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मंगलवार, 25 जून 2013

कृषि - संस्‍कृति और हरेली


डॉ. गोरेलाल चंदेल

       मानव समाज के विकास की गति को निर्धारित करने में संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आदिम मानव से लेकर आधुनिक और उत्तर आधुनिक मानव तक का इतिहास संस्कृति के विकासमान मूल्यों का इतिहास है। आखेट युग, पशुपालन युग, कृषि युग और औद्योगिक युग में उत्पादन संबंधों को निर्धारित किया होगा और इसी द्वन्दात्मकता के आधार पर संस्कृति विकसित हुई होगी। उन्होंने झरनों की झर - झर और नदी की कल - कल ध्वनि से गाना सीखा होगा। प्रकृति की ध्वनियों की व्यंजना का अर्थ विस्तार मानव समाज तक हुआ होगा। प्रकृति में उगने वाले पेड़ पौधों के फल, फूल अथवा दानों के उपयोग से भोजन की संस्कृति विकसित हुई होगी। पत्तों के भरभर की आवाज ने गुन गुनाना सिखाया होगा। हवा के झोकों से लहराती डालियों ने नृत्य की लचक पैदा की होगी। मनुष्य ने प्रकृति की विविध ध्वनियों से गाना की ध्वनियों को जन्म दिया होगा। प्राकृतिक सामाजिक की यही व्यंजना समाज और संस्कृति के मूल तत्व माने जा सकते हैं।
       कृषि संस्कृति में प्रकृति के रहस्य को लेकर तरह - तरह की कल्पनाओं की व्यंजना दिखाई देती है। लोक जीवन ने प्रकृति में जिन चीजों में रहस्य की अनुभूति की उसमें ब्रहा्र ी ध्वनि की परिकल्पना कर ली। यह ब्रहा्र उन्हें अधिदर्शन के माध्यम से प्राप्त हुआ। अधिदर्शन ने ब्रहा्र के विस्तार की भारतीय दर्शन, भारतीय वांगमय और भारतीय भाषा में लम्बी और सुदीर्ध परंपरा रही है। कण - कण में भगवान की भारतीय अवधारणा प्रकृति में ईश्वरवाद और देववाद का सांस्कृतिक मूल्यों के रुप में निरन्तर रुपांतरण होता रहा क्योंकि लोक संस्कृति में ईश्वर अथवा देव शब्द के गुण - गुणात्मक की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना के साथ निरन्तर गतिमान द्वन्द दिखायी देता है। यही गतिमान द्वन्द कृषि संस्कृति के जीवन मूल्यों का भी द्वन्द बन जाता है। इसीलिए अधिदर्शन के ब्रहा्र, ईश्वर अथवा देव को कृषि संस्कृति के जीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। न ही सांस्कृतिक मूल्यों को अथवा कृषि लोक की संस्कृति को मात्र संरचनावादी अथवा तत्ववादी माना जा सकता है। अधिदर्शन और लोक जीवन के  द्वन्द की निरन्तरता के कारण इसका विखंडन किया जाना भी संभव नहीं है। कृषि संस्कृति से जुड़े हुए लोक के ईश्वर और जीवन, देव और कृषि उत्पाद, बैल और नंदी, मिट्टïी और दुष्टïादेव, प्रकाश और अग्नि, बरगद और ग्रहन, गोवर्धन और साहड़ा देव, धान की बालियाँ और अन्नपूर्णा देवी, गेहूं के बीजों का अंकुरण और देवी पूजा को अलग - अलग विखंडित करके देखा जाना कृषि संस्कृति में संभव नहीं है। वहां गेंहू और धान, चना और लाखड़ी, कोदो और अरहर, एक ओर सांस्कृतिक मूल्य हैं तो दूसरी ओर जीवन मूल्य भी हैं। इसलिए यहां विखंडन की सुविधा नहीं है।
