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मंगलवार, 25 जून 2013

कफन



  • मुंशी प्रेमचंद 


झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव - वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह - रह कर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज निकलती थी कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई। सारा गाँव अन्धकार मेें लय हो गया था।
घीसू ने कहा - मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया। जा, देख तो आ।
माधव चिढ़कर बोला - मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती। देखकर क्या करुं?
- तू बड़ा बेदर्द है बे, साल भर उसके साथ सुख - चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई।
- तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ - पांव पटकना नहीं देखा जाता।
चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम। माधव इतना कमजोर था कि आध घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कही मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठïी भर भी आनाज मौजूद हो तो  उनके लिए काम करने की कसम थी। जब दो - चार फाके हो जाते, तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाजार में बेच आता। और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर - उधर मारे - मारे फिरते। जब फाके की नौबत आ जाती, और फिर लकड़ियाँ तोड़ते या मजदूरी तलाश करते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को लोग उसी वक्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए संयम और नियम की बिलकुल जरुरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका। घर में मिटï्टी के दो चार बर्तनों के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिये जाते थे। संसार की चिन्ताओं से मुक्त। कर्ज से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ न कुछ कर्ज दे देते थे। मटर आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून - भानकर खा लेते या दस - पांच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाशवृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद चिन्हों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे जो कि किसी के खेत से खोद कर लाए थे। घीसू की स्त्री की तो बहुत दिन हुए देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से वह औरत आयी थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी। पिसाई करके या घास छीलकर वह सेर भर आटे का इन्तजाम कर लेती थी और इन दोनों बेगैरतों का दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता तो निर्व्याज भाव से दुगुनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव - वेदना से मर रही थी और यह दोनों शायद इसी इन्तजार में थे कि वह मर जाय, तो आराम से सोएं।
घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा - जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी ? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या ? यहाँ तो ओझा भी एक रुपये माँगता है।
माधव को भय था कि वह कोठरी में गया तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला - मुझे वहां जाते डर लगता है।
- डर किस बात का है, मैं तो यहां हूं ही।
- तो तुम्ही जाकर देखो न ?
- मेरी औरत जब मरी थी तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था। और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं ? जिसका कभी मुंह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूं। उसे तन की सुध भी तो न होगी ? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ - पांच भी न पटक सकेगी।
- मैं सोचता हूं, कोई बाल बच्चा हो गया तो क्या होगा ? सोंठ, गुड़, तेल कुछ भी तो नहीं घर में।
- सब कुछ आ जायेगा। भगवान दे तो जो लोग अभी तक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगें। मेरे नौ लड़के हुए। घर में कुछ न था, मगर भगवान ने किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।
जिस समाज में रात - दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना चाहते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे। वहां इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान था, जो किसानों के विचारशून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहां उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उंगली उठाता था फिर भी उसे तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम से कम उसे किसानों की सी जी तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती और उसकी  सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते।
दोनों आलू निकाल - निकालकर जलते - जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि उन्हें ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गई। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा तो बहुत ज्यादा गर्म न मालूम होता, लेकिन दांतों के तले पड़ते ही अन्दर का हिस्सा जबान और हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुंह में रखने से ज्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुंच जाए। वहां उसे ठण्डा करने के लिए काफी सामान थे इसलिए दोनों जल्द - जल्द निगल जाते। हालांकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आंसू निकल आते।
