इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 12 जून 2013

बरसा गीत


  • जीवन यदु
छिहीं - छिहीं चेंदरी उतार के,
मोटियारी सहीं पाटी पार के -
धरती पहिरे हे हरिय र लुगा - कोसटउँहा ।
    बेलबेलही टुरी सही नदिया बेलबेलाय ,
    तरिया - कुँआ, खोच का - खाबा जमों के मन भाय ,
    पानी भरे मरकी असन उलंडगे च उमास,
    जेठ मा गजब सहे रहिस भुइंया मोर पियास,
नॉंव धरवँ का नदिया के चाल के,
नागिन रेगय  जीब ल निकाल के,
दिखय  नरवा हा बिखनिन हवय  जइसे गउंहा 
    सिटिर - सिटिर कभू गिरय , कभू मूसर धार,
    भउजी के हे पाँव ह भारी, कइसे जाही खार,
    घर के खेती पाके हवय , बन के हा हरियाय ,
    तभे भइया दउड़ - दउड़ के घरे कोती आय ,
नवा - नवा खेत, नवा धान हे,
नवा - नवा खेती अउ किसान हे,
नवा भउजी के गुरतुर मया जइसे मउँहा ।
    बादर करय  साहूकारी, ऊपर ले गुरार्य ,
    डर मा तेकर सूरूज ददा मुहुं ल लुकाय ,
    टिपिर - टिपिर छानी चूहय  रेला धरे धार,
    घर ले बने खोर हा दिखय , धोये कस दुवार,
इती - उती खपरा ल टार के,
छाये हवन खदर ल उझार के,
फिलगे गिदगिद ले घर तभो ले पटउँहा ।
  • '' गीतिका '' दाऊचौरा खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.),    मोबाइल - 94254 - 17747

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