इस अंक में :

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बुधवार, 26 जून 2013

छत्तीसगढ़ में उर्दू शायरी की पहचान बन चुके हैं कौंसर

   



  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह

पिछले लगभग तीन दशकों से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्दू और हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अपनी गजलों और नज्मों के कारण चर्चा में आये शायर अब्दुस्सलाम 'कौसर' ने अपने गुणवत्तामूलक लेखन से छत्तीसगढ़ के उर्दू अदब को राष्ट्रीय स्तर की ख्याति दिलाई है। छत्तीसगढ़ में उर्दू अदब के प्रति पर्याप्त माहौल नहीं होने के बावजूद 'कौसर की गजलों और नज्मों के लगातार प्रकाशित होने के कारण ही उर्दू शायरी के नक्शे पर छत्तीसगढ़ का नाम तेजी से उभर कर सामने आया है। छत्तीसगढ़ में उर्दू शायरी की पहचान बन चुके हैं कौंसर। यही कारण है कि गजलों और नजमों के सृजनात्मक लेखन में उत्कृष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त करने एवं उर्दू साहित्य में गुणवत्तामूलक लेखन करते हुए छत्तीसगढ़ में उर्दू भाषा का अनुकरणीय माहौल तैयार करने के लगन को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने जनाब अब्दुस्सलाम 'कौसर' को उर्दू भाषा की सेवा के लिए हाजी हसनअली सम्मान से विभूषित किया है। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर 01नवम्बर 2010 को 'कौसर' को राजधानी रायपुर में हाजी हसन अली सम्मान से विभूषित किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली एवं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 'कौसर' को दो लाख रूपये नगद, प्रशस्ति पत्र, साल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया।
    अपने समकालीन शायरों में अलग पहचान रखने वाले जनाब अब्दुस्सलाम कौसर का जन्म 09 जनवरी 1948 को रायपुर जिले के ग्राम खरोरा में हुआ। उनके पिता का नाम श्री सिद्दीक अहमद था। 'कौसर' के जन्म के बाद उनका परिवार संस्कारधानी राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) में आकर बस गया। 'कौसर' ने बी.एस.सी. एवं बी.टी.सी. तथा आदि वे कामिल तक शिक्षा प्राप्त की है। सिर्फ पांचवी तक उर्दू पढ़ने के पश्चात 'कौसर'  ने उर्दू साहित्य का गहन अध्ययन किया। उर्दू शेरो -सुखन और अदब का 'कौसर' ने इतना अध्ययन किया कि उन्हें हजारों शेर जुबानी याद है।
    दोस्तों की शादी में सेहरा लिखते-लिखते, मौलाना लोगों की तकरीर में पैगम्बर इस्लाम की शान में नाट लिखकर पढ़ते-पढ़ते, मटका पार्टी वालों को फिल्मी धुन में गीत लिख कर देते-देते 'कौसर' उर्दू के अजीम शायर बन गये। उन्हें सपने में भी ये गुमान नहीं था कि उनका शेरो - सुखन का जुनून उन्हें ऐसे मान -सम्मान से विभूषित करेगा जो उनके प्रशंसकों और उनकी कर्मभूमि राजनांदगांव के लिए गौरव की बात होगी। मौजूदा समय में कौसर एक शायर की हैसियत से उस मुकाम पर हैं जहां तक पहुंचना लोगों का सपना होता है। दो करोड़ दस लाख की आबादी वाले छत्तीसगढ़ के किसी भी शहर में जब शेरो-सुखन की चर्चा होती है हो 'कौसरÓ का नाम अदब, एहतेयाम से लिया जाता है।
    शेरो, सुखन के विद्वान समालोचक हनीफ नज्मी (हमीरपुर) ने 'कौसर' को 'छत्तीगढ़ में उर्दू गजल की आबरू' कहा है। छत्तीसगढ़ के उस्ताद शायर एवं वरिष्ठ पत्रकार काविश हैदरी ने स्वीकार किया है कि 'कौसर' एकमात्र ऐसे शायर हैं जो प्रकाशन के मामले में छत्तीसगढ़ के शायरों में सबसे आगे हैं। उनकी रचनाएँ अब तक 130 पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
    'कौसर' को गजलों के अलावा नज्म लिखने में भी महारत हासिल है। उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) के क्षेत्र में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'शमा'  विश्वस्तर पर उर्दू साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मान ली गई थी। 'शमा' का क्रेज ऐसा था कि इसमें छपने की आस में कई लेखकों और शायरों की उम्र गुजर जाती थी। ऐसी उत्कृष्ठ गौरवशाली पत्रिका में साठ-साठ, सत्तर-सत्तर मिसरों (पक्तियों) पर लिखी गयी नौ-नौ, दस-दस बंद की नज्में क्रमश: लाटरी का तूफान, मेरे हिन्दोस्तां, हवाले का शिकंजा, नया साल, कौन रहबर है तथा कंप्यूटर प्रकाशित होने से 'कौसर' राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शायरों की पंक्ति में आ गये।
    पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत पर 'कौसर' की नज्म 'गद्दार का मजहब' शायरों के लिए चर्चा का विषय बन गयी थी। राजनीति के दांव पेंच को बड़ी साफगोई के साथ पेश करने वाली इस नज्म की दो बंद देखें  -
और कुछ लोग वफादारी का परचम लेकर
मौत का जश्न सलीके से मनाने निकले
अपनी औकात जमाने को दिखाने के लिए
आग नफरत की दुकानों में लगाने निकले