       कृषि संस्कृति में समूचा गाँव एक इकाई के रुप में कार्य करता है, शरीर के विभिन्न अंगों की तरह अलग - अलग जातियाँ होती हैं किन्तु ये सभी जातियाँ कहीं न कहीं कृषि से जुड़ी रहती हैं और उस संस्कृति को विकसित करने भी अपनी - अपनी भूमिका निभाती हैं। जिस तरह शरीर में हाथ, पैर, आँख, कान, नाक, मुंह की स्वतंत्र सत्ता भी होती है और शरीर का महत्वपूर्ण अंग होने के नाते शरीर के विभिन्न कार्यों को अंजाम देने का कार्य भी करते हैं। उसी तरह जातियों की स्वतंत्र सत्ता भी होती है और कृषि कार्य के विभिन्न अवयवों को विभिन्न जरुरतों को पूरा करने में अपनी भूमिका निभाती है। जिस तरह आँख, कान, नाक, हाथ, पैर की स्वतंत्र सत्ता के बावजूद शरीर से विखंडित कर न तो अलग किया जा सकता है न अन्य अंगों से अलग कर उन्हें जीवित रखा जा सकता है। उसी तरह शरीर की संरचना की व्याख्या करते समय भी उसे अलग - अलग जातियों वंशों अथवा नस्लों में बांटकर नहीं देखा जा सकता। इसलिए जातिवादी, वंशवादी, नस्लवादी संस्कृति के रुप में कृषि संस्कृति को व्याख्यायित करने की अवधारणा, संस्कृति के जीवन तत्वों को नष्टï करने जैसी होगा। जिस तरह शरीर के विभिन्न अंगों और अवयवों के बीच द्वन्दात्मक संबंध होता है और यही उसकी गति की जो जारी रखने की महत्वपूर्ण क्रिया होती है वैसे ही कृषि संस्कृति में विभिन्न जातियों के बीच द्वन्दात्मक संबंध होते हैं। सबकी गति अलग - अलग दिखाई देती है किन्तु उनका काम और उनकी गति मूल गति अर्थात केन्द्रीय गति का ही एक हिस्सा है। संरचना के केन्द्र में कृषि की संस्कृति होती है और संरचना के अन्य रुप रुपाकात्मक इस केन्द्र के द्वन्द से संचालित होते हैं।
       फलस्वरुप कृषि संस्कृति से जुड़े हुए ग्राम समाज की सांस्कृतिक संरचना में अपने - अपने कार्यों के अनुसार देववाद का विस्तार और रुपान्तरण होता है। निहई, सँड़सी, हथौड़ा और धौंकनी में देवत्व का दर्शन केवल लुहार को होता है। बढ़ई को उसके आरी बसुला, बिंधना, भवारी और पटासी में देवत्व का दर्शन होता है। राऊत लाठी, कमरा, खुमरी और बंशी में देवता का रुप देखता है तो मोची नाहना और जोता मे किसान अपने बैलों में, धान अथवा गेहूं के लहलहाती फसलों में, हल में, गाड़ी और गाड़ी के अन्य अवयवों में, हंसिया और कुदाली में, बीज बोनी में, अनाज के ढेर और कलारी में, दौरी के मेड़वार में, देवता के विभिन्न रुपों को देखते हुए अपने कृषि कर्म में इसका विस्तार और रुपान्तरण करता है। इन देवताओं को अलग - अलग विखंडित कर के नहीं देखा जा सकता। हंसिया का देवत्व फसल की निंदाई, गुड़ाई और कटाई से जुड़ा हुआ है। बैलों का देव रुप हल की जुताई और फसल लाने के लिए गाड़ी की ढुलाई और फसल की मिसाई में ही उभरता है। इस तरह देवत्व एक - दूसरे से जुड़ा हुआ है। एक दूसरे को देवता बनाने में एक - दूसरे के सहयोग की निरन्तरता बनी रहती है। अत: इन निरन्तरताओं से काटकर, विखंडित कर उनके देवत्व को न तो सार्थक बनाया जा सकता है और न ही उनकी व्याख्या की जा सकती है। इसी तरह अन्य जाति के देवों के भी दूसरे सांस्कृतिक देवों से जुड़ाव की निरन्तरता को कृषि संस्कृति के अभिनव तत्वों और केन्द्रीय शक्तियों के रुप देखा जा सकता हैं।
