इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

करम दिखता है क्या


राजेश जगने ' राज '
करम दिखता है क्या नगीने में
झलक दिखता है इस पसीने में
जिनके लिये रोजी ही रोज़ा है
वो तलाश नहीं करते रोटी मदीने में
तख्तों ताज के जो फनकार है राज
उन्हें ख़ुदा मिले खुद के पसीने में
ये जहां तो अल्लाह का दरगाह है
क्यों भटकते हो कासी, काबा, मदीने में
ज़र्रा - ज़र्रा पर उनका रहमों करम है
तब ग़ज़ल कहता है कागज के सीने में।
  • स्टेशन पारा, वार्ड नं. 11, सोलह खोली, राजनांदगांव [छ.ग.]

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