इंदिरा गांधी हो या लूथर या कोई कैनेडी
पैदा होते हैं हर एक दौर पें और मरते हैं
कत्ल करके इन्हें 'कौसर' नए अंदाज के साथ
हम सियासत का नया दौर शुरू करते हैं
बावरी मजिस्द के विध्वंस पर उनका आक्रोश इस प्रकार फूट पड़ा -
ये मसला नहीं है कि गद्दार कौन है
पहले ये तय करो कि वफादार कौन है
    शुरू से ही कुछ अच्छा कहने की ललक में 'कौसर' ने शेरो-सुखन , उर्दू जबानो - अदब का डूब कर गहन अध्ययन किया है। संकीर्ण मानसिकता से उपर उठकर उन्होंने इस्लाम ही नहीं हिन्दू और ईसाई धर्म से संबंधित साहित्य, वेद पुराण, गीता,रामचरित मानस, पौराणिक कथाओं और मान्यताओं का विषद अध्ययन किया है।
    लगभग चार दशक तक शिक्षकीय पद पर कार्य करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी। इस दौरान गांव के परम्परागत त्योहारों, सामाजिक मान्यताओं, लोकगीतों, लोकाचारों से उन्होंने अनुभूतिगम्य अनुभव प्राप्त किया है। व्यक्तिगत अनुभव की सूक्ष्म गहराई और गहन संवेदना कौसर की शायरी में स्पष्ट दिखती है। सामान्य शब्द विन्यास के साथ दिल को छू लेने वाले शेर कहने से आम आदमी में भावनाओं की संप्रेषणीयता की वजह से आपका लोकप्रिय हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।
    मेराज फैजावादी, मंजर भोपाली, शायर जमाली, गौहर कानपुरी जैसे शायरों के साथ कामठी (महाराष्ट्र) के आल इंडिया मुशायरे में जब कौसर ने यह शेर पेश किया -   
इधर रौनक मजारों पर उधर महलों में सन्नाटा
शहंशाहों की हालत पर फकीरी मुस्कराती है।
तो इन्हें इस शेर पर बेहद दाद मिली। मुशायरें के बाद एक छात्रा को आटोग्राफ  देते हुए जब कौसर ने उसकी डायरी पर ये शेर लिखा तो छात्रा ने सवाल करते हुए कहा - शायर साहब महलों में सन्नाटा क्यों रहता है? कभी इस पर गौर करें। 'कौसर' को यह बात याद रही और काफी दिनों बाद उन्होंने दिल को छू लेने वाले अंदाज में ये कतआ कहा -
दासियों के कहकहे और इशरतों की महफिलें
इन नजारों में ही खोकर जिन्दगी काटा हूँ मैं
चौख कितनी दब गयी और बद्दुआ किसकी लगी
याद सब कुद है मुझे महलों का सन्नाटा हूँ मैं
उर्दू शायरी की शोहरत रंगेतगज्जुल यानि श्रृंगार रस से सराबोर भावनाओं की अभिव्यक्तियों की वजह से है। मुहब्बत, नफरत, तिरस्कार, हुस्न और इश्क की नोंक - झोंक, मिलन - विरह की संवेदना, महबूब की मासूमियत आदि आदि को शायरों ने जिस खूबी से अपनी गजलों और शेरों में पिरोया है उनकी मिसाल अन्य भाषाओं की कविताओं में मिलना मुश्किल है। 'कौसर' की गजलों में भी नजाकत से भरपूर ऐसे कई शेर मिलते हैं चंद मिसालें पेश हैं :-
कभी सपने में भी सोचा न था ये हादसा होगा।
मैं तुमको भूल जाऊंगा ये मेरा फैसला होगा।

नजर मिलते ही वो शरमा के जब भी सर झुकाती है
मुझे उस वक्त नाजुक लाजवंती याद आती है।

बचा बचा के नजर आँख भर के देखते हैं
वो आईना जो कभी बन संवर के देखते हैं

    नजर बचा के गुजरना हमें कबूल मगर
    निगाहे नाज तेरी बेरूखी पसंद नहीं
दोस्ती, मिलनसारिता, बफादारी और बेवफाई पर भी उनकी कलम चली है। दोस्ती पर उनका कतआ और कुछ शेर देखें -   
मुस्कराती आरजूओं का जहां समझा था मैं
जिन्दगी का खूबसूरत कारवां समझा था मैं
दोस्ती निकली फकत कांटों की जहरीली चुभन
दोस्ती को गुलसितां गुलसिंता समझा था मैं
       
न दोस्ती न मुरोव्वत न प्यार चेहरों पर
दिखाई देती है नकली बहार चेहरों पर
वफा की एक भी सूरत नजर नहीं आई
निगाह उठती रही बार- बार चेहरों पर
सियासत, सामाजिक व्यवस्था, शिष्टाचार, आध्यात्म पर 'कौसर' की गहरी पकड़ हैं। उनकी गजलों में इस अंदाज के शेर बड़े खूबसूरत अंदाज में पेश हुए हैं। चंद मिसालें देखें :-    
चमन पे हक है तुम्हारा, मगर ये ख्याल रहे
मैं फूल हूँ मुझे आवारगी पसंद नहीं

आस्तिनों में अगर सांप न पाले होते
अपनी किस्मत में उजाले ही उजाले होते
हम सियासत को तिजारत नहीं समझे वरना
अपने हाथों में भी सोने के निवाले होते।
आध्यात्म पर 'कौसर' ने कई शेर और बेहतरीन शेर कहे हैं -

सुना है उनकी गली है निजात का रास्ता
सो हम भी उनकी गली से गुजर के देखते हंै

चमन वालों जरा सोचों इबादत के लिए किसकी
हजारों साल से शबनम गुलों का मुंह धुलाती है।
पतंगे, तितलियां, भंवरे ये सब किस धुन में रहते हैं
ये किसकी याद में कोयल विरह के गीत गाती है
मानसिक क्लेश, दर्द की गहन अनुभूति को कौसर जे अपनी शायरी का जेवर बनाया है। इस अंदाज के शेरों की संप्रेषणीयता में उनकी लेखनी का कमाल झलकता है।
न जाने कितने जख्मों, के दरीचे खोल देता है
टपकता है जो आंखों से लहू सब बोल देता है
जिन्हें रहना था महलों पे सरापा नाज की सूरत
मुकद्दर चंद सिक्कों में उन्हें भी तोल देता है
सामाजिक विषमताओं और विद्रुपताओं पर भी उनके शेर दिल को छू जाते हैं।
हमारी मुफालिसी पर तंज करते हो थे मत भूलों
खजानों की उठाकर फेंक दी है चाबियां हमने
ये दुनिया है यहां आसानियां यूं ही नहीं मिलती
बहुत दुश्वारियों से पाई है आसानियां हमने        
हिन्दी साहित्य में संस्कारधानी राजनांदगांव का नाम राष्ट्रीय ही नहीं वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। मानस मर्मज्ञ डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र, साहित्य वाचस्पति डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, नई कविता के पुरोधा गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी रचनाधर्मिता से राजनांदगांव का नाम रोशन किया है। प्रकारांतर में क्रांतिकारी कवि कुंजबिहारी चौबे और डॉ.नंदूलाल चोटिया ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। हिन्दी साहित्य के साथ ही अब उर्दू साहित्य में भी निरंतर सृजनात्मक लेखन कर तथा हाजी हसन अली सम्मान से विभूषित होकर अब्दुस्सलाम कौसर ने राजनांदगांव ही नहीं समूचे छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किया है।
बाल भारती स्‍कूल के पीछे, राजनांदगांव (छग)

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