       कृषि संस्कृति समूहवादी संस्कृति हैं न तो उनकी खेती किसानी का कार्य ऐकांतिक है और न ही उनके गीत या नृत्य एकल  हुआ करते हैं। सुआ, ददरिया, करमा, भोजली, सोहर या विवाह गीतों में समवेत स्वर के साथ ही साथ समूह की सक्रिय भागीदारी को आसानी से देखा जा सकता है। न छत्तीसगढ़ के नाचा में जोकर अकेले नाचते पाएंगे न परी को। जब तक साथ मिलकर नाचते हैं, गाते हैं ऐसा लगता है प्रकृति की अपनी समूहवादी विज्ञान का प्रभाव कृषि संस्कृति पर पड़ा होगा। जंगल के विभिन्न पेड़, पौधों को एक साथ अंकुरित होते हुए एवं बढ़ते हुए देखना। जंगल के जानवरों का अपने - अपने समूह में एक साथ घूमना, कोदो की खेती में तिल, उड़द, मूंग, ज्वार, अमारी, अरहर, पटसन आदि पौधों का एक साथ होना हमारी इस समूहवादी संस्कृति का ही प्रेरणा स्त्रोत दिखायी देता है। मानव समाज को प्रकृति की इसी समष्टिïवादिता ने समूह की चेतना दी होगी और दलीलों से और समाज में एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित होकर फिर भी स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए जीने की चेतना जागृत हुई होगी। यही चेतना, प्राकृतिक सामाजिक द्वन्द के साथ गतिमान तक चली आ रही होगी। इस संस्कृति के तीज - त्यौहर में भी इस विशेषता ने उनके भीतर के घनघोर व्यक्तिवाद को विकसित होने से रोका होगा। फलस्वरुप उनमें व्यक्तिगत स्वार्थ उतना बलवती नहीं हो पाया जितना औद्योगिक संस्कृति या आधुनिक पूंजीवादी संस्कृति में दिखायी देता है। इस समूहवादी संस्कृति के कारण ही एक - दूसरे के प्रति सहयोग की भावना तथा एक - दूसरे के दुख - सुख के प्रति संवेदनशील होने की भावना इस संस्कृति के मूल में दिखायी देती है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद में संस्कृति की इन विशेषताओं पर कठोर प्रहार हो रहा है और व्यक्तिवाद को मनुष्य की जरुरी जीवन मूल्यों के रुप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। फिर भी सामूहिकता के अवशेष कृषि संस्कृति में देखने को मिल सकते हैं।
       हरेली कृषि संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण अवयव है। हरेली शब्द वस्तुत: हरियाली का तत्भव हो सकता है। मानव समाज के विकास की प्रक्रिया में जब कृषि युग आया होगा। जब तत्कालीन मानव समाज ने भोजन के रुप में उपयोग की जाने वाली जंगली चारों के बीज को सुनिश्चित करने की बात सोची होगी। उनकी कल्पना में जब कृषि का मॉडेल बना होगा तब उन बीजों की कृषि शुरु की गई होगी। बेहद अनगढ़ प्रौद्योगिकी के द्वारा जंगल को साफ किया गया होगा। उस पर हल चला होगा। बीज डाले गए होंगे। बरसात में उसे अंकुरित किया होगा और धरती की आँचल जब धानी होकर लहराने लगा होगा तब चेतना और कदचना के द्वन्द से सिद्धान्त और व्यवहार के द्वन्द से हरेली का जन्म हुआ होगा। उन्होंने अपने श्रम से उत्पन्न हरियाली पर उत्सव मनाया होगा। अपनी पहली सफलता की खुशी से उनके पैर थिरकने लगे होंगे और मन गुनगुनाने लगा होगा। उन्होंने अमावस, सावन की अमावस के उत्सव के लिए नियत किया, क्योंकि जिंदगी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता, भोजन की आवश्यकता को अनिश्चय  के अंधकार पर विजय प्राप्त करने की खुशी के रुप में देखा होगा। एक नई संस्कृति का जन्म हुआ होगा, श्रम की विजय को त्यौहार के रुप में मनाने की संस्कृति का। इस विजय में सहयोग करने वाले उपकरणों में तत्कालीन मानव को ईश्वर अथवा देवता का रुप दिखायी दिया होगा, जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। उस तरह धार्मिक मूल्य, सांस्कृतिक मूल्य और जीवन मूल्यों की अन्योनाश्रित श्रृंखला बनी होगी जो सांस्कृतिक परंपरा के रुप में विकसित होकर आधुनिक युग तक आई होगी और साथ ही साथ प्रकृति के साथ जुड़कर जीवन मूल्यों का मानवीय मूल्यों में रुपांतरण हुआ होगा। इतिहास की विकास मान गति के साथ इसमें परिवर्तन होता रहा होगा। किन्तु कृषि संस्कृति के उत्पादक संबंधों में परिवर्तन की दिशा और गति के अनुरुप ही परिवर्तन हुआ होगा। इसीलिए कृषि संस्कृति में संस्कृति और कृषि प्रौद्योगिकी का देवत्व एक साथ दिखायी देता है। हरेली के दिन किसान, मजदूर, पौनी - पसारी सभी लोग अपने पशुओं की पूजा करते हैं। यह पशु पूजा लोक जीवन में नंदी पूजा की परंपरा का विकसित रुप माना जा सकता है। कृषि संस्कृति में बैल और गाय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसके बिना कृषि कार्य संभव नहीं हो सकता। बैल हल खींचकर धरती की उर्वर बनाने तथा अच्छी फसल के लिए जमीन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फसल को घर तक लाने के  लिए वह गाड़ी खींचता है। फसल की मिसाई में दौरी या बेेलन खींचता है। अत: वह इस संस्कृति के जीवन मूल्य की हिस्सा बन जाता है। इसलिए हरेली के दिन फसल की पहली हरियाली में किसान बैलों की पूजा करते हैं। गायें, बैल देती है। साथ ही अच्छी फसल के लिए गोबर खाद देती है। उसकी पूजा भला कैसे नहीं होगी। पूजा का विधान भी देशज ही है। पूजा साम्राग्री के रुप में इन पशुओं के सहयोग से उत्पादित अन्न आदि का प्रयोग होता है। चावल के आटे से लोंदी बनायी जाती है। लड्डू के आकार की। उसे कॉसे की थाली अब स्टील की थाली में रखकर ऊपर से कपड़ा ढककर किसान, मजदूर, पौनी - पसारी गौठान आते हैं और अपने - अपने पशु को बड़े प्यार और पुचकार के साथ लोंदी खिलाते हैं। लोंदी बनाते समय प्रकृति के उपहार के रुप में प्राप्त जड़ी, जो पशुओं को वर्षाजन्य बीमारियों से मुक्त रख सकती है, कूटकर लोंदी में मिलाते हैं। इस तरह से हरेली के दिन प्रथम मौका अपने कृषि कार्य के महत्वपूर्ण संसाधन बैल को लोंदी खिलाकर तथा उनके स्वास्थ्य के प्रति निंंश्चित होकर हरेली के त्यौहार का शुभारंभ करते हैं। लोंदी की बचे हुए आटे का अंगाकर बनाकर प्राय: घर भर के लोग अवशिष्टï पदार्थ को प्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं।
       हरेली के दिन सिकान अपने कुल देवता की पुनर्रचना कर पूजा करते हैं। अधिकांश घरों में कुल देवता दुष्टïादेव के रुप में स्थापित रहात है। दुष्टïादेव शिव का ही लोक रुप है। लोक संस्कृति में इस लोक रुपांकर शिव की संरचना भी लोक में उपलब्ध लोकोपयोगी वस्तु तत्वों से प्रतीकात्मक आकृति के रुप में किया जाता है। यहां अधिदर्शन में वर्णित शिव के रुपाकारों को न तो मान्यता मिल पायी है और न ही लोक समाज की रुचि कुल देवता के रुप में शास्त्रीय संरचना करने की रही है। जिस