इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 28 जून 2013

साहित्यांचल शिखर सम्मान समारोह सम्पन्न




भीलवाड़ा। सम्मान समारोह इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्लोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट कॉलेज सभागार में सम्पन्न हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि माननीय मघराज कल्ला पूर्व मुख्य कार्यकारी न्यायाधिपति राजस्थान उच्च न्यायालय, अध्यक्षता डॉ. रत्नाकर पाण्डेय नई दिल्ली, विशिष्ट अतिथि डॉ. एन आर कल्ला, ए. बी. सिंह, रघुनाथ प्रसाद तिवारी उमंग, श्रीमती ममता मोदनी, सीताराम चौहान थे। सभी का माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। स्वागताध्यक्ष एस. एन. मोदानी ने सभी का स्वागत किया साथ ही साहित्यांचल के संस्थापक सदस्य एम. एल. मरमट, अध्यक्ष महेन्द्र प्रकाश व्यास एवं सचिव सत्यनारायण व्यास ने भी सभी का स्वागत किया। संचालन शकुन्तला सरुपिया ने किया।
मुख्य संरक्षक रामपाल सोनी द्वारा बद्रीलाल सोनी साहित्यांचल शिखर सम्मान शीनकाफ निजाम जोधपुर को एवं श्रीमती केसर बाई सोनी महिला शिखर सम्मान उदयपुर की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रजनी कुलश्रेष्ठ को प्रदान किया।
डॉ. रत्नाकर पाण्डेय एवं पद्मश्री सी . पी. देवल का वरिष्ठ साहित्यकार अभिनंदन किया गया। इसके अतिरिक्त रामगोपाल राही बून्दी, रामनिवास मानव हिसार, आनंदकौर व्यास बीकानेर, डॉ. सरोज गुप्ता आगरा, डॉ. घनश्याम बटवाल मन्दसोर, ओमप्रकाश व्यास जोधपुर, शैलजा सुरेश माहेश्वरी, अमल नेरडा, श्यामलाल काकानी, डॉ. कविता पारीक, भूपाल सिंह जैन भीलवाड़ा, डॉ. बस्तीमल सौलंकी भीम, डॉ. सुरेश माहेश्वरी, सुदीपा शुक्ला, मुक्ता संचेती, पारुल नुवाल, सुविधा बापना को भी सम्मानित किया गया। सभी को शाल, स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, श्रीफल एवं नकद राशि प्रदान की गई। इस अवसर पर डॉ. कमलचन्द वर्मा, डॉ. मीनाक्षी त्यागी द्वारा पत्रवाचन किया गया।
इस अवसर पर डॉ. राजमति सुराणा की चिया और नानी सत्यनारायण व्यास की अभिव्यक्ति का सुख बालकृष्ण बीरा की समय की सरगम, डॉ. श्रीचन्द बोहरा एवं कन्हैया लाल अनन्त की पुस्तकों का विमोचन यिका गया।
सभी अतिथियों के उद्बोधन पश्चात अन्त में एस. एन. मोदानी ने सभी अतिथियों श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।
' रोशनी का घट [अशोक अंजुम : व्यक्ति एवं अभिव्यक्ति ] ' 
 का पद्मभूषण नीरज द्वारा लोकार्पण
अलीगढ़। अशोक अंजुम के व्यक्तित्व पर आधारित तथा श्री जितेन्द्र जौहर द्वारा सम्पादित कृति रोशनी का घट का लोकार्पण पद्मभूषण नीरज ने करते हुए अशोक '' अंजुम '' को बहुआयामी रचनाकार बताया और उन्हें बधाईयाँ दी। कार्यक्रम का शुभारम्भ पद्मभूषण नीरज, फादर जॉर्ज पॉल, डॉ. आनन्द सुमन सिंह और श्री अशोक '' अंजुम '' द्वारा दीप प्रज्जवलन से हुआ तत्पश्चात सन्त फिदेलिस सीनियर सेकेन्डरी स्कूल के विद्यार्थियों ने प्रार्थना नृत्य किया। सन्त फिदेलिस स्कूल के विद्वान प्राचार्य फादर जॉर्ज पॉल ने अपने उद्बोधन में उपस्थित साहित्यकारों अतिथियों का स्वागत किया।
डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने अपने वक्तव्य में कहा कि जिस प्रकार अशोक का वृक्ष किसी भी मौसम में  पत्रविहीन नहीं होता उसी प्रकार अशोक '' अंजुम ' भी निरंतर अपनी रचनाधर्मिता से साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। सुप्रसिद्ध कहानीकार एवं साक्षात्कार के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने वाले डॉ. प्रेमकुमार ने भी अशोक '' अंजुम ''  के बढ़ते साहित्यिक कद की भूरि - भूरि प्रशंसा की तथा अशोक '' अंजुम '' के अध्ययन काल से जुड़े अनेक संस्मरण सुनाये। सुप्रसिद्ध कथाकार तथा च्च् वर्तमान साहित्य ज्ज् की सम्पादक डॉ. नमिता सिंह ने यह बताया कि अशोक अंजुम अपने निरंतर एवं उत्कृष्ट लेखन से छोटी - बड़ी प्राय: सभी पत्रिकाओं में छाये रहते हैं। इण्डियन डाइकास्टिंग के श्री प्रमोद कुमार ने भी अपने वक्तव्य में श्री अंजुम की रचनाधर्मिता की प्रशंसा की तथा कहा कि समाज को बचाए रखने के लिए साहित्य, कला , संगीत आदि की रक्षा अनिवार्य है। देहरादून से पधारे पुस्तक प्रकाशक तथा चर्चित पत्रिका च्च् सरस्वती सुमन ज्ज् के संपादक डॉ. आनन्द सुमन सिंह ने पुस्तक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किस प्रकार इस पुस्तक के प्रकाशन की भूमिका तैयार हुई। इस अवसर पर उन्होंने स्व. सरस्वती जी को याद करते हुए उनकी स्मृति में की जा रहीं अनेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के विषय में भी बताया।
श्री अशोक च्च् अंजुम ज्ज् ने इस अवसर पर सभी का आभार व्यक्त करते हुए कुछ प्रसंग सुनाए साथ ही अपनी $गज़ल का मतला तथा शेर पढ़ते हुए यह इच्छा प्रकट की -
जिंदगी का जिंदगी से वास्ता जिंदा रहे
हम जियें जब तक हमारा हौसला जिंदा रहे
मेरी कविता, मेरे दोहे, गीत मेरे और $गज़ल
मैं रहूं ना रहूं मेरा कहा जिंदा रहे
अपनी अस्वस्थता के बावजूद श्रोताओं के बेहद आग्रह पर नीरज जी ने अपनी प्रसिद्ध कविता अगर तीसरा यु्द्ध हुआ तो ... का धाराप्रवाह पाठ करते हुए उपस्थित जनसमूह को रोमांचित कर दिया।
कार्यक्रम का सरस संचालन डॉ. पूनम शर्मा ने किया तथा उपस्थित विद्वानों में कवि श्री सुरेश कुमार, फादर अरुन, श्री ज्ञानेन्द्र साज, श्री यादराम वर्मा, श्री मयंक मांगलिक, सुश्री अंजना सेठ, श्रीमती प्रीति मांगलिक, सुश्री वंदना वशिष्ठ, श्रीमती भारती शर्मा, श्री अमन अंजुम, सुश्री देवांशी शर्मा, श्रीमती कृतिका शर्मा, श्री देशराज सिंह, श्रीमती शुभा अग्रवाल, श्री नरेश कुमार, श्री अजय चौहान, श्री मनीष वार्ष्णेय, श्री अजय प्रकाश शर्मा, डॉ. योगेन्द्र शर्मा, श्रीमती मंजू गुप्ता आदि उपस्थित थे।
सप्तक - चार विमोचित
रायपुर। छत्तीसगढ़ शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित सप्तक चार का विमोचन जैतूसाव मठ के ऐतिहासिक गाँधी भवन में सम्पन्न हुआ। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्री कैलाशचंद्र पंत, छत्तीसगढ़ के डीजीपी श्री विश्वरंजन, औद्योगिक विकास निगम  के अध्यक्ष श्री बद्रीधर दीवान, राजेश्री महंत रामसुंदरदास, पूर्व मंत्री श्री सत्यनारायण शर्मा, छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्री गिरीज पंकज के द्वारा विमोचित सप्तक- चार छत्तीसगढ़ के सात कवियों की कविताओं का संकलन है।
