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गुरुवार, 20 जून 2013

कबीर की प्रसांगिता एवं उनके राम की शाश्‍वत सत्‍ता

पल्‍लव शुक्‍ल 
       कबीर के राम किसी व्यक्ति विशेष के, देश विशेेष के अथवा काल विशेष के आदर्श पुरूष नहीं हैं अपितु मानवजाति के सार्वकालिक और सार्वदेशिक आदर्श पुरूष हैं, जैसे कोई चित्र देश विशेष या काल विशेष का हो सकता है किंतु दर्पण स्वयं को ही प्रतिबिंबित करता है, इसलिए उसकी प्रांसगिकता कभी समाप्त नहीं होगी।
       कबीर ने सर्वोच्च सत्ता के लिए बहुत सोच - विचार कर राम का नाम दिया है। राम भारत के जनमानस में सर्वोच्च आदर्श के मिथक हैं। कहा जाता है कि गुरू रामानंद उन्हें दीक्षा देने को तैयार न थे, एक दुर्घटनावश राम का मंत्र उन्होंने कबीर को दे डाला। जुलाहे के रूप में कपड़ा बुनते हुए कबीर ने जीवन के रहस्य को जान लिया। ताना बाना और भरनी की सरल प्रक्रिया में पूरे शरीर व भीतर प्राणशक्ति को पहचान लिया।
       शरीर के जटिल, कोमल एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवयवों को उन्होंने पहचान लिया। इस शरीर के प्रति की गई निश्चिंतता व दुरूपयोग को भी उन्होंने बहुत देखा और तब जाकर अपने लिए संकल्प लिया कि मैं इस शरीर रूपी चादर को मलीन नहीं होने दूंगा अर्थात उन्होंने साक्षी भाव प्राप्त कर लिया। आप चिंतन का अद्यतन स्वरूप इसी बिंदु पर आकर टिका है अर्थात अब तक हुए शोध के आधार पर कबीर का दर्शन कभी पुराना नहीं पड़ेगा।
इसका लाभ संपूर्ण विश्व के किसी भी व्यक्ति को दिया जा सकता है इसलिए कबीर ने अपने काल के दिग्गज पंडितों को विश्वासपूर्वक यह कहने में संकोच नहीं किया कि वे सुनी या पढ़ी बात कहते हैं किंतु कबीर जो देखता है वही कहता है -
तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी॥
       कबीर ने अपने मार्ग को सहजयानी या सहजयोगी कहा है। कबीर की साधना हठयोग व जययोग का आध्यात्मिक समीकरण है। शास्त्रीय दृष्टिï से जपयोग में जप प्रक्रिया के कई रूप हैं। वैखरी जप, उपांशु जप, मानसिक जप व अजपा जप। कबीर में अजपा जप घटित हुआ है इसलिए उनको सझना बहुत कठिन है। कबीर ने इस जग को मुसाफिर खाना या सराय कहा है। ऐसे में सब कुछ नश्वर है। यदि कहीं अनश्वरता है तो अजपा जप से प्राप्त वह आत्मज्ञान है जिसको सुलभ कर दिया कबीर ने राम सनेही कहकर -
सुन्न गरै अजपा मरे,
अनहद हूँ मरि जाय।
राम सनेही न मरे,
कह कबीर समुझाय॥
       चंद्रकिशोर पंडित के अनुसार - कबीर ने जो शून्य - शोधन, गुहï्य - गुंजन, रहस - रंजन, अंत: - स्पंदन व समाधि समंजन किया है, उसके ज्ञाता ज्ञान, गेय, माता मान में स्वयं बनते हैं। फिर एक शून्य निरंजन और अंत में वह शून्य भी शेष हो जाता हैं। कबीर साधना और अनुभूति के जिस महिमालय पर बैठे हैं, उससे उच्चतम कोई शिखर नहीं बनता।
       कबीर ने अपनी मस्ती में आकर सहज समाधि की बात की थी। बाद के भक्तों को यह शब्द इतना भाया कि सहज यानियों का एक संप्रदाय चल पड़ा। कबीर कहते हैं -
साधो सहज समाधि भली।
या
