इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 28 जून 2013

ज्ञानेन्द्र साज की दो गज़लें



( 1  )
राह चलते नहीं अब कोई कहानी ढूंढो
आदमी मिलता नहीं उसकी निशानी ढूंढो,
लोग दौलत के लिए जान तक दे देते हैं
देश के काम आए वो जवानी ढूंढो
प्रदूषित हो गई है ऊपर से नीचे सारी
अब नहीं दरिया - ए - गंगा में वो पानी ढूंढो
लूटकर खा रहे जो देश करके उनसे अलग
प्रताप, आजाद, भगत झांसी की रानी ढूंढो
इक इंकलाब उठे देश के हर कोने से
चलिए लोगों में कहीं इसकी रवानी ढूंढो
मैं जो कहता हूं वही आप भी महसूसते है
इसलिए साज के शब्दों के भी मानी ढूंढो
          ( 2 )
अब क्या है मेरा हाल, न पूछे तो ठीक है
तू मुझसे ये सवाल न पूछे तो ठी है
हम दोनों को एक - दूसरे से दूर करने की
किसने रची कुचाल न पूछे तो ठीक है
तुझे देखने की चाह पर, तेरी गली में तब
कितना मचा बवाल, न पछे तो ठीक है
ये मैं ही जानता हूं कि तेरी जुदाई का
कितना हुआ मलाल न पूछे तो ठीक है
इतने दिनों के बाद मुहब्बत कि नाम पर
क्या है मेरा ख्याल, न पूछे तो ठीक है
क्या सोंचकर के तूने मेरे प्यार को ऐ साज
दिल से दिया निकाल, न पूछे तो ठीक है
  • पता - 17 / 212, जयगंज, अलीगढ़ ( उ.प्र.) 202001

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