैं आतुरता से तेरी बाट जोह रही हूं।
छत्तीसगढ़ की पवित्र नगरी डोंगरगढ़ में रामनवमी के दिन दोनों ने माँ बम्लेश्वरी को साक्षी मान एक साथ जीने मरने की सौगंध ली। सोनू ने उसके माँग में सिन्दुर भर दिया।
सोनू के नाजुक हाथ की सहलाहट से उसे राहत मिली।
तुम्हारे हिम्मत से मेरी हिम्मत है सोनू। वर्ना ये दुनिया इस कदर घटिया है कि यहां रहते हुए मेरा दम घुटता है।  जाने ये कब तक चलेगा ? ये सूरत बदलनी चाहिए।
- तुम दूसरों की परवाह करती ही क्यो हो ? मैं हूं न तुम्हारे साथ।
प्रीति के काले - काले बाल खुले थे। उन काले बालों के घने छाँव में उसे राहत मिली। प्रीति के गुलाबी होठ थरथराए- सोनू मैं तुम्हारी हूं। अपनी परेशानी मुझे दे दो। इस प्रकार सहलाहट से उसे राहत मिली। यह तो सत्य है कि यदि उसका साथ न होता तो सोनू कब का मर चुका होता। गज भर चौड़ी छाती में चिपकाये हुए सोनू अपनी आगोश में भिंच लेता। इस प्रकार एक भारी दिन के बाद एक हल्की फुल्की रात गुजर जाती।
लोगों के मन में एक बार जो बातें बैठ गई उसे निकालना बड़ी मुश्किल होती है। जो धारणाएं बनी तो बनी रहती है।
उसे कोई नहीं सुनता। सबको अपनी पड़ी है। उसे अपनी आवाज नाली में पड़े हुए कुलबुलाते कुत्ते सी लगती है जिसका कोई वजूद ही न हों। धीरे - धीरे उसकी आवाज छिन जायेगी और एक दिन पता नहीं वह कौन सा पहर होगा जब उसकी आवाज इस दुनिया को छोड़ देगी। पीछे रह जायेगा बदबू मारता बेजान जिस्म। सबसे बड़ी बात तो ये है कि वह इन्सान, इन्सान नहीं बन पाई। केवल बनी तो परिजात। सोनू ने क्या नहीं दिया ? क्या नहीं किया ? एक नई जिंदगी, एक नया स्थान। नख से लेकर सिर तक श्रृंगार। रहने को एक अच्छी जगह, खाने को भोजन और पहनने के लिए कपड़ा। वह भी सम्माननीय ढंग से।
वक्त ने करवट बदला। वही बदल गई। वह अच्छी तरह जानती है कि वह गिरगिट है। सोनू को उन्होंने सौ चूहा खाकर हज की यात्रा की दुहाई दी। सुअर को कितना भी शुद्ध पानी से नहला लो, वह दलदल में ही जायेगा।
चलो, बला टली। अब न कोई दावतनामा, न खत, न टेलीफोन, न बेल बजाने वाली उंगली। यानी सब खाली - खाली। उसकी सोच थी अपनी। ना मौजूदगी को साबित करने में महीनों लग जायेगें, घटनाक्रम एकदम से परिवर्तन हो गया। यवनिका उठ गया। दूसरा भाग चालू।
तुम जिस रास्ते पर चल पड़े हो वह सब ठीक भी है। लोग क्या कहेंगे ? तुमने सन्यास तो नहीं ले लिया। इसी दुनिया में लोगों के बीच रहना जीना है।
- डरती हो ?
- किससे ?
- मुझसे ... ?
- तुमसे क्यों ? और कमीज के बटन से खेलने लगी। सोचती हूं आदमी जब भी ठुकराने पर आता है तो जुनून में हर चीज ठुकराता चलता है।कल को तुम मुझे ठुकरा दोगे, क्या भरोसा ... ? कल को मैं बूढ़ी हो जाऊंगी, तुम - तुम ...।
- ठीक है, तुम्हारी लोगों से नहीं बनती। तुम्हें समझने की कोशिश नहीं करते, लेकिन मैं तो समझता हूं। हाँ, अन्दर पुरुषों की तरह मात्र पत्ते खड़कन की आहट से सहज रहते हैं, रहोगी।
प्रीति खिलखिलाई और बेल की तरह लिपट गई। खुश्बू जेहन में उतरता चला गया और कहने लगी - चिपकू चीप की तरह चिपकने वाले हो। प्रीति नशीली थी ही। नशा जिसके बाद अच्छी नींद आती है। यह नित्य प्रति का कार्य पुन: चालू हो गया।
लोग कहते हैं - खैर खून खाँसी बैर प्रीति, मदपान लाख छुपाओ छिप नहीं सकता और वही होता है जो होना होता है।
एक दिन सुबह - सुबह उसके दरवाजे में खटखटाहट की आवाजें आई। उस वक्त अरविन्द उठकर मुँह धो रहा था और प्रीति पतीली पर चाय चढ़ाने पर लगी हुई थी।
- कोई आया है, बाहर जाकर देखो। क्या कहूं ? यहां है या बाहर। ठीक है बंदा है कौन ?
वह जल्दी - जल्दी मुंह धोने लगा और मुंह धोते - धोते उसने दरपन में देखा तो उसके हाथ पैर सुन्न हो गये। प्रीति कांपते हुए हड़बड़ाहट में उसके पास आयी।
गंगा स्नान कर अगले जनम में मिलने वाली इस सावित्री के घर अरविन्द। धन्य है प्रीति तुम्हारे सौभाग्य का और तुम्हारे चलन का। धन्य हो त्रिया चरित्र का। प्रवेश करने वाला कोई और नहीं सोनू था ...।
नमस्ते टाटा ...।
  • बसंतपुर, राजनांदगांव (छ.ग .)

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