इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 25 जून 2013

शाहे जहां का होकर




  • अशोक सेमसन

शाहे जहां का होकर भी, सायल हुआ है तू
असलियत तो कुछ और है, डायल हुआ है तू।
रंगों आब रखकर भी, न आकृष्ट किसी को कर सका।
फिर भी सिर्फ एक के सामने, गायब हुआ है तू।

बाजुए - वजूद का है खंजर, तो तेरे पास,
तेरी ही है ख्याल, कि घायल हुआ है तू।
चाहकर भी जमाने को, वश में न तू कर सका,
फिर भी उस नूरे - नजर का, कायल हुआ है तू।

टाईम को तू सोचता है, मैंने खरीद लिया,
फिर भी उस टाईम के खौफ से, जायल हुआ है तू।
एक दिन दीदारे चार हो जायेगा, तुझको क्या मालूम,
' सेमसन ' बन पर्दा अपनी वस्ल में, हायल हुआ है तू।

  • रूतविला, प्लाट ए - 1 बी, आशीष नगर पश्चिमी, रिसाली, एकता बाल उद्यान के सामने, भिलाई [ छ.ग. ]

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