इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 28 जून 2013

राम भजो



-  अशोक अंजुम  -

क्यों फिरते हो मारे - मारे, राम भजो।
खुद ही खुद के बनो सहारे राम भजो।

लाल, मुँगेरी जैसे सपने मत देखो।
सत्तू खाओ रामदुलारे राम भजो।

ये सरकारी दफ्तर है, बिन रिश्वत के,
बन जाएँगे काम तुम्हारे, राम भजो।

हर ह$क तुम्हें तुम्हारा देगें सौदाई,
होंगे सही - सही बँटवारे, राम भजो।

यूँ तो सही सलामत घर से निकले हो,
लौट आओगे साँझ सकारे, राम भजो।

इक दिन बीच समन्दर में सब डूबेंगे,
मानवता के ये हत्यारे, राम भजो।

कर देंगे कल्याण तुम्हार अंजुम जी
ये मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, राम भजो।
  • संपादक - प्रयास, ट्रक गेट, कासिमपुर - 202127 अलीगढ़ (  उ.प्र.)

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