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शुक्रवार, 14 जून 2013

इन्सान बिक रहे है


1
इन्सान बिक रहे है माटी के भाव में
कब तक जियेंगे आखिर वो भी अभाव में

कैसे करेंगे पार हम ये जुल्म की नदी
कुछ छेद दिख रहे है हर एक नाव में

नदियों के कूल पर है कुछ ठूंठ फिर खड़े
बरगद बड़े - बड़े भी बह गये बहाव में

नागों को दूध कितना पिलाया तो क्‍या हुआ
अन्तर नहीं है आया अब तक स्वभाव में

फिर पुण्‍य को मिलेगी देखो सजा कड़ी
अन्धी गवाहियों है उनके प्रभाव में

जब तक यहां बारूद का धुंआ न उठेगा
अन्‍िधयारे होके तब तक अपने जमाव में
(2)
दूसरों की जिन्दगी में झांकना अच्छा नहीं
चिट्ठियां औरों की पढ़ना बांचना अच्छा नहीं

ये जमाना बेबसी पर आपकी मुस्कायेगा
हर किसी से दर्द दुख अब बांटना अच्छा नहीं

सूर तुलसी और कबीरा से हुए ज्ञानी यहां
ज्ञान की बातें कहीं भी हांकना अच्छा नहीं

अपनी मयार्दा में रहना है हमारी सत्‍यता
रेखा लक्ष्मण की कभी भी लांघना अच्छा नहीं

परिन्दों को खुलके उड़ने दो गगन अब मित्रवर
आजादियों को पींजड़ों में बांधना अच्छा नहीं
  • (बजाज हास्पिटल के पीछे),सावरकर वार्ड, कटनी (मध्य प्रदेश)

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