इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 19 जून 2013

हैं कुछ लोग


  • डां. कौशलेन्‍द्र 
है कुछ लोग जो कहते फिरते, राष्ट्र - गीत है धर्म - विरोधी।
कहने को हैं धर्म - प्रचारक, कर्म कर रहे राष्ट्र विरोधी॥
माता हो या महापूज्य हो, किसी के आगे नहीं वे झुकते।
इस माटी के हैं संस्कार जो, कोसों उनसे दूर वे रहते॥

दर्शन - वेद - पुराणों ले, हैं नहीं मानते अपना गौरव।
दूर देश के पैमाने ले, उन्हें बताते अपना गौरव॥
उनका मालिक अरब का वासी, अपना तो घट - घट का वासी।
उनका सब कुछ आयातित है, अपना सब कुछ खाँटी - देशी॥
हैं कुछ लोग जो कहते फिरते, राष्ट्र - गीत है धर्म - विरोधी ....

ओसामा पर है खमोशी, राष्ट्र गीत पर फतवा जारी।
रक्त - पात में उज्र नहीं, पर योग - शास्त्र है धर्म विरोधी॥
प्रवचन तो भाई चारे का, पर उनका तलवार है क्रोधी।
एक नहीं दो - चार बीबियाँ, है नारी शिक्षा विरोधी॥

ऐसे धर्म - प्रचारक से, मेरे देश के लोगों बच के रहना।
धर्म जोड़ता, नहीं तोड़ता, नहीं छीनता किसी की रोटी॥
हैं कुछ लोग जो कहते फिरते, राष्ट्र - गीत है धर्म विरोधी ...
  • ग्राम - संबलपुर, जिला - कांकेर (छ.ग.) 

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