इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 9 जून 2013

तभी रिहाई की


  • ज्ञानेन्द्र साज

बरसों पहले हुई जुदाई की,
आज फिर दिल को याद आई थी।

साजिशें ही रची तबाही की,
दोस्ती इस तरह निबाही की।

वो ही मुंसिफ है वो ही फरियादी,
कौन सुनता है बेगुनाही की।

नजर अंदाज करके अच्छाई,
उन्होंने हर जगह बुराई की।

काट जब पर दिये सभी उसने,
परिन्दों की तभी रिहाई की।

दाग दिल पर लगे रहे कितने,
जिस्म की रोज ही सफाई की।

वह उसी बात से मुकर बैठा,
बात उसने ही जो बताई थी।

भरी महफिल में साज की उसने,
सजा के तौर पे रूस्वाई की।
सम्पादक - जर्जर कश्ती (मासिक),एम आई जी - 61, 
विकास नगर, आगरा रोड, अलीगढ़
,मो . - 9411800023

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें