इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 9 जून 2013

तभी रिहाई की


  • ज्ञानेन्द्र साज

बरसों पहले हुई जुदाई की,
आज फिर दिल को याद आई थी।

साजिशें ही रची तबाही की,
दोस्ती इस तरह निबाही की।

वो ही मुंसिफ है वो ही फरियादी,
कौन सुनता है बेगुनाही की।

नजर अंदाज करके अच्छाई,
उन्होंने हर जगह बुराई की।

काट जब पर दिये सभी उसने,
परिन्दों की तभी रिहाई की।

दाग दिल पर लगे रहे कितने,
जिस्म की रोज ही सफाई की।

वह उसी बात से मुकर बैठा,
बात उसने ही जो बताई थी।

भरी महफिल में साज की उसने,
सजा के तौर पे रूस्वाई की।
सम्पादक - जर्जर कश्ती (मासिक),एम आई जी - 61, 
विकास नगर, आगरा रोड, अलीगढ़
,मो . - 9411800023

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें