इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 28 जून 2013

ज्ञानेन्द्र साज की दो गज़लें



( 1  )
राह चलते नहीं अब कोई कहानी ढूंढो
आदमी मिलता नहीं उसकी निशानी ढूंढो,
लोग दौलत के लिए जान तक दे देते हैं
देश के काम आए वो जवानी ढूंढो
प्रदूषित हो गई है ऊपर से नीचे सारी
अब नहीं दरिया - ए - गंगा में वो पानी ढूंढो
लूटकर खा रहे जो देश करके उनसे अलग
प्रताप, आजाद, भगत झांसी की रानी ढूंढो
इक इंकलाब उठे देश के हर कोने से
चलिए लोगों में कहीं इसकी रवानी ढूंढो
मैं जो कहता हूं वही आप भी महसूसते है
इसलिए साज के शब्दों के भी मानी ढूंढो
          ( 2 )
अब क्या है मेरा हाल, न पूछे तो ठीक है
तू मुझसे ये सवाल न पूछे तो ठी है
हम दोनों को एक - दूसरे से दूर करने की
किसने रची कुचाल न पूछे तो ठीक है
तुझे देखने की चाह पर, तेरी गली में तब
कितना मचा बवाल, न पछे तो ठीक है
ये मैं ही जानता हूं कि तेरी जुदाई का
कितना हुआ मलाल न पूछे तो ठीक है
इतने दिनों के बाद मुहब्बत कि नाम पर
क्या है मेरा ख्याल, न पूछे तो ठीक है
क्या सोंचकर के तूने मेरे प्यार को ऐ साज
दिल से दिया निकाल, न पूछे तो ठीक है
  • पता - 17 / 212, जयगंज, अलीगढ़ ( उ.प्र.) 202001

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