मिट्टïी को कृषि संस्कृति में जीवन का सबसे बड़ा आधार माना गया है उसी मिट्टïी से एक छोटा सा चबूतरा बना दिया जाता है। इसमें विभिन्न रंगों की दो - चार छोटी - छोटी झंडियाँ गाड़ दी जाती हैं और हो गया कुल देव का एक खूबसूरत कोलाज। कहीं - कहीं इसमें एक छोटा त्रिशुल भी गाड़ दिया जाता है। हरेली के दिन गेहूं खेत की मिटï्टी लाकर इस देव की  पुनर्रचना की जाती है। गेहूं का खेत पारंपरिक फसल चक्र की दृष्टिï से अब कोदो का खेत हुआ करता है। कोदो की अंकुरित फसलों की हरियाली के बीच से मिटटी लाकर कुल देवता के चबूतरे के ऊपर परत चढ़ा दी जाती है और बरा - सोहारी चढ़ाकर उसकी पूजा की जाती है। इसके पीछे अच्छी फसल की कामना ही सर्वोपरि होती है। नई मिट्टïी का कुलदेव को अर्पण और उससे श्रृंगार के पीछे उस मिटï्टी की  उर्वरा शक्ति की रक्षा का भार कुलदेव को सौंपकर अच्छी फसल के प्रति आस्था और विश्वास के पुख्ता होने की आश्वस्ति ही इस पूजा के मूल में मौजूद होती है।
       कृषि संस्कृति में कृषि प्रौद्योगिकी की पूजा भी की जाती है। हरेली के दिन इन प्रौद्योगिकियों में किसान और संस्कृति से जुड़े हुए समूचे गांव को देवता का दर्शन होता है इसीलिए किसान अपने हल, हंसिया, कुदाल, फावड़ा, कुल्हाड़ी आदि को तालाब में ले जाकर धोता है। लुहार अपने सड़सी, एवं हथौड़ी को धोता है। बढ़ई अपने बासुला,आरी, बिंधना, पटासी एवं भवारी को धोता है। इन्हें रगड़ - रगड़ कर साफ धोकर अपने - अपने घर में लाकर तुलसी चौरा के पास एक खूबसूरत कोलाज बनाते हुए रखा जाता है। इसके बाद घर की मुखिया इन सबकी पूजा करता है। जो किसान हरेली के दिन अपने कृषि औजारों को नहीं धोता उसे नांगर चोर कहा जाता है। कृषि संस्कृति की यह अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता है कि वह अपने जीवन गत व्यवसाय के बाहर किसी देव की कल्पना ही नहीं करती। याने उनका देव उनके जीवन का अभिन्न अंग है। उनका देव क्षीरसागर में शेषशैय्या पर सोने वाले, कैलाश पर्वत को लगाने वाला या कमल के आसन पर बैठे चार मुखों वाला देव नहीं है। कृषि संस्कृति में इन देवों का स्थान औपचारिक देव के रुप में जरुर दिखायी दे सकता है। किन्तु उनके जीवन में एक - एक तार से जुड़े हुए उनके जीवन के एक - एक तारों को झंकृत करने वाले, उनके जीवन की हंसी के साथ हंसने वाले, इनके आंसुओं के साथ रोने वाले में उनकी फसलों के साथ मुस्कराने वाले, खलिहानों ने पीले - पीले दानों की स्वर्ग राशि बिखरने वाले अनौपचारिक देव तो यही हल, कुदाल, हंसिया, फावड़ा, कुल्हाड़ी, सड़सी, हथौड़ी और बिंधना बासुला ही है। इसीलिए जिस आशा और विश्वास से आस्था और श्रद्धा से, भावना और कामना से इस संस्कृति में अनौपचारिक देवताओं की पूजा होती है उतनी आस्था और श्रद्धा से औपचारिक देवताओं की पूजा नहीं होती। कृषि संस्कृति में प्रकृति देवोभव होती है। देवत्व का सर्वाधिक गरिमापूर्ण स्थान इन्हीं अनौपचारिक देवताओं का होता है।
