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बुधवार, 26 जून 2013

गुलों पे अब नहीं ...


  • डॉ. दीप बिलासपुरी
गुलों पे अब नहीं दिखती सजीली तितलियाँ यारो।
भरा है कारखाने के धुएं से गुलस्तियां यारो।।
समन्दर से गिला कैसा ख़ता क्या इन हवाओं की।
भंवर में खुद फँसा बैठे हम अपनी कश्तियाँ यारो।।
नज़र मुझको नहीं आए किनारे पर पड़े मोती।
समन्दर में अबस मैंने लगाई डुबकियाँ यारो।।
बड़ा ही मतलबी निकला मेरे दु:ख - दर्द का संगी।
बड़ी महंगी पड़ीं हमदर्द की हमदर्दियाँ यारो।।
बड़ी जल्दी गुज़रते हैं मिलन की रात के घंटे।
चलें अहिस्ता - फुर्क़त में घड़ी की सुईयाँ यारो।।
कभी सुनता नहीं मेरी कहा माने नहीं मेरा।
दिले - कमबख्‍त करता है बड़ी मनमानियाँ यारो।।
बहुत इतरा रहा था वो फ़लक की गोद में जाकर।
कटी जब डोर तो गुड्डा गिरा जाने कहाँ यारो।।
मरा करती है फिर क्यूँ भूख से मख्‍लूक बेचारी।
फूलक पे है अगर मौजूद इक रोजीरसाँ यारो।।
अदू ने दे दिया धोखा दिखा के अमन का झंडा।
ख़बर क्या थी पताका में छिपी होगी सिनाँ यारो।।
मिले इक दिन सही अपने पतों पर वो सभी रुक्के।
हवा को सौंप डाली थी जो चिट्ठियाँ यारो।।
  • पता - क्रांति प्रकाशन बिलासपुर, जिला - यमुनागर [ हरियाणा ]

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