इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

खदीजा खान की कविताएं


खुश्क मिज़ाज

हवा भी  बेरंग / फिजा भी बेनूर
सभा फीका - फीका / दिन
सूने - सूने/ रातें वीरान
लगता है / कटेगी यूं ही
ये जिन्दगानी
कब तक / अपने आप से
रुठे रहेंगे यूं ही

ऐ, मुहब्बत
पल छिन
जो वक्त ने चुरा के /
जिंदगी के नाम कर दिए
नगमे मुहब्बत के / हमकलाम कर दिए
हसीन से हसीनतर / होता जाता है
तसव्वुर / कोई मुसव्विर
तस्वीर में / भरता जाता है रंग
कोई छेड़ता है धुन
जग उठा है सुर
ऐ, मुहब्बत तेरे सदके
शिकवे उम्र भर के
पल में तमाम कर दिए।

आसमां के नीचे
नीले - नीले शामियाने के नीचे
इन खुली फिज़ाओं में
इन धुली हवाओं में
ऊंची - नीची राहों पर /
हरी - भरी ढलानों पर
यादों से कहोगे तुम भी
आ जाना ऊंगली पकड़कर, बचपन
को भी ले आना
उड़ेगें पतंगों की तरह
मचलेंगे तरंगों की तरह
बेलौस अल्हड़ बनकर
गुजरे हुए कल को फिर जिंदा करेंगे
गलबहियां हो जाएंगे, आज
और कल जिन्दगी जी लेंगे, कुछ और
पल कुदरत के आशियाने के नीचे
नीले - नीले शामियाने के नीचे
मुहब्बत

दिल
टुकड़े - टुकड़े हुआ
जज्बात हो गए तार - तार
छलनी - छलनी जिगर हुआ
सितम हुए कैसे कैसे ?
क्या चीज है मुहब्बत ???
बनते - बिगड़ते
मिटते संवरते
किस्मत जैसे / सपने सतरंगी
या कि स्याह अंधेरे जैसे ?
तो क्या अब कसम ले ली
तुम किसी से मुहब्बत नहीं करोगे ?
  • पता - प्लाट - 6, सेक्टर- 2 हारुन नगर कालोनी, फुलवारी शरीफ पटना [बिहार]

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