       हरेली के दिन कृषि संस्कृति का एक और महत्वपूर्ण रूप गेड़ी दिखायी देता है प्रकृति की हरियाली की खुशियों और फसलों का हरियाली की खुशियों जब अद्घैत हो जाती हैं तब ब्रम्हानंद की तरह खुशियां धरती की गोद में नहीं समा पाती ऐसा लगता है कि ग्राम्य जीवन अपनी खुशियों में धरती से ऊपर उठने लगता है और इसे जाहिर करने के लिए तैयार करता है गेड़ी . गेड़ी की संरचना में भी वन से प्रारंभ होने वाली कृषि संस्कृति की मजबूत परंपरा दिखायी देती है. बांस की डाड़, बांस के ही पाऊ बांस की खीली और पटसन की रस्सी. सब कुछ प्रकृति से प्राप्त कर प्राकृतिक आनंद की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनाया जाता है. कहीं एक फूट में पाऊ लगा है तो कहीं दो फूट और कहीं चार फूट में. जहां डाड़ में पटसन की रस्सी या नारियल बूच की रस्सी बांधी जाती है वहां घासलेट डालकर धीमी ऑच में पकायी जाती है फिर उसमें से निकलने लगती है ध्वनियॉ चोई..रोई..चोई..रोई और बालक, किशोर और युवाओं की मंडली मचने लगती है गेड़ी. गॉव की गलियॉ गूंज उठती है, आदिम संगीत से. एक सुर, एकलय, एक ताल में किन्तु संगीत शास्त्र के बंधनों से मुक्त. ठेठ लोक अथवा ग्राम्य संगीत. चोई..रोई का समवेत स्वर है धरती से एक फुट, दो फुट,चार फुट ऊपर उठकर भी धरतीं से जुड़ी हुई खुशियों की यह ग्राम समाज की अनुपम अभिव्यक्ति हैं. गेड़ी मचने की होड़ सी मच जाती है। कहीं एक गेड़ी को कंधे में लेकर एक गेड़ी पर धरती में कूदते हुए हरेली की प्रसन्नता मिश्रित अदभूत साहस का प्रदर्शन जो अधिक बार कूदने में कामयाब हुआ, उनकी छाती विजय भाव से फूलकर चौड़ी हो जाती है। हरेली के इस मंगल भाव की लोक चेतना की मंगल भावना के प्रत्यक्षीकरण के रुप में देखा जा सकता है।
       कृषि संस्कृति में हरेली के दिन प्रकृति की हरियाली को घर के भीतर तक लाने का काम राऊतों अथवा नाईयों को सौंपा गया है। प्रकृति के हरियाली के प्रतीक के रुप में नीम का गाछ, हरी डालियाँ हर घर में खोंची जाती है। इसके पीछे कृषि संस्कृति के जन्मदाताओं की वैज्ञानिक दृष्टिï भी दिखायी देती है। नीम प्रदूषरोधी और कीटरोधी है। शायद इसीलिए प्रकृति की हरियाली को घर के भीतर लाने की अवधारणा में नीम की डालियों का चुनाव किया गया होगा। जिसने परंपरा के विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक क्रिया के रुप में स्थान बना लिया होगा। उसके पीछे - पीछे टुकना टोकरी लेकर राऊतों नाइयों की पत्नियाँचलती है। बिजटुखनी वसूली के लिए। पूर्वमें कहा जा चुका है कि कृषि संस्कृति की रचना और विकास में ग्राम समाज के सभी व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। इस संस्कृति में सबकी हिस्सेदारी से इंकार नहीं किया जा सकता। किसान खेती के लिए पहले से ही बिजहा संग्रहित करके रखता है। खेतों में बीज डालने के बाद बीज का कुछ हिस्सा बच जाता है न भी बचे तो भी बचा हुआ मान लिया जाता है। बचे हुए भाग में किसान का एकाधिकार नहीं होता, क्योंकि यह संस्कृति ही एकाधिकार वादी न होकर सर्वाधिकारवादी होती है। इसलिए बचे हुए बीजा में राऊत, नाई, लुहार, धोबी सबकी हिस्सेदारी होती है। और इसी कारण से हरेली के दिन बिजटुखनी मांगने की परंपरा है। इस अधिकार में कोई नापतौल वाले हिस्से की परंपरा न होकर स्वेच्छा से देने की परंपरा है। जो मिला उसे ही बचे हुए बीज में अपने हिस्से के रुप में स्वीकार कर लिया जाता है। फिर वसूले गए बिजखुटनी को सारे पौनी आपस में बैठकर बाँट लेते हैं। इसके लिए न झगड़ा न लड़ाई, न कम ज्यादा की शिकायत। सभी कुछ संस्कृति की समूहवादी चेतना के उच्चतर और उदात्त रुपों की अभिव्यक्ति के रुप में दिखायी देता है।
