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गुरुवार, 27 जून 2013

अन्तर्वेदना के कवि डॉ. रतन जैन

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ गीतकार एवं साहित्यकार डॉ. रतन जैन को श्रद्धासुमन ....



कवि डॉ. रतन जैन

- वीरेन्द्र बहादुर सिंह -
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह

पिछले लगभग सात दशकों से साहित्य साधना में रत रहे छत्तीसगढ़ के याशस्वी कवि एवं गीतकार डॉ. रतन जैन ने अपनी कविताओं के माध्यम से अंचल में अपनी पृथक पहचान बनायी है। उनकी रचनाएं भले ही प्रकाशन की दृष्टिï से क्षेत्रीयता के दायरे में सिमट कर रह गयी लेकिन उनकी रचनाएं उत्कृष्ट एवं अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सक्षम हैं।
छायावादी, प्रगतिशील एवं प्रेरणादायी काव्य गंगा प्रवाहित करने वाले डॉ. रतन जैन का जन्म 02 मई सन्ï 1927 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के छुईखदान नगर में एक दिगम्बर जैन कुलीन व्यवसायी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता श्री बालचंद जैन का निधन हो गया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा छुईखदान में ही हुई। सन्ï 1942 में झण्डा सत्याग्रह के दौरान एग्लो वर्नाकुलर मिडिल स्कूल छुईखदान में यूनियन जैक उतार कर उनके स्थान पर तिरंगा झण्डा लहराने के कारण डॉ. रतन जैन एवं मेघनाथ कन्नौजे को स्कूल से निकाल दिया गया था। जिसके कारण उनकी स्कूली शिक्षा अधूरी रही। बाद में उन्होंने 1945 में देवधर विद्यापीठ बिहार से 'साहित्य भूषण' एवं 1948 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से 'साहित्य रत्न' की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. जैन को कविता लिखने की प्रेरणा महात्मा गांधी के नोआखाली आंदोलन से मिली। उन्होंने पहली रचना छुईखदान रियासती आंदोलन के दौरान लिखी जो एक सामूहिक गीत था। उनकी रचनाएं अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। वे आकाशवाणी के भी प्रिय गीतकार रहे तथा 1974 से 1992 तक लगातार आकाशवाणी के कवि गोष्ठिïयों में शामिल होते रहे तथा उनकी कविताएं आकाशवाणी से प्रसारित हुई थी।
डॉ. जैन एक साहित्यकार होने के साथ-साथ एक सफल पत्रकार भी रहे हैं। प्रारंभिक दिनों में वे नागपुर से प्रकाशित साप्ताहिक आलोक में सहसंपादक थे। बाद में वे रायपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र नवभारत एवं युगधर्म में लगभग 15 वर्षों तक संवाददाता के रूप में काम किया। उन्हें 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से प्रसिद्घ राष्ट्रकवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी का भी सानिध्य प्राप्त हुआ था। उन्होंने कवि सम्मेलनों के अनेक मंचों पर ख्यातिलब्ध कवि बालकवि बैरागी, माणिक वर्मा, नारायण लाल परमार, वसीम साही, प्रदीप चौबे, लक्ष्मण मस्तुरिया, दानेश्वर शर्मा, यावर हुसैन यावर एवं अशोक शर्मा के साथ काव्य पाठ किया था।
डॉ. रतन जैन हिन्दी साहित्य के अनन्य सेवक थे। बसंत पंचमी सन्ï 1948 को गठित हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के वे संस्थापक सदस्यों में से एक थे। सन् 1961 में समिति का पुनर्गठन होने पर उन्हें सर्वसम्मति से समिति का अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने लगातार सात वर्षों तक बड़ी कुशलता के साथ समिति को नयी दिशा दी। 1973 को जब हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की ऐतिहासिक रजत जंयती मनाई गयी तो डॉ. साहब को रजत जयंती समारोह का स्वागत मंत्री बनाया गया। इस अवसर पर प्रकाशित 'स्मारिका' के कलेवर को संवारने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे समिति को संरक्षक के रूप में आजीवन मार्गदर्शन प्रदान करते रहे।