घूंघट के पट खोल रे,
तोहे पीव मिलेंगे।
आसन से मत डोल रे,
तोहे पीव मिलेंगे॥
       आज निर्गुण काव्यधारा के अन्य कवि विस्मृत होते जा रहे हैं। ऐसे समय कबीर यदि सबसे ऊपर चढ़कर बोलता है, तो उसका कारण उनकी सरलतम - साधना है। वे कहते हैं -
तू तो राम भजो, जग लड़वादे,
हाथी अपनी राह चलत है,
कुकुरवा को भुकवा दे॥
       फिर भी कोई समझे कि कबीर कोई सेंत का लड्डू है तो गलत होगा, क्योंकि उन्होंने -
हीरा पाया गांठ बंधाया,
राह बाट में क्यों खोले।
की घोषणा करते हैं, यह भी कहते हैं -
यह तो बाड़ी प्रेम की,
खाला के घर नाय।
शीश उतारे मुंई धरे,
जो आवैं यहिं खाय॥
       कहा जाता है कि तत्कालीन बादशाह सिकंदर लोदी ने उन्हें चुप कराने हेतु बहु विधि प्रयास किया और अंत में अभयदान दे दिया और उनके सहज साधना को निरापद चलने हेतु आदेश प्रसारित कर दिया। इससे सिद्ध होता है कि उनकी साधना किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विषय में नहीं थी। किंतु कबीर का हर भक्त प्राणों की परवाह न करते हुए मानवीय स्वतंत्रता की घोषणा करता है। आज भी मानव की स्वतंत्रता बीसवीं शताब्दी के आदर्श के अनुसार चरम मूल्य पर है।
       कबीर के संबंध में प्रचलित किवदंतियाँ जनमानस की अपने जननायक को दी गई श्रध्‍दांजलि है। जैसे उनका जन्म कुवांरी माता से हुआ, कमल पुष्प पर खेलते मिले, बोरे में फेंके जाने व हाथी के पैरों तले रौंदे जाने पर भी जीवित रहे। उनके मृत शरीर के लिए हिन्दू व मुसलमान के दावा करने या लड़ाई करने पर पुष्प मात्र का शेष रह जाना, इन सब में वस्तु - सत्य नहीं भाव सत्य है। हमारी भावना यह स्वीकार नहीं पाती कि चरम सत्य का इतना बेबाक प्रवक्ता सामान्य जन  की तरह जन्म लेगा, जियेगा या मरेगा। मगहर और काशी, हिन्दू - तुर्क, काबा - कैलाश के अंदर एक मात्र सत्य का उदï्घाटन कबीर ने जिस सहजता से किया, भारत के किसी दूसरे संत अथवा कवि ने नहीं किया यों कहें कबीर ने कुछ किया नहीं, हो गया। शायद कुछ करते तो न हो पाता। संस्कृत के प्रसिद्ध व्याकरणविद भर्तृहरि ने लिखा है -
       परा वाणी कभी किसी परिस्थिति में बैखरि बन ही नहीं सकती। उसे पूर्ण व्यक्तित्व से ही ज्ञात किया जा सकता है, या जिया जा सकता है, कबीर ने ऐसा ही कर दिखाया इसलिए उलटबांसी बोलने लगे तब कहीं  जाकर वह पराभाव प्रकट हो पाया।
       कबीर का सीधा प्रभाव परवर्ती कवियों पर नहीं पड़ा .किन्तु उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को बाद के प्रत्येक कवि ने अपने काव्य का ईष्टï बनाया और हिन्दी साहित्य का प्रगतिशील साहित्य तो उन्हें अपना आराध्य ही मानता है। आज बंगला साहित्य के समीक्षक भी स्वीकार करने लगे हैं कि गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के गीतांजली पर सर्वाधिक प्रभाव कबीर का ही है।
सत्य कथन और प्रिय कथन का संयोग प्राय: दुर्लभ रहता है -
हितं मनोहारी च दुर्लभं वच
       कबीर ने उस सत्य का कथन अत्यंत प्रिय दोहों, पदावलियों, सबद रमैनी में उतारने का प्रयास किया। उनका रहस्यवाद जनता का रहस्यवाद है, शास्त्र नहीं। बिहारी ने इसे :-