       हरेली की उक्त परंपराओं के बाद अपरान्ह शुरु होता है त्यौहार की खुशियों का सैलाब। श्रम सीकर के बीच जीवंतता को ऊर्जावान बनाने का उपक्रम। तरह - तरह के खेलों के रुप में। अलग - अलग झुंडों में। अपने - अपने हम उम्र लोगों के झुण्ड। कहीं प्रौढ़ो और वृद्धों  की महफिल जमी हुई है और रामकथा चल रही है। मानस का सस्वर पाठ और फिर उसकी अर्थ मीमांसा। कहीं किशोरियों की महफिल जमी हुई है शायरी खो - खो, और फुगड़ी विभिन्न खेलों में अलग - अलग झुण्ड। कहीं बच्चों, किशोरों और जवानों की गेड़ी, कहीं खुडुवा और कहीं गिल्ली - डण्डा। हर तीज त्यौहारों में अपरान्ह रामकथा का स्वाभाविक आयोजन होता रहा है। यह रामकथा का तात्विक अनुशीलन होने के बाद भी मानवीय मूल्यों के सूत्र में पूरी कथा पिरोयी हुई रहती है। ग्राम समाज के श्रोतागण तात्विक अनुशीलन में भी अपने अनुरुप मूल्यों की तलाश कर लेता है। ग्राम समाज कहाँ से मानवीय मूल्यों की रचना करता है, उसे सघन बनाने के लिए कहां - कहां तत्व चुनता है, उन मूल्यों की चमक बढ़ाने के लिए जिन्दगी के किन अनुभवों से प्रकाश लाता है, इसका विश्लेषण कर पाना संभव नहीं है। इसलिए कृषि संस्कृति ग्राम द्वारा निर्मित और उनके ही द्वारा विकसित संस्कृति है जो किसी शास्त्रीय व्याख्या की मुहताज नहीं। उनके अपने पेड़ हैं, पुष्प हैं, पुष्प की गंध है जिसमें बनैलेपन के साथ ही साथ जीवन की ऊर्जा और जीवंतता के तत्वों का सृजन स्वाभाविक रुप से होने लगता है। रामकथा या रामायण उनके इन्हीं मूल्यों का एक अभिन्न अंग है।
       किशोरियाँ लाल, पीली, नीली लुगड़ी पहने मगन हैं अपने खेलों में। हरेली उनके लिए मात्र त्यौहार नहीं हैं वरन कल खेतों में काम करने के लिए पुन: ऊर्जा का संचलन है। कहीं रायरा है जहां एक किशोरी नमी युक्त जमीन में खीची गई लकीरों से बचते हुए आँख बंद करके कूद रही है। उन लकीरों के माध्यम से खेल का मैदान बनाया गया है जो उन्हीं लकीरों के माध्यम से दो भागों में बँटा हुआ है। और आड़ी लकीर खींचकर छोटे - छोटे खाने बनाए गए हैं। कहीं तीन तो कहीं चार, विभाजन की रेखा के दोनो ओर बने खाने में आँख बंद कर रायरा है रायरा है का उदï्घोष करती हुई वह कूदती जा रही है। विभाजन रेखा या खानों की रेखा में स्पर्श हुई नहीं कि उसे फाउल मान लिया जाता है। यह जिन्दगी की उमंग है जिनका अपना नियम, अपना पर्याय और अपनी व्यवस्था होती है। जिसे दुनिया की किताबों में ढूंढ पाना असंभव नहीं तो मुश्किल जरुर है। उसी तरह कुछ किशोरियां खो - खो के खेल में व्यस्त हैं। एक लंबी लाईन में पांच - सात किशोरियां घुटने के ऊपर तक अपनी लुगड़ी बांध कर बैठी हुई है। टीम की मुखिया एक ओर पर खड़ी हुई है और विपक्षी टीम की मुखिया दूसरे ओर पर। विपक्षी टीम के शेष सदस्य बैठने वाले हैं। टीम में इर्द - गिर्द खड़े हुए हैं। बैठने वाली