छुईखदान की सेवाभावी संस्था 'प्रेरणा' ने सुदीर्घ साहित्य सेवा के लिए 1995 में डॉ. जैन का सम्मान किया था। हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के स्वर्ण जयंती के अवसर पर 06 फरवरी 1998 को समिति द्वारा उनका सम्मान किया गया। 05 मई 2002 को हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान द्वारा डॉ. रतन जैन के 'अमृत महोत्सव' का आयोजन किया गया। समारोह में डॉ. साहब को अभिनंदन पत्र, स्मृति प्रतीक चिन्ह, शाल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया गया। 'अमृत महोत्सव' के मंच से ही प्रस्तावित उद्ïबोधन देते हुए डॉ. रतन जैन के अभिन्न अनन्य एवं हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के पूर्व अध्यक्ष आचार्य रमाकान्त शर्मा ने डॉ. साहब का काव्य संकलन प्रकाशित करने का संकल्प लिया। 2002 में लिया गया यह संकल्प 06 वर्ष बाद फलीभूत हुआ। आचार्य रमाकांत शर्मा के अथक प्रयास और आर्थिक संबल से 82 वर्ष की आयु में डॉ. रतन जैन की चुनिंदा कविताओं का संकलन 'रक्त-पुष्प' का विमोचन 31 मई 2008 को समारोह पूर्वक किया गया। 'रक्त-पुष्प' का प्रकाशन कर हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान ने अपने अग्रज कवि के कालजयी सृजन साधना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सारस्वत उदाहरण प्रस्तुत किया। 'रक्त-पुष्प' की साहित्य जगत में सराहना हुई। डॉ. साहब ने 'रक्त-पुष्प' में कविताओं के चयन एवं संपादन का जिम्मा बड़े विश्वासपूर्वक इन पंक्तियों के लेखक को सौंपा। मुझे उनकी कसौटी पर खरा उतरने का आत्मिक संतोष है।
डॉ. रतन जैन ने अपनी कविताओं में जीवन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, सौंदर्य बोध, जीवन संघर्ष, प्रकृति वर्णन, हास्य-व्यंग्य एवं करूणा को स्थान दिया है। उन्होंने हर प्रसंग, पर्व, त्यौहार, मौसम पर अपनी लेखनी चलाकर साहित्य को समृद्घ किया है।
हिन्दी के शोध निर्देशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गणेश खरे के अनुसार 'डॉ. रतन जैन पीड़ा की उष्मा से संचित धन के कवि हैं। उनकी कविताएं प्रगीत काव्य के अनियंत्रित भावोद्रेकों से युक्त है। उनमें मानवीकरण, कल्पना शीलता, सौंदर्य बोध और जीवन के प्र्रति दायित्वशीलता है, पलायन की भावना कहीं नहीं है।
गीतों में है धनीभूत पीड़ा की हलचल
जब पीड़ा से मन भर जाता,
तब गीत अचानक झर जाता।
पीड़ाओं की बस्ती में ही मैने अपना नीड़ बनाया
म्यान, मौन, वैराग्य, निराश्रित,
जीवन मेरा दग्ध तिरस्कृत।
ये छायावादी तत्व आज भले ही प्रासंगिक न हो पर जब डॉ. रतन जैन अपनी ये रचनाएं लिख रहे थे, तब वे प्रासंगिक भी थे और मूल्यवान भी। और मूल्यवान रचना हर युग में अपने मूल्य की संरक्षा करती है। जहां आत्मवेदना, रहस्य चेतना की भूमिका पर स्थित है यहां पर यह जीवन की विभीषिका के बीच मुखरित हुई है। डॉ. जैन को माखन लाल चतुर्वेदी जैसी महान भारतीय क्रांतिकारी आत्मा का सानिध्य भी कुछ समय तक मिला। उनका प्रभाव डॉ. जैन की रचनाओं में स्थायी रूप से विद्यमान है। पंक्तियां दृष्टब्य है।
मंहगाई की चढ़ी जवानी, अन्यायों का शोर है,
शासक, अपनी मद्मस्ती में बेसुध मस्त विभोर है।
नारों के इस प्रजातंत्र से भूखे सब इंसान है
भरे तिजोरी भ्रष्टाचारी, यह कैसा उत्थान है।
