इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 29 जून 2013

करम दिखता है क्या


राजेश जगने ' राज '
करम दिखता है क्या नगीने में
झलक दिखता है इस पसीने में
जिनके लिये रोजी ही रोज़ा है
वो तलाश नहीं करते रोटी मदीने में
तख्तों ताज के जो फनकार है राज
उन्हें ख़ुदा मिले खुद के पसीने में
ये जहां तो अल्लाह का दरगाह है
क्यों भटकते हो कासी, काबा, मदीने में
ज़र्रा - ज़र्रा पर उनका रहमों करम है
तब ग़ज़ल कहता है कागज के सीने में।
  • स्टेशन पारा, वार्ड नं. 11, सोलह खोली, राजनांदगांव [छ.ग.]

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