टीम की मुखिया खेल प्रारंभ करते हुए कहती हैं - अतका बाड़का दूसरी टीम की मुखिया दूसरे छोर से जवाब देती है - खम्हार पहली टीम की मुखिया फिर अपने छोर से कहती हैं - तोर लइका पिचका ला सम्हार। और दौड़ पड़ती हैं। विपक्षी टीम को छूने के लिए। बीच - बीच में बैठे हुए सदस्यों को उठाकर उसके स्थान पर स्वयं बैठ जाती है। फिर उठी हुई किशोरी को छूने के लिए दौड़ने लगती है। इस तरह यह खेल तब तक चलते रहता है जब तक विपक्षी टीम के सारे सदस्य छुआकर आउट न हो जाय। न जीत - हार की आपा- धापी, न जीत का सेहरा बांधने की मनोकामना, यह तो बस खेल है, खेल के लिए खेल।
       फुगड़ी भी आम तौर पर लड़कियों का ही खेल है और यह प्राय: हरेली के दिन खेला जाता है। किसी बरवट या चबूतरे में फुगड़ी जमी होती रही है। यहां गोल घेरे में 8 - 10 की तादाद में लड़कियाँ बैठ जाती है और उनमें से एक खेल प्रारंभ करने के लिए सस्वर गीत की शैली मे बोलती है या गाती है - गोबर दे बछरु गोबर दे, चारों खूट ला लीपन दे, चारों देरानी ला बैठन दे, अपन खाथे गुदा - गुदा, मोला दे थे बीजा, वो बीजा ला का करहूं रहि जाहूं तीजा, तीजा के बिहान दिन सरी - सरी लुगरा, हेर दे भौजी कपाट के खीला, एक पांव म लाल भाजी एक पांव मा खजूर, कतेक ला मानो मैं देवर ससुर। और शुरु हो जाती है फुन - फुन, फुन - फुन फुगड़ी सभी एक साथ विशेष लय - ताल में बैठे पैरों का संचालन करती हैं, कभी पैरों का संचालन करते हुए खड़े होना और बैठ जाना, एक अद्भूत ऊर्जायुक्त पद संचालन, हाथ का संचालन, कायिक भाव और भावाभिमुद्रा, जो थककर पैर संचालन की गति को निरन्तर बनाए रखने में असफल होती है, उसे आउट माना जाता है। अंत तक जो निरंतर पद संचलन में कामयाब होती है उसे विजयी माना जाता है। उसमें भी न हार का दुख न ही जीतने की खुशी, न विजय गर्व और हार की निराशा न मेडल न इनाम, बस खेल है, खेल के लिए, निर्मल आनंद के लिए खेल।
कृषि संस्कृति के इन रुपों में मनुष्य और समाज की सत्ता के प्रति गहरी आस्था दिखायी देती है। संस्कृति और जीवन को साथ - साथ देखा जा सकता है। इस संस्कृति का अभिधेयार्थ भी मानव मूल्य है और लक्ष्यार्थ और व्यंजनार्थ में भी मानव मूल्य की गहराई दिखायी देती है। किन्तु उत्तर आधुनिक जीवन - शैली का धीरे - धीरे गाँवों में प्रवेश होने लगा है, कृषि संस्कृति भी उससे प्रभावित होने लगी है। गांव की संरचना अब बिखरने लगी है। जातिवादी भावनाएं सर उठाने लगी है, समूह की चेतना व्यक्तिवादी लबादा ओढ़ने लगी है।
       फिर भी वर्तमान समय में संस्कृति के उच्चतम उदात्त रुपों की थोड़ी बहुत संभावना बची है तो वह कृषि संस्कृति में ही बची है। आने वाला समय बताएगा कि इन संभावनाओं में कितना कुछ शेष रह पाता है, यों तो इतिहास के लंबे दौर में कृषि संस्कृति ने निरन्तर अपनी विशिष्टता की रक्षा की है। काल के दबाव को सहर्ष झेलती रही है। परन्तु उत्तर आधुनिकता का दबाव पिछले अन्य दबावों से अधिक शक्तिशाली है, फिर भी हमें कृषि संस्कृति की जीवंत शक्ति पर पूरा भरोसा है।
पता
दाऊ चौरा, 
खैरागढ़ जिला - राजनांदगांव [ छत्तीसगढ़ ]

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