इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 25 जून 2013

शाहे जहां का होकर




  • अशोक सेमसन

शाहे जहां का होकर भी, सायल हुआ है तू
असलियत तो कुछ और है, डायल हुआ है तू।
रंगों आब रखकर भी, न आकृष्ट किसी को कर सका।
फिर भी सिर्फ एक के सामने, गायब हुआ है तू।

बाजुए - वजूद का है खंजर, तो तेरे पास,
तेरी ही है ख्याल, कि घायल हुआ है तू।
चाहकर भी जमाने को, वश में न तू कर सका,
फिर भी उस नूरे - नजर का, कायल हुआ है तू।

टाईम को तू सोचता है, मैंने खरीद लिया,
फिर भी उस टाईम के खौफ से, जायल हुआ है तू।
एक दिन दीदारे चार हो जायेगा, तुझको क्या मालूम,
' सेमसन ' बन पर्दा अपनी वस्ल में, हायल हुआ है तू।

  • रूतविला, प्लाट ए - 1 बी, आशीष नगर पश्चिमी, रिसाली, एकता बाल उद्यान के सामने, भिलाई [ छ.ग. ]

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