उपरोक्त पंक्तियों में भारतीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आकुलता और देश में बढ़ते हुए भ्रष्ट्राचार तथा नैतिक पतन के प्रति तीव्र आक्रोश है। डॉ. खरे के अनुसार डॉ. जैन की रचनाओं में आत्मपरकता और राष्ट्रीय चेतना के अतिरिक्त तीसरी विशेषता प्राकृतिक परिवेश में नव गीतों का सृजन है। हिन्दी के नवगीतों की श्रृंखला में डॉ. रतन जैन के ये गीत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कवि की रचनाओं में फागुनी बयार आमंत्रण बांटता है, महुआ का जाम सबको रसविभोर करता है, सरेआम, आम मौर का मुकुट पहनता है और उन्मादी गीत वासना, गदराई गंध से युक्त सरसों भांवर के लिए बैठ जाती है। कवि को अगहन की धूप दुल्हन की तरह लगती है। यहां की डोली का मलयज, कहार अपने कंधे पर लेकर चल रहे हैं, सौंदर्य और मानवीयकरण की नइ उद्भावनायें है। राष्ट्रीय संचेतना से युक्त निम्न प्रतीकों की योजना भी देखिये-
संकल्पों की सीढ़ी टूटी,
हिंसा के नाखून बढ़े हैं
न्याय वीथियों में भटका है,
द्वार-द्वार अन्याय खड़े हैं।
अभिनंदन होता बबूल का,
बरगद व्याकुल है, निर्जन में,
नागफनी सम्मानित होती,
तुलसी रोती है आंगन में।
शोषण का विषधर विष बोता,
लोकतंत्र के वन-चंदन में।
प्राकृतिक परिवेश से चयनित से प्रतीक डॉ. रतन जैन को हिन्दी नवगीतों की परम्परा से न केवल जोड़ते है, वरन यह सिद्घ भी करते हैं कि ये रचनाएं एक सारश्वत कवि की महत्तम उपलब्धियां है और हिन्दी के नवगीत परम्परा इसे पाकर गौरवान्वित है। डॉ. खरे के अनुसार अंचल में हिन्दी पर शोध करने वाले विधार्थियों को डॉ. रतन जैन की आत्मिक पीड़ा की उन्मा में संचित साहित्य संपदा को भी शोध का विषय बनाना चाहिए।
अंचल के सुपरचित गीतकार डॉ. जीवन यदु के अनुसार छत्तीसगढ़ के वरिष्ठï गीतकार डॉ. रतन जैन अपने गीतों को ओढ़ने-बिछाने वाले रचनाकार हैं। उन्हें किसी विशिष्ट विचारधारा में आबद्घ नहीं किया जा सकता। वे भावों में बहने वाले कवि हैं। रचना के क्षणों में उनके मानस को जिस भाव ने उद्वेलित किया, वह भाव शब्दों का आधार लेकर प्रभावित हो गया। कसक और पीड़ा ही उनके गीतों की जननी है। 'वियोगी होगा, पहला कवि, विरह से उपजा होगा गानें जैसी पारम्परिक काव्य सिद्घांत को उनके गीतों में ढूढ़ लेना मुश्किल नहीं है। वे हृदय की कोमल और करूणाजन्य भावनाओं के शिल्पी हैं। डॉ. रतन जैन के लेखन का प्रारंभ उस काल में हुआ है, जब छायावादी कविताओं का वर्चस्व रहा है। अत: छायावाद की छाया का आच्छादन भी डॉ. रतन जैन के गीतों पर दिखाई देता है। डॉ. जैन की शैली एवं शिल्प पर छायावादी असर है। डॉ. जैन की कविताएं क्रमश: यह बात किसी से मत कहना, विश्वास चाहिए, नवल गीत तू गा दे, जागरण गीत जैसे जन संबोधित गीत तथा फागुनी बयार, आया बसंत है, फागुन का व्याकरण, पावस गीत जैसे प्रकृति समर्पित गीत उनकी पुष्टï रचनाएं है।
डॉ. यदु  का स्पष्टï मानना है कि डॉ. रतन जैन का काव्य संकलन रक्त-पुष्प इस अर्थ में महत्वपूर्ण और अर्थवान है कि छत्तीसगढ़ की गीत परम्परा के शोधार्थियों को इस संग्रह से होकर गुजरना ही पड़ेगा क्योंकि डॉ.रतन जैन उन गीत शिल्पियों में है जिन्होंने गीत की गगनचुम्बी इमारत की नींव में अपने भावों के कुछ सार्थक पत्थर डाले हैं।
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति जगदलपुर के अध्यक्ष एवं कवि हुकुमदास 'अचिंत्य' का मानना है कि डॉ. जैन ने कविताओं के माध्यम से अपने भीतर धधक रहे दावानल को मौलिक एवं मार्मिक ढंग से रेखांकित किया है। दर्द की पराकाष्ठा उनकी इन पंक्तियों में उभर कर परिलक्षित होती है।
शूल भरी जीवन पगडण्डी,
हारा थका रिक्त राही हूं,
आंसू से गीले आंचल से
