इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

भरका



- मंगत रवीन्द्र  -

जगनू हर नवा घर करिस ता भाई बंध संग पारा परोस ल झाराझार खवाइस। पिसान के हाथा देवाइस। बुड़ाती कोन्टा म देवता ल मढ़ाइस। बंदन बुकाए तिरसुल, कलस, कोन्हा म माढ़े डरडराउन लागै सुरइला संग दुनों परानी पलगी म सुतैं अऊ बेटा मटकू ल देवतरहा मुड़हत घर म सुतावैं। नम्मी पढ़त हे। एक ठन बिजली बलब कड़ेरी के पोल ले परोसी घर ले तार ले बुलका के लाइन ल लेहे। तिही पाय के एके खोली म अंजोर हर बगरै ... बेटा मटकू हर रात कुन पढ़ - लिखै तहाँ सूत जाए ... रात के सपना देखै के - तैं मोर पूजा कर। तोला धन दोगाही दिहौं ...। मटकू हर झकनका के जाग जाए ...। कभू - कभू तिरसूल धारी संकर पारबती मन डुड़वा बइला म चढ़ के आय ... एला सपना म देखै ... मटकू हर मन म राखे रहै। लइका जात तो आय ... खेले कूदे के धियान ... बिहना होवै तहाँ भौंरा बांटी ...।
एक दिन ददा ल बताइस - ददा, रात के रकम - रकम के सपना सपनाथौं। मोर बर नानकन मन्दिर बनवा दे ... मैं हर संकर सामी के पूजा करिहौ। लइका के गोठ ल सुन के जगनू हर दांत म अंगठी ल चाबी लीस। लइका के मिसिर के रेख नइ आए ए .. अऊ भगती के गोठ गोठियाथे। नोहर के छोहर म एक ठन बेटा पाएं तेहू हर मोर जोगी बनहूं कहत हे। मन म बिचार करथे के घर के देवता हर बिछाए हे का ... ? बउछाही ता तो मोर पार वार के बंदरो बिनास हो जाही ...।
सियान हर सियान होथे। गुन समझ के कथे - बेटा, अभी लइकोंधा अस ... दिन भर खेले कूदे रथस .. सपना डारथस। सपना रूख के जकना, जागे म दुच्छा ... सुध म आ जाथे ... तइहा सियान मन कहैं बेटा। जै - जै महादेव पारबती ... सुत उठ तहाँ बासी म दंती ... ददा के बात ल सुन के मटकू हर फेर खेले कूदे म भुलागे रात के सुतीस तहाँ फेर नदिया बइला म चढ़े महादेव ल सपना डारिस।बइला हर पूंछी ल अंटियावत रहिस अऊ पीठ ऊपर म संकर सामी बइठे हे। मुड़ म लम्बा जटा, भभूत चूपरे, बघवा के छाली ओढ़े मुसकियावत भोले नाथ ओकर कती आवत हे। मटकू हर झकनाके जाग गे। ददा ल जगाइस अऊ सपना के गोठ ल सुनाइस। ददा हर कथे - ले बेटा सूत जा, देवता धामी कती गोड़ करे हस ता रकम - रकम के सपना ल देखत हस कहत ओकर मुड़सरिया ल एती करिस ...।
सपना ल रोज सपनाए ... भूत मोके कस टूरा बरबरा डारै अऊ सपना म सुखाते जावत हे। ददा हर रकम - रकम के ओखद मांदी कराइस टोंटा म ताबुज अऊ बहाँ म जरी बंधवाइस। गुनिया बइद मन फूंकझार करिन ... सावन महिना म पींउरा पेंट कुरता पहिर के बम भोले कंवरिहा संग तुर्री धाम म जल चढ़ाइस। जोड़ा - जोड़ा फरहरी फोरिस तभो ले सपना बैरी बंद नई होइस। आखिर म एक झन जोतीस हर बताइस के बेटा, संकर जी के एक ठन मन्दिर बनवा दे ... अऊ ओई म बइठ के पूजा कर ता तोर सपना हर बंद होही। जगनू मण्डल हर अपन कुल परवार के संग सुरसुमता मढ़ाके नानकुन मंदिर ल बनवाइस ...।
अब टूरा मटकू अउ दाई - ददा ल थोकिन सांति मिलीस। सपना कम अवै ... पढ़ाई - लिखाई ल छोड़ केटूरा हर भगती लाइन म उतर गे। दस बारा बरिस ले पूजा करत आवत हे। भरखम  जवान होगे बेटा ... डाढ़ी बढ़ाए हे, माथा म चंदन बुकै ... गरदन म कन्ठारा माला के लरी हर ओरमे रहै अब तो मटकू नाव छिपा के, बाबा जी ... नाव परचरित होगे।
जगनू के एके ठन बेटा ... तेहू हर भगत लहुटगे। बर बिहाव करके कया - मया देखहूँ सोचे रहिस पर उल्टा होगे कथे ना - एक ठन आँखी तेहू म चिपरा ... का करै बिचारा ... मन के बिला म सुख के मुसवा ल छपके हे। सुरइला के अंचरा के मया बोचकत हे। महतारी हर कोख के पीरा ल कब भुलाथे जब हरियर मड़वा तरी तन म हरदी रंगे बेटा पत्तो ल देख ... मोहरी के सुर अऊ सुहागीन मन के बिहाव गीद हर अंतस म समाथे .. राजा रानी बरोबर बेटा बहू के चुम्मा लेथे ... सुख के चार बँूद आँसू थिप्प जाथे। करासकरवा के सोनहा दीया कस मन हो जाथे। पर सुरइला के मया हर जेठी नरवा कस सूखा होगे। पझरा के सउंक म ठन - ठन पखराके चाप उकलथे। अइसन ढंग ले बेटा हर संसार के रिवाज ल लात मार दिस अऊ एती जगनू हर नानकन ओखी ल लेके रातकुन बेंस दुवार ले भाग गीस। रिखी भांचा संग खेत खार तलक ल खोज डारिन पता नइ चलीस ...।
सुरइला हर छोटे कदकाठी के तिरिया ए .. उज्जर देंह तेमा मसराइल के लुगरा ... कनिहा ले चूंदी ओरमे रहै। फोदकू पांव के तीरे - तीर गोड़रंगी अऊ ऊपर म चाँदी के टोंड़ा ... चपके रहै। संझा के बेरा ए ... सूपा म नूनिया भाजी ल निमारत रहै। जगनू हर खार कती ले बांक ल खन के एक बोझा कांध म बोहे लान के अंगना म पटक दिस। असाड़ के बारी ल बतियाना हे। लहंस जाथे बारी ... एती खवा हे, असड़हू ठाढ़े बारी म लमेरा सेती अऊ करेला नार चढ़थे। ढेंखरा तो  भिन्ने गड़ियाथे तिही पाय के बांक ल कोड़ के लाइस हे। सुरइला हर भाजी ल निमेरत गुड़ाखू ल घंसत रहिस देखके जगनू हर कहिस - छी:, भाजी ओ निमारत हस अऊ मुँह म ...। मुँह ल धो ले तहाँ ले भाजी ल निमारबे।
सुरइला कथे - थोरे गिर जात हे ...।
- गिरत नइ ए ता काय, कमहूँ थल्लक ले गिरगे ता ... ? असाद नइ तो ... राधेओं कुटे के बेरा ... टार तोर चोचलाही ल ... कहाँ लंग के असाद डौकी ल पा गेओं। बहू लानबो तभो अइसनेच करही का ? कतेक ल सिखावंव एला। एक सिक्छा करमी के पुरता तो सिखा डारें चेंत आही त तो ...।
॥ पढ़त - पढ़त म पखरा भये, लिखत - लिखत म काठ॥
॥ गुरूजी पुछै पढ़ंता मन ला , ता सोला दुनी आठ॥
कतेक ल लिखौं के कहौं ... दुनों परानी म नानकन ओखी हर कुकुर मुड़ी कस घाव बाढ़गे। जस घाव बाढ़थे तस मछियाथे। झगरा बाढ़गे ओकर सुने ले ओहर आगी बर जाथे ता ओकर सुने ले ओहर ... पारा परोस के मनखे मन जुरियागे ... झगरा ल बुताइन। रतिया के खाना - पीना म कोई सोर नइ रहिस। गिल्ला गादर भात ... जरे भुंजाए साग अपन - अपन दसना म जा के चुरमुटा गइन .... कइसे रात पहाए निदिया रानी ए हर जानही ...।
॥ कुकुर बिलाई सुरगे, मुसवा रेंगे पटउहा म॥
॥ रात रक्सीन जागत हे, पीरा धरे हे झंउहा म॥