अर्थ टकाय ही लसै
तरूणी तुरंग तान।
       सत्य का झिलमिल प्रकाश आवरण के बाहर प्रस्फुटित हो रहा है, जो भी एक बार देखता है उसकी आँखें चौंधियाती नहीं, जैसा कि शास्त्र पढ़ने से हो जाता है। कबीर के एक शिष्य सुंदरदास कहते हैं :- शास्त्र मैं पढ़ता हूं तो नेति - नेति के चक्कर में बुद्धि भौचक्की हो जाती है, किंतु कबीर अपने राम की बहुरिया कहते हैं तो उस मधुर भाव में सब समझ में आ जाता है।''
       कबीर के पूर्व भी इस मधुर भाव का गायन उपनिषदों में हुआ है। कबीर के बाद भी जायसी एवं कई कृष्ण - भक्त कवियों ने किया है। किंतु जो दर्द, जो सजीवता, जो मुक्ति का सुख कबीर ने अनुभव कराया है, वह अन्यत्र सुलभ नहीं है।
       उनके विरोधी पंडित उन्हें गाली देकर भी उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। कबीर का अपमान करके वे स्वयं अपमानित हुए। अत: ऐसा निर्लिप्त व्यक्तित्व आज भी प्रासंगिक बना हुआ है, और भविष्य में भी बना रहेगा क्योंकि मानव जब भी अपने सत्य का साक्षात्कार करेगा, तब वहां उसे कबीर के राम ही मिलेंगे। अर्थात अहं - ब्रहा्रास्मि का ही बोध होगा।
       प्रसिद्ध भौतिकविद् ब्रोगली ने लिखा है :- पदार्थ का सूक्ष्मतम कण जो सेंटीमीटर का लाखवां भाव है, ऊर्जातरंग के रूप में बदल जाता है और इस प्रक्रिया में उसे एक सेकण्ड का तीन लाख का लाखवां भाव लगता है अर्थात पदार्थ और काल शून्य हो जाते हंै और तब आकाश स्थान भी कुछ न रहकर ऊर्जा मात्र रह जाती है।
इसी तथ्य को कबीर कहते हैं :-
तेरा सांई तुझ में
ज्यों पुहुपन में बास।
किंतु वही ऊर्जा जब पदार्थ रूप में विराट भाव से सृष्टिï में आती है तो हम भ्रमित हो जाते हैं, उसे पदार्थ में ही ढूंढने लगते हैं। जैसे कस्तूरी - मृग अपने नाभि से निकले सुगंध को वन में ढूंढता है :-
कस्तूरी कुण्डली बसै,
मृग ढूंढे बन माही।
       अत: सत्य है कबीर की सर्वप्रमुख विशेषता थी - उनका पढ़ा लिखा न होना, अन्यथा उनकी वाणी में भी प्रदूषण आ जाता , वाकचातुर्य आ जाता , तर्क - वितर्क, खण्डन - मण्डन का कौशल आ जाता।
कबीर ने हमें समझाने के लिए यह अवश्य कह दिया है कि मैंने आँखों से देखा है, जैसे रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद से कहा था किंतु ये बेचारे आँख स्वयं को तो देख नहीं पाते, ब्रहा्र को क्या देखेंगे। कबीर ने ध्यान समाधि की स्थिति में जिसे दिव्य चक्षु कहा है, जो जाना सो पाया उसे ही उन्होंने देखना कहा है। तरह - तरह के जटिल अलंकार, छंद व काव्य - प्रतीक कबीर के पूर्व भी अनहद - नाद को प्रस्तुत करने हेतु दिये जाते रहे हैं। किंतु कबीर ने जिस भाषा में रूपकों का प्रयोग किया है। उसके संबंध में कहा जा सकता है :-
निज मुख मुकुर,
मुकुर निज पानी।
गहि न जाई,
अस अदभुत बानी
- गुसांई जी
इसी शैली पर टैगोर को नोबेल पुरस्कार भी मिला है और कबीर को शाश्वत प्रासंगिकता मिली।
पता
बी 5, नेहरू नगर,
बिलासपुर (छग)

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