घीसू को उस वक्त ठाकुर की बारात याद आई। जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी और आज भी उसकी याद ताजा थी। बोला - वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़कीवालों ने सबको भरपेट पूरियाँ खिलाई थी, सबको। छोटे - बड़े सबने पूरियाँ खायी और असली घी की। चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई। अब क्या बताऊं कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक - टोक नहीं थी। जो चीज चाहो मांगो और जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसनेवाले है कि पत्तल में गर्म - गर्म गोल - गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं मगर वह है कि दिये जाते हैं और जब मुंह धो लिया तो पान - इलाइची भी मिली, मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी ? खड़ा न हुआ जाता था। चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दिल  - दरियाव था वह ठाकुर।
माधव ने इन पदार्थों का मन ही मन मजा लेते हुए कहा - अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।
- अब कोई क्या खिलाएगा ? वह जमाना दूसरा थ। अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी - ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर - बटोर कर कहाँ रखोगे। बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, खर्च में किफायत सूझती है।
- तुमने बीस पूरियाँ खायी होगी।
- बीस से ज्यादा खायी थी।
- मैं पचास खा जाता।
- पचास से कम मैंने भी न खायी होगी। अच्छा प_ïा था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है
आलू खाकर दोनों ने पानी पीया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर, पाँव पेट में डाले सो रहे थे जैसे दो बड़े - बड़े अजगर, गेंडुलियाँ मारे पड़े हो।
और बुधिया अभी तक कराह रही थी।
सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थी। पथराई हुई आँखें ऊपर टंगी हुई थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।
माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर जोर - जोर से हाय - हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोसवालों ने यह रोना - धोना सुना तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे। मगर ज्यादा - रोने - पीटने का अवसर न था। क$फन की और लकड़ी की फिक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोसले में मांस।
बाप - बेटे रोते हुए गाँव के जमीदार के पास गये। वह दोनों की सूरत से न$फरत करते थे। कई बार इन्हे अपने हाथों पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा - क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है ? अब तो तू कहीं दिखाई नहीं देता। मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।
घीसू ने जमीन पर सिर रखकर आँखों में आंसू भरे हुए कहा - सरकार, बड़ी विपत्ति में हूं। माधव की घरवाली रात को गुजर गई। रात भर तड़पती रही सरकार। हम दोनों उसके सिरहने बैठे रहे। दवा - दारु जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक। तबाह हो गये। घर उजड़ गया। आपका गुलाम हूं। अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगायेगा। हमारे हाथ में जो कुछ था, वह सब तो दवा दारु में उठ गया। सरकार ही की दया होगी तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊं ?
जमींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें - चल दूर हो यहां से। यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब गरज पड़ी तो आकर खुशामद कर रहा है। हरामखोर कहीं का, बदमाश । लेकिन यह क्रोध या दण्ड का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपये निकाल कर फेंक दिये। मगर सांन्तवना का एक शब्द भी मुंह से न निकला। उसकी तरफ ताका भी नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।
जब जमींदार साहब ने दो रुपये दिये, तो गाँव से बनिये - महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता ? घीसू जमींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना खूब जानता था। किसी ने दो आने दिये, किसी ने चार आने। एक घण्टे में घीसू के पास पांच रुपये की अच्छी रकम जमा हो गई। कहीं से नाज मिल गया, कहीं से लकड़ी और दोपहर को घीसू और माधव बाजार से क$फन लाने चले। इधर लोग बांस - वांस काटने लगे।
गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ आकर लाश को देखती थी और उसकी बेकसी पर दो बूँद आंसू गिराकर चली जाती थी।
बाजार में पहुंचकर घीसू बोला - लकड़ी तो उसे जलाने भर को मिल गई है, क्यों माधव।
माधव बोला - हां, लकड़ी तो बहुत है, अब कफन चाहिए।
- तो चलो, कोई हलका सा कफन ले लें।
- हां और क्या ? लाश उठते - उठते रात हो जायेगी। रात को कफन कौन देखता है।
- कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढांकने का चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफन चाहिए।
- कफन लाश के साथ जल ही तो जाता है।
- और क्या रखा रहता है ? यही पांच रुपये पहले मिलते तो कुछ दवा - दारु कर लेते।
दोनों एक दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाजार में इधर - उधर घूमते रहे। कभी इस बजाज की दूकान पर गये कभी उसकी दूकान पर। तरह - तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे मगर कुछ जंचा नहीं। यहां तक कि शाम  हो गई तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने आ पहुंचे और जैसे किसी पूर्व निश्चित योजना से अन्दर चले गये। वहां जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा - साहजी, एक बोतल हमें भी देना।
इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछलियाँ आयीं और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे।
कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनो सरुर में आ गये।
घीसू बोला - क$फन लगाने से क्या मिलता ? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।
माधव आसमान की तरफ देखकर बोला। मानो देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो - दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हजारों रुपये क्यों दे देते हैं। कौन देखता है , परलोक में मिलता है या नहीं ?