प्रधान संपादक डॉ. रामकुमार बेहार ने इस अवसर पर कहा कि श्री संतोष चौबे, सुश्री रेवा रानी मंडल, शांति तिवारी, युक्तराजश्री, डॉ. मंजूला श्रीवास्तव, किरण लता वैद्य, शशि सुरेन्द्र दुबे, संकलन में शामिल सात कवि है। सहकारिता के आधार पर प्रकाशित होने वाली सप्तक श्रृंखला को साहित्यकारों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। छह माह के भीतर सात- सात कवियों के चार संकलन का प्रकाशन होना, इसका प्रमाण है। संभावनाओं से पूर्ण प्रतिभाओं की प्रस्तुति के उद्देश्य से सप्तक योजना प्रारंभ की गई है। छत्तीसगढ़ में काफी पहले से साहित्य की धारा प्रवाहित होती आई है। वर्तमान में भी अनेक कवि ऐसे है जो लगातार लिख रहे हैं, मगर किसी न किसी कारण से उनका प्रकाशन नही हो पा रहा है। सप्तक योजना ऐसे रचनाकारों के लिए मंच समान है।
मुख्य अतिथि श्री कैलाश चंद्र पंत ने सप्तक- चार के विमोचन के पश्चात् योजना की काफी प्रशंसा की। इस अवरस पर छत्तीसगढ़ शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ. रामकुमार बेहार एवं सचिव श्रीमती निर्मला बेहार ने संस्थान की ओर से श्री पंत का शाल, श्रीफल से सम्मान भी किया।
सुरता हीरालाल काव्योपाध्याय समारोह संपन्न
   रायपुर।  स्मरण की संस्कृति ही भारतीय संस्कृति है। ऋषि व कृषि संस्कृति वाले देश भारत में साहित्यकार ऋषि संस्कृति के प्रतीक है। छत्तीसगढ़ व छत्तीसगढ़ी कृषि संस्कृति वाला है। इस दृष्टि से डॉ. रामकुमार बेहार के संयोजन में आयोजित सुरता हीरालाल काव्योपाध्याय समारोह देश की संस्कृति का द्योतक है। पद्म  श्री डॉ. महादेव प्रसाद पाण्डेय ने मुख्य अतिथि के रुप में समारोह में उपरोक्त बातें कहीं। अवसर था छत्तीसगढ़ शोध संस्थान व संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित कार्यक्रम। स्थानीय प्रेस क्लब भवन में संपन्न गौरवशाली कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ के विभिन्न नगरों व गाँवों से साहित्यकारों ने शिरकत की।
समारोह को संबोधित करते हुए बालचंद कछवाहा ने कहा - छत्तीसगढ़ की अस्मिता, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, जीवन के प्रसंगों का उल्लेख, छत्तीसगढ़ व छत्तीसगढ़ी यहां की प्रकृति समासिक है। नाना प्रकार के तत्वों ने इस संस्कृति का निर्माण किया है। हिन्दी की भांति छत्तीसगढ़ी की माँ भी संस्कृत है। सिन्धु व गंगा नदी तथा बिहार, राजस्थान, दक्षिणावर्त व मध्यदेशी संस्कृति का सम्मिश्रण छत्तीसगढ़ी संस्कृति है। हीरालाल काव्योपाध्याय ने इस तथ्य को समझा, जाना और अपने व्याकरण में वर्णित किया। जन भाषा को मुक्त विहार करने देना चाहिये। छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए यहां के साहित्यकारों को भक्ति साहित्य की रचना करनी चाहिये। रायपुर की छत्तीसगढ़ी में उड़िया भाषा का और बिलापुर की संस्कृति में बंगला भाषा का प्रभाव है।
छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर के संपादक श्री नंदकिशोर तिवारी ने कहा - शब्द गिरगिट ही तरह अर्थ बदलता है। भाई शब्द आज अंडरवर्ल्ड के प्रमुख के लिए प्रयुक्त हो रहा है। हीरालाल जी ने ऋषि रुप में छत्तीसगढ़ी व्याकरण की रचना की। शोध की दिशा में कार्य करने वाली छत्तीसगढ़ शोध संस्थान ने यह समारोह आयोजित कर प्रशंसनीय कार्य किया है, नई शुरुआत की है। हीरालाल काव्योपाध्याय पर समग्र छत्तीसगढ़ को नाज है।