सुरइला के सुभाव रहिस के ओहर चार बजे सुत के उठ जाए। घर अंगना छर्रा देवै, पानी कांजी भरै, बरतन भड़वा मांजै पर आज तो तरिया म बोरे अंटाएन कस परे हे। उठिस पर अबेरहा ... कुमला के ... धनी के दसना सून्ना ... कती गे हे उठके ... ताक पाक करिस, गम नइ मिलीस। आरा - परोस ल पूछिंस। पता नइ ए ... हलाकान होगे। ओ तो उठै बिहना अऊ एक लोटा पानी मांगै पर आज ओ ओखी हर कोंचई कांदा कस तरी म गड़गे ...। सुरइला के चूल्हा के राख चूल्हा म परे हे। जतर खतर बरतन भंड़वा ... अंगना म बहिरीनइ परिस ... सुरइला हर रोवत गावत गाँव के रिखी भांचा मेर गइस ... हाल चाल ल सुनाइस ... भांचा पूछिस - ता का करी मामी ? ममा हर लइका मन कस कती उछिंद होगे। मामी कथे - कहुँ कती जहर महुरा खा के परान ल तियाग झन देय भांचा। फेर राँड़ी हो जाहूं।
- अइसन झन गोठिया मामी ... ममा हर अइसन नइ करै कहुँ कती गये होही सियान अऊ बड़ समझदार मनखे ए ... रिस हर अपन ल खाथे। ए जुवार के भराए पुरा हर ओ जुवार म ओहर जाथे। फिर झन करा... संझा के गंवाए गरूवा हर बिहना, कोठा म आ जाथे।
- नहीं भांचा, तुंहर ममा बड़ रिसहा ए ... कछु कर डारही ता पाछु के चेते ले का होही। चला मोला संग देवा। अपन जन नता ल खोजबोन।
- का होही मामी। कहत रिखी भांचा हर पेंट कुरता पहिर के तियार होइस ...।
मामी के मइके, ममा के महापरसाद, भाई के समधियाना ल सोरिहाइन बस अडï्डा, हाट - बाजार, धरम शाला ल खोज - खोज के थक गइन। खाए - पीए के सोर नइए ...। मामी तो कल के मोखारी नइ चाबे ए ...। इचार बिचार अऊ धरना म पैसा फेंकिन... गइस ता गइस कहाँ ? सियान होके गंवारी करत हे। अरे, भागे ले बिपत नइ हरै। कथे ना - घर के भागे ता बाहिर के भागे कहाँ जाही। सियान मनखे ए। सियान कस गुनतीस। मामी के हलपटï्टा बाढ़गे। टूरा मटकू ल कहतीस ता ओ तो लटï्ट बढ़ावत हे। धुरूवा भगत बनगें। कोन बैरी ओकर मति ल डोला दिस ... बाप तेन बइहा भूतहा होके घर ले उछिंद होगे। किसान के गाय गोरू गंवाथे ता ओकर बर कांजी हाउस रथे। गरमी के दिन ककरो कोलाबारी म बासा रथे पर मनखे के उछिंद ल कोन बताए ?
कौसिल्या के बेटा राम के बनोबास होइस ता महतारी के खोली म रात के दीया हर धीमिक - धीमिक बरत रहै। माता कौसिल्या हर मुठा भर भानस अऊ लोटा भर पानी ल पी के बिगर दसना के खटिया म बइठे - बइठे चौदा बरिस ले गुनत रहिस। सावन के महिना अगास म घुमर - घुमर के बादर आवत हे। बिजूरी हर जिगीम - जिगीम लहुकै ... बन के जीव मन हुंकारत रहैं। माता कौसिल्या हर मुठा भर भानस अउ लोटा भर पानी ल पी के बिगर दसना  के खटिया म बइठे - बइठे चौदस बरस ले गुनत रहिस। सावन के महिना अगास म घुमर - घुमर के बादर आवत हे। बिजूरी हर जिगीन - जिगीन लहुकै बन के जीव मन हुंकारत रहैं। माता कौसिल्या हर दसना म बइठे - बइठे रात ल पहावै ... थप्प - थप्प आँखी ले आँसू थिपै ... संग म सुकुमारी सीता अऊ सउंत बेटा लछिमन जती ... धनुष बान धरे बिगर पनही के हे ... माता कौसिल्या हर गुनत हे :-
॥ रिमझिम - रिमझिम मेहा बरसे, पवन चले पुरवइया॥
॥ कान, बिरिछ तरी खड़े होही, राम लछमन दुनों भइया॥
कस मामी, सुरइला हर माथा ल थपके बइठे जावै। चार बून्द आँसू हर आँखी ले थिप जाये। दु दिन, दु रात बलकगे, ममा के पता नइए ... मामी घर अंगना नइ चढ़े हे फेर का कहौं ... गइस ता गइस कहाँ ?
