इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 27 जून 2013

माँ की ममता




-  डॉ. तारिक असलम ' तस्नीम'   -

वह मेरी पड़ोसी थी। मैं उन्हें चची कहा करता था। हाल ही में चाचा जी का इंतेकाल हुआ था। जिसकी मुझे किसी ने खबर तक नहीं दी थी बल्कि उनके दरवाजे पर आने - जाने वालों की भीड़ देखकर अनुमान लगाया था कि चाचा जी दुनिया से रुखसत कर गये। यह सोचना सही था मेरा।
वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। बिस्तर पर उन्हें चाय - रोटी खाने में दिया जा रहा था। कभी चची पर गुस्से में चिल्लाते तो वह कुछ चटपटी चीजें या फिर गोश्त पुलाव बनाकर खिला दिया करती। जो खाना उनको बेहद पसंद था।
उस दिन दोपहर में बेटी जूही अब्बू को खाना खिलाकर बाजार दवा लाने चली गयी थी। चची थकी सी दूसरे कमरे में लेट गई थी। उस वक्त उनके करीब कोई नहीं था। जब उनकी रूह कज़ा हुई। उसी कमरे के बगल से वसीम का गुजरना हुआ। उसने अबू की यह हालात देखी। उसने अम्मी जान से कुछ कहने की बजाए आफिस से सीधे बीबी को लाने के लिए निकल गया। ताकि उसे बेकार की जहमत नहीं उठानी पड़े। आजकल की नकारा औलादें अपने मां - बाप के बारे में यही सोच रखते भी हैं।
वसीम भी अर्से से अपनी बीबी और बच्ची के साथ उसी मकान के एक हिस्से में मां - बाप से अलग रह रहा था। अब उसका उनसे कोई वास्ता नहीं था। न जाने कब से चाचा - चाची बेटा और बहू से एक कप चाय तक के लिए मुहताज थे।
एक दिन चची मुझे सामने पाकर कहने लगी थी - तुमसे क्या कहे आसिफ, चचा तो न जाने कब दुनिया से रुखसत हो गए कि उनके मुंह में एक चम्मच पानी भी मेरे हाथ से नसीब नहीं हुआ। वसीम ने बाप को तड़पते देखा होगा तो मुझे जगाने की बजाए बीबी को लाने आफिस चला गया ताकि उसे अब्बू को कहीं ले जाने की जहमत नहीं उठानी पड़े और किसी नर्सिंग होम तक ले जाने की कोई बात कहे। ऐसी नेक औलाद है हमारी। खुदा से नमाज में दुआ करती हूं कि अल्लाह ऐसी औलाद किसी को न दें। खैर, उसे खानदान वालों को फोन करके खबर देने को कहा तो कहता है पैसा लगेगा। किसी को दूसरे मुहल्ले से लाने कहा तो बोला कि पेट्रोल का पैसा चाहिए। यहां तक कि कभी बाप को डाक्टर के पास ले गया उनसे भी किराए का पैसा वसूल लिए, और किसकी कमाई से वह बटोरता रहा उनके किसी काम को करने को कहा तो कहता है कि फालतू कामों के लिए पैसे नहीं है। उनकी कमाई से ही उनकी ओर की जमीन में तीन पक्के कमरे बनवा दिए, फिर भी कहता हैं कि आप मेरे बाप नहीं, पागल लगते हैं। जिस कोर्ट में मेरे पर मुकदमा करेंगे ... उनको देखकर जज कहेगा कि यह पागल कहां से आ गया। और नहीं तो कहता है कि आप मरेंगे तो आपके कब्र पर जाकर पेशाब करुंगा। यह बताते हुए चची का गला भर आया था। लेकिन अभी कुछ ही दिन गुजरे थे कि एक दिन आफिस जाते हुए देखा कि चची तीन - चार लोगों को साथ लेकर घर की ओर चली आ रही है। मुझसे नजर मिली तो कहने लगी - यह वकील बाबू के मुवक्किल लोग हैं, जो घर का रास्ता ही नहीं जानते, मुझसे पूछा तो साथ लेती आयी कि जाने दो वसीम को दो पैसा मिल जाएगा। बेटा मेरा न सही अपनी बीबी बच्चे का ही ठीक से पेट भरे।
यह कहते हुए उनके चेहरे पर ममता की झलक साफ दिख रही थी मुझे। अब मेरे दिमाग में यह ख्याल गूंज रहा था कि काश, वसीम इस बात को समझ सकता।
शिकायत
मैं जब भी घर से बाहर निकलता। राबिया चाची कभी अपने टीन के दरवाजे के करीब तो कभी गली के मुहाने पर खड़ी मिलती। मैं यूं ही पूछ लेता - चची, आप यहां खड़ी हैं ? कोई आने वाला है क्या ? वह कहती - अब कोई आयेगा जो सामने है। वह तो सुध लेता ही नहीं ... मियां - बीबी दोनों सुबह - सुबह दिखा - दिखाकर दूध की चाय की चुस्की लेते हैं। घर में रोज ही अच्छी चीजें बनती है। मैं उसकी माँ न थी। अपनी माँ थी, उसे सबसे छोटा समझकर बाकी बेटों के हिस्से से सारी जिंदगी काटकर खिलाती रही। वे दोनों नहीं पढ़े मगर इसको खूब किताबें खरीदकर लाकर दी। बी. ए. फेल हुआ तो दोबारा इम्तिहान दिलवाया फिर वकालत की पढ़ाई करवाई कि मेरा बेटा एक दिन नामी वकील बनेगा। कोर्ट में वकालत करेगा। मेरे दुख - तकलीफ के दिन लद जायेंगे। मैं भी दूसरों की तरह बेटे की कमाई से सुख करुंगी ... मगर बेटा हुआ क्या, मैं अपने ही घर में लावारिस लाश की तरह पड़ी हूं। कोई पूछनहार नहीं मेरा।
यह कहते हुए वह मेरे चेहरे की ओर ताकने लगी, फिर बोली - यह न जाने कैसे चुड़ैल की चक्कर में पड़ गया कि जो बेटा निकाह से पहले मेरे साथ खाना बनाने में हाथ बंटाया करता, बिना कहे मेरे कपड़े साफ कर देता। बिना कहे घर से बाहर नहीं निकलता था। आज वही बीबी को कहता है कि माँ कुछ अनाप शनाप बोलती है तो झौंटा पेर कर मारो और उसने पिटवाया भी। घर खाली करने को कहती हूं तो कहता है पहले मेरे तीस हजार रूपये लौटाओ। बेटा, मैं तो दुआ करती हूं कि यह जिस रास्ता जाता है लौटकर घर का मुंह न देखे। मैं बिन औलाद की ही भली। और चची ने जमीन पर हिकारत से थूक दिया।

 पता - संपादक कथासागर, लेखनी प्रकाशन,  6/ सेक्टर - 2, हारून नगर कालोनी, फुलारीशरीफ पटना,

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