जन्मी कविता की स्याही हूं।
इन पंक्तियों में कवि की गहन वेदना की झलक मिलती है। प्रकृति सौंदर्य पर उनकी कलम उसी धारा प्रवाह के साथ चली है। 'अगहन की धूप' शीर्षक रचना में सौंदर्य श्रृंगार की बानगी देखते ही बनती है।
रस भरे कापोल अरूण आमंत्रण ओंठ
मार रही चुपके से चितवन की चोट।
अल्हड़ है मधुर-मधुर गदराया रूप
दुल्हन सी लगती है अगहन की धूूप।
इन दृश्यों में सर्वथा नवीनता है और उपमानों में मौलिकता स्पष्टï रूप से से दृष्टिïगोचर हो रही है। डॉ. जैन ने प्रकृति का मानवीकरण और सौंदर्यबोध की नई परिकल्पना को साकार किया है।
देश में बढ़ते हुए, भ्रष्ट्राचार और समाज के हर क्षेत्र में आयी नैतिक गिरावट के प्रति डॉ. जैन ने तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है। वर्तमान के बदलते हुए परिदृश्य पर कटाक्ष करती ये पंक्तियां दृष्टïव्य है।
नाविक बदले, धार न बदली,
जीर्ण-शीर्ण जलपोत वही है,
वही शक्ति, अभिव्यक्ति पुरानी,
शोषण के सब स्त्रोत वही है।
गीत वही है छंद वही है,
केवल युग के स्वर बदले हैं,
परिवर्तन के संग्रह में बस
पृष्ठों के अक्षर बदले है।
डॉ. जैन आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाले गीतकार हैं। जहां आदमी विषमता को लेकर अपने वर्तमान से नाखुश रहता है। 'ये बात किसी से मत कहना'  शीर्षक रचना में कवि ने वर्तमान व्यवस्था पर करारी चोट की है-
कौए मोती यहां खा रहे आजादी के,
और हंस आंसू पीते हैं बर्बादी के।
यहां गरीबी नारों से ही भाग गई है
और अमीरी एक रात में जाग गई है।
श्री अचिंत्य के अनुसार डॉ. जैन ने जिस तेवर की रचनाएं लिखी है वह हिन्दी के गीत विधा पर शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
डॉ. रतन जैन से पिछले छह दशकों से रचनात्मक जुड़ाव रखने वाले हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के पूर्व अध्यक्ष एवं 'रक्त-पुष्प' को पाठकों के सामने लाने वाले आचार्य रमाकांत शर्मा के अनुसार डॉ. जैन छंदधर्मी कविता के पोषक है। रस छंद और अलंकार का प्रयोग कर उन्होंने अपनी कविताओं और गीतों को हृदयग्राही बनाने का प्रयास किया। स्वाघ्याय के बल पर उन्होंने अत्यंत उच्चकोटि की रचनाएं लिखी। आचार्य शर्मा का मानना है कि छत्तीसगढ़ में कवियों की कुछ ऐसी पीढ़ी ने भी जन्म लिया जिनकी रचनाएं प्रकाशन के अभाव में चर्चित नहीं हो पायी। प्रकाशित हुई भी तो आंचलिक पत्र-पत्रिकाओं में। यही कारण है कि कई रचनाएं कालजयी होते हए भी प्रचार-प्रचार के अभाव में देशव्यापी ख्याति प्राप्त नहीं कर पायी। इसके बावजूद अनेक साहित्य साधक अपनी मौन साहित्य साधना में जुटे रहे। डॉ. रतन जैन ऐसे ही तपस्वी साहित्य साधक है। आचार्य शर्मा का दावा है कि डॉ. साहब की रचनाएं किसी भी दृष्टिïकोण से छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत, पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर एवं महादेवी वर्मा से कमतर नहीं है। उन्हें इस बात का खेद है कि डॉ. रतन जैन जैसा तपस्वी साहित्य साधक एक अंचल तक सिमट कर रह गया।
हिन्दी साहित्य के भंडार में पांच सौ कविताएं और सौ से ज्यादा कहानियों का योगदान देने वाले डॉ. रतन जैन का अभी हाल ही में विगत 13 जनवरी 2011 को उनके गृह नगर छुईखदान में देहावसान हो गया। उन्हीं की पंक्तियों के साथ उन्हें श्रद्घासुमन समर्पित है -
चाहता हूं मौत पर बस गीत कफन हो
अगला जनम हो तो यही मेरा वतन हो।

  • गांधी बाड़ा, हमालपारा, वार्ड नं. 23 राजनांदगांव (छ.ग.)पिन कोड 491441। मो. 94077-60700

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