- बड़े आदमियों के पास धन है। चाहे फूंके। हमारे पास फूकने को क्या है।
- लेकिन लोगों के पास जवाब क्या दोगे ? लोग पूछेंगे नहीं, कफन कहाँ है ?
घीसू हंसा - अबे कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूंढा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास तो न आयेेगा। लेकिन फिर वही रुपये देंगे।
माधव भी हंसा, इस अनपेक्षित सौभग्य पर बोला - बड़ी अच्छी थी बेचारी, मरी तो खूब खिला - पिलाकर।
आधी बोतल से ज्यादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर परियाँ मंगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबखाने के सामने ही दूकान थीं। माधव लपककर दो पत्तलों में सारा सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया और खर्च हो गया। सिर्फ थोड़े से पैसे बचे रहे।
दोनों इस वक्त शान से बैठे हुए पुरियाँ खा रहे थे, जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी की फिक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।
घीसू दार्शनिक भाव से बोला - हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है, तो क्या उसे पुन्न न होगा ?
माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक की - जरुर से जरुर होगा। भगवान तुम अर्न्तयामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला, वह कभी उम्र भर न मिला था।
एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला - क्यों दादा, हम लोग भी तो एक न एक दिन वहां जायेंगे ही।
घीसू ने इस भोले - भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था।
- वो वहां हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफन क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे ?
- कहेंगे तुम्हारा सिर ।
- पूछेगी तो जरुर।
- तू कैसे जानता है कि उसे क$फन न मिलेगा ? तू मुझे ऐसा गधा समझता है ? साठ साल का दुनिया में घास खोदता रहा हूं। उसको कफन मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा।
माधव को विश्वास न आया। बोला - कौन देगा ? रुपये तो तुमने चट कर दिये। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी मांग में सेंदुर तो मैने डाला था।
घीसू गर्म होकर बोला - मैं कहता हूं - उसे कफन मिलेगा। तू मानता क्यों नहीं।
- कौन देगा, बताते क्यों नहीं ?
- वही लोग देंगे, जिन्होंने कि अब की दिया है। हां, अब रुपये हमारे हाथ न आयेंगे।
ज्यों - ज्यों अंधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज होती थी। मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपट जाता था। कोई अपने दोस्त से कुल्हड़ लगाये देता था।
वहां के वातावरण में सरुर था, हवा में नशा। कितने तो यहां आकर चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज्यादा यहां की हवा  उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएं यहां खींच लाती थी और कुछ देर के लिए वे यहां भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।
 और यह दोनों बाप - बेटा अब भी मजे ले - लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थी। दोनों कितने भाग्य बली है। पूरी बोतल बीच में है।
भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा उनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का उसने अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।
घीसू ने कहा - ले जा, खूब खा और आशीर्वाद दे। जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे जरुर पहुंचेगा। रोयें - रोयें से आशीर्वाद दे। बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे है।
माधव ने फिर आसमान की ओर देखकर कहा - वह बैकुण्ठ में जाएगी दादा, वह बैकुण्ठ की रानी बनेगी।
घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला - हां बेटा, बैकुण्ठ में जायेगी। किसी को सताया नहीं। किसी को दबाया नहीं। मरते - मरते हमारी जिन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुण्ठ जायेगी तो क्या ये मोटे - मोटे लोग जायेंगे जो गरीबों को दोनो हाथों से लूटते हैं और अपने पाप धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं।
श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत बदल गया। अस्थिरता नशे की खासियत है। दुख और निराशा का दौरा हुआ।
माधव बोला - मगर दादा, बेचारी ने जिन्दगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी।
वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा, चीखें मार - मार कर।
घीसू ने समझाया - क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि वह मायाजाल से मुक्त हो गई। जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द मायामोह के बन्धन तोड़ दिये।
और दोनों खड़े होकर गाने लगे -
ठगिनी क्यों नैना झमकावे, ठगिनी।  
पियक्कड़ों की आंखें इनकी ओर लगी हुई थी और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाये, अभिनय भी किये और आखिर नशे से बदमस्त होकर वहीं गर पड़े।

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