डॉ. पी. एल. मिश्रा ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी बोलने में हमे शर्म नहीं करनी चाहिए। शब्दकोष व व्याकरण भाषा की आँखें होती है। हीरालाल जी ने हमें आँखें दी है। हम उनके आभारी है। गणित के शिक्षक होते हुए भी उन्होंने छत्तीसगढ़ी का व्याकरण लिखा। यह उल्लेखनीय है।
डॉ. सुधीर शर्मा ने इस अवसर पर कहा - अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिये भाषाई सर्वेक्षण करवाया था। इसी सर्वेक्षण की श्रृंखला में हीरालाल जी ने छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखा व ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने आह्वान किया कि भाषाई जनगणना में छत्तीसगढ़िया लोगों को अपनी भाषा छत्तीसगढ़ी लिखानी चाहिये।
अध्यक्ष की आसंदी से श्री बबन प्रसाद मिश्र ने कहा कि जीवन के अनेक रंगों की तरह भाषा के भी अनेक रुप होते हैं। हमेशा से ज्ञान के समक्ष शक्ति नत मस्तक होता रहा है। जहां भाषा नहीं वहां संस्कार नहीं। भाषा के संदर्भ में प्रांतों की भौगोलिक सीमा का बंधन  नहीं होता। छत्तीसगढ़ी की पवित्रता व आत्मसात करने की शक्ति को बनाये रखना समय की मांग है।
छत्तीसगढ़ शोध संस्थान द्वारा इस अवसर पर छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य व संस्कृति के विकास में योगदान देने वाले को प्रशस्ति पत्र व शाल से सम्मानित किया गया। संस्थान के सचिव श्रीमती निर्मला बेहार ने प्रशस्ति पत्र दिया। सर्व श्री डॉ. नंदकिशोर तिवारी, सुशील भोले, चंद्रप्रकाश शर्मा, निर्मला बेहार, सुधा वर्मा, सुधा शर्मा, डॉ. पी. एल. मिश्रा, चंद्रकुमार चंद्राकर, मंगत रवीन्द्र, ललित मिश्रा, शशि दुबे व राम नारायण व्यास सम्मानित हुए।
कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ़ शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ. रामकुमार बेहार ने किया। विषय प्रवर्तन भी उन्होंने किया। धन्यवाद ज्ञापन श्री सुशील भोले  ने किया। समारोह में काव्य संग्रह सप्तक पांच का विमोचन किया गया। जिसके प्रधान संपादक डॉ. रामकुमार बेहार हैं।
दूसरे सत्र में छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय कवि सम्मेलन का आयोजन डॉ. रामकुमार बेहार की अध्यक्षता में हुआ। संचालन सुशील भोले ने किया। इस सम्मेलन में श्रीमती सुधा शर्मा, शंकुतला शर्मा, आशा मेहर, नीला भाखरे, शशि सुरेन्द्र दुबे, रेवारानी मंडल, सुधा वर्मा के अलावा राजेश्वर खरे, जगराखन वर्मा, पूनू राम साहू, गोपाल वर्मा, श्याम नारायण साहू, गोवर्धन पाणिग्रही, सुशील भोले, डॉ. रामकुमार बेहार, हिम्मत सिंग, बलदेव शर्मा, तुकाराम पंसारी व राजेश जैन ने काव्यपाठ किया।
समारोह में बड़ी संख्या में साहित्य अनुरागी उपस्थित थे। डॉ. गुलाब सिंह ठाकुर, संजीव ठाकुर, प्रो  . अनिल झा, अधिवक्ता हर्ष श्रीवास्तव, फिल्म अभिनेता चंद्रशेखर चकोर, जागेश्वर, आदेश ठाकुर, मंजूला श्रीवास्तव, अनिल शर्मा, दिनेश ठाकुर, उर्मिला देवी, शंकर प्रसाद श्रीवास्तव, युक्ता राजश्री आदि उपस्थित थे।                             

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