इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 14 जून 2013

पीड़ा लेकर जी रहा



  • श्याम ' अंकुर'
पीड़ा लेकर जी रहा, सागर बहुत उदास ।
यौवन की दहलीज पर , नदियों का परिहास ।।

होकर तेरे पास भी, सौ यौजन हूँ दूर ।
त्रासद जीवन जी रहा, कितना मैं मजबूर ।।

क्‍या पा लूंगा यार मैं, होकर तेरा दास ।
गर हो रब की चाकरी, सफल रहे सन्यास ।।

बुझी नहीं है आज भी, सागर तेरी प्यास ।
नदियों द्वारा पी गया, सारा ही मधुमास ।।

रंज - रोज होता रहा, अम्न - चैन का खून ।
दहशत, हत्या, लूट का, बदला ना मजमून ।।

तेरे मेरे आज है, इक जैसे हालात ।
हमको डसते दिन रहे, पीड़ा देती रात ।।

अम्न - चैन की लाश पर, आजादी का जश्न ।
खड़ा हुआ है सामने, सबके ही यह प्रश्न ।।
  • हठीला भैरूजी की टेक, मण्‍डोला वार्ड बाराँ (राजस्थान) 32525

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