बजार के दिन ए ... बजरहा मन आवत हें... जावत हें। भीखू गौटिया कहत लागै। परोसी गाँव के गौटिया ए। किसानी लगठागे गुन के कोकानी ल कांध म अरझाए ... कोंथा म रूपिया खोंच के नागर लोहा लेहे। बाजार जावत हे। अनपनहा रस्दा। ओकर गाँव ले बजरहा कम आथें। बड़े फजर उठके रेंगीस ... टीप्प खार ... साल्हो गावत रेंगत हे :-
॥ कोन बन आमा रे, कोन बन जाम॥
॥ कोन बन म निकल गे लखन सियाराम॥ हरे हरे रे दोस ....।
बुढ़वा ए ता का होइस ... राग हर बुढ़वा थोरे होथे। रस्दा म भरका बड़ा गड्डïा चंग ले डंहकिस ता कान म अवाज आइस - राम राम गंउटिया।
आवाज सुनके गंउटिया हर अचरित होगे। कोन ए भई, मोला राम - राम क थे। सूनसान खार अऊ मनखे के बोली ... सब डहर ल निहारथे ... मनई के नाव नहीं, तहाँ फेर पाँव तरी, आवाज आथे - मैं जगनू औं गंवटिया। फेर देख डारथे। भरका म कइसे लुकाए हस रे ...। पेट भर डर गे रहें ...।
- तोला कइसे करथे कइके लुकाए हौ गंउटिया।
- मैं लइका औं रे ननजतिया मोर संग ठटï्ठा मसकरी करथस, अझी कोनो आने रतीस ता हाग मूत दार रहतीस ... भँय टार ... मैं तोरे घर समावत जाहूँ कहत रहें। एदे का होइस के पउर साल बइरसात म भूतहामुड़ा के पनलुकवा आमा ल गरजना मार दिस ... ठाढ़ सुखागे ... बेटा कस बढ़ोए रहें। एदे कमिया मन काट डरे हे। तोर गाड़ा ल भाड़ा म दे देेबे ... दु ठ गाड़ा के तीन  लहुट म आ जाही। अतका गोठ ल सुन के जगनू हर गुनथे - हौ कहत हौं ता नइ बनत ए अऊ नइ कहत हौं ता नइ बनत ए। हौ कहे म मोला घर जाए ल परही अऊ नहीं म मोर पुरखौती मालिक। गंउटिया कथे - का गुनथस रे ...। अतका म जगनू भरका ले निकलथे। कइसे चार दिन के खाए नइ हस कस दिखथस ... मार सोक - सोक ले। आँखी कान बोजागे हे। तलाव उछाल थोरे करे हस ?
- नहीं गउंंटिया, अइसनेच मुंह कान ए ग। ले चल भई चल, गाड़ा के दु ठन मुंह थोरे हे। भेज देबे तोर कमिया मन ल बियारा म परे हे गाड़ा हर। ले जाही। कहत जगनू हर गंउटिया के पाछु - पाछु .... जुआ म धन हारे जुवारी कस आवत हे। फेर गंउटिया हर गुनगुनावत हे :- कइसे दिखत हस आज उदास रे कजरेली मोर मैना ...।
छिन भर म जगनू के घर मुंहटा म आगिन ... तहाँ फेर का गंवटिया बर अंगना म मचिया निकाल के फफक - फफक के रोए लागीस। गंवटिया हर अब्बक - का होगे रे ए जगनू ल ... मरद जात होके अकारत डौकी कस रोथे। जरूर भरका म लुकाए के कलदब होही तहाँ अऊ का ... जगनू के परानी सुरइला हर लकठा म आ के सब हाल चाल ल सुनाइस ... तीर म रिखी भाँचा खलो ठाढ़े हे ... गंउटिया भक्क खागे ... अरे, नानकुन फुंचरा अऊ अतका रोंट अपलंग ... धन तो मैं भेंटे डारेंव। संग म ले के आ गेंव नइ तो का अलहन हो जाए रतिस। आज कल जी ल छिन म हेर डारथे। तभे बुजा हर गाड़ा मांगे ता कठुवाए रहिस, गुनत रहिस। मनखे अबूझ होथे। जिनगी के महतम ल नइ समझैं ... गुनत गंउटिया हर ए भाखा म जगनू ल समझाथे :-
॥ बड़े भाग मानुस तन पावा,सुर दुरलभ सब ग्रंथहि गावा॥ सुन ग जगनू ...
॥ पथ कितना भी हो पथरीला,
तू स्वेद बहा मुस्कुराता चल॥
॥ तूफान से है रह भरी,
सुधियों के दीप जलाता चल॥

  • पता- मु. पो. कापन, व्हाया - अकलतरा, जिला - जांजगीर - चाम्पा [छ.ग.]

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