इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 16 जून 2013

बइला अउ पंडित

उत्तर भारत की लोककथा का छत्तीसगढ़ी रूपातंरण

  • अनुवादक - दिनेश चौहान
नवा ह छागे अउ जुन्‍ना नंदागे नोनी बाबू हो. तइहा के बात हे, जउन ल बात - बात में केहे जाथे तइहा के बात ल बइहा ले गे. एक ठन तइहा के बात में ह घानी अउ  घानी के बइला के बारे मे बताना चाहत हौं. आज तो तेल पेरे के मशीन आय घलो सौ अकन बछर ले घलो जादा होगे होही. आज तेली जात के नवा पीढ़ी के लइका मन ल घानी के बारे में पूछहू तौ काय घाय ए कहिके मुँहु ल फार दीही. फेर एक जमाना में तेली मन के पुस्तइनी धंधा रिहिस तेल पेरना. एखरे सेती ओखर जात के नाव तेली परे रिहिस. तेली मन घानी में एक ठन बइला ल फांद दे अउ ओखर आंखी में टोपा बांध दय  जेखर से ओला पता झन चलय के ओहर एके जगाच किर मारत हे.
अइसने एक ठन गांव में एक झन तेली ह घानी में तेल पेरत राहय . ओखर बइला के गर म बंधाय  घंटी बइला के रेंगे ले बाजय अउ बइला खड़े हो जाय तो घंटी बाजना बंद हो जाय . तेली ओला फेर सोंटिया के रेंगा दय . कुछ देर बाद तेली अपन बइठे के जघा में बड़का पखरा रख के अपन दूसर काम में भिड़ जाय . ऐती बइला समझे के तेली अपन जघा में बइठे हे. ओ बिचारा डर के मारे चकिर मरई ल बंद नी करय .
एक दिन ओ गांव में एक झन पंडित आइस. वो ह तेली के घानी, बइला, बइला के गर म घंटी अउ पखरा के बारे सुनिस त देखे ल चल दिस. अउ देखिस - घानी में बइला फंदाय हे, बइला के गर में घंटी बाजत हे. अउ तेली के बइठे के जगा में पखरा रखाए हे. ओखर दिमाग मे कइ ठन सवाल उठ गे. ओ ह तेली से पूछिस - अरे भई, बइला के गर में घंटी काबर बांधे हस ?''
- ऐ पाय  के महराज के बइला रेंगना बंद कर दिही त घंटी बाजना बंद हो जही अउ मोला गम लग जाही.'' तेली जवाब दिस.
- अउ पखरा ल काबर रखे हस ?''
- ऐ पाय के के बइला समझे पाछू म बइठे हौं. अउ रूक हूं त फेर परही सटाक ले.'' तभो ले पंडित के मन नी माढ़िस. एक ठन सवाल अउ पूछिस - ते तो अन्ते काम - बुता में भिड़े हस एती बइला खड़ा हो के मुड़ी हला के घंटी बजात रिही त तैं कइसे जानबे ?''
- महराज, बइला अतका ल जानतिस त घानी में काबर फंदातिस. वहू तोरे कस पंडित नी बन जातिस ?''
  • पता- शीतला पारा, नवापारा (राजिम) जिला - रायपुर (छ.ग.)

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