इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 29 जून 2013

समवेत प्रयास से ही राजभाषा समृद्ध होगी


-  सुनील कुमार '' तनहा ''  -

पिछले दिनों हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति का प्रांतीय अधिवेशन रायपुर के दुधाधारी मठ में संपन्न हुआ। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी प्रदेश भर से सैकड़ों साहित्यकार इस सम्मेलन में भाग लिए। वक्ताओं ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ी भाषा  साहित्य की समृद्धि व प्रचार - प्रसार का पुराना फार्मूूला सुझाया तथा अब तक छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य के प्रति शासन प्रशासन व जनमानस में अपेक्षित समादर भाव की कमी व अरुचि के प्रति खूब आँसू बहाया।
कुछ वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद  छत्तीसगढ़ शासन द्वारा व्यापक पैमाने पर छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा का आरोप लगाया तथा कुछ ने छत्तीसगढ़ी भाषा का अध्ययन व अध्यापन प्रायमरी स्कूल से  करने की पुरजोर वकालत की। कुछ एक वक्ताओं ने तो छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों के छत्तीसगढ़ी साहित्य को सरकार द्वारा अपने खर्च पर प्रकाशित करके प्रसारित करने की बात भी कही।
खैर छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विकास के प्रति प्रांत भर से आये हुए साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों के द्वारा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मानसिक व्यायाम करके छत्तीसगढ़ी डे मनाकर औपचारिकता पूरी की गई। समिति द्वारा कुछ योग्य व अयोग्य साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। रात्रि काव्य पाठ हुआ। पूरी कवायद में इस वर्ष भी आम श्रोता नदारत ही थे और कार्यक्रम समाप्त हो गया। इस आशा के साथ कि अगले वर्ष भी यही दृश्य उपस्थित कर सकें।
वास्तव में उक्त नजारा मुझे हर वर्ष एक ही फिल्म को पुन: - पुन: देखने की तरह महसूस हुआ। आखिर छत्तीसगढ़ को राज्य बने दस वर्ष बीत गये लेकिन राजभाषा छत्तीसगढ़ी अब तक राजकाज की भाषा नहीं बन पाई। छत्तीसगढ़ी वास्तव में अब तक उपेक्षित क्यों है ? क्या वजह है कि छत्तीसगढ़ी भाषा दो करोड़ से भी अधिक लोगों की मातृभाषा होते हुए भी छत्तीसगढ़ी भाषा राजकीय संवाद की भाषा नहीं बन पाई ?
निश्चित तौर पर हमारी राजभाषा की इस दयनीय स्थिति के लिए राज्य शासन ही प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। चूंकि प्रशासन के तमाम नौकरशाह व कार्यकर्ता जो कि नीचे से लेकर उपर तक के पदों पर विराजमान हंै वे लोग अधिकांशत: बाहरी प्रांत से आये हैं जिनकी आस्था बेशक छत्तीसगढ़ में है ही नहीं। इसलिए वे लोग स्वाभाविक रुप से छत्तीसगढ़ी बोली बोलने व लिखने के प्रति अरुचि ही रखते हैं। और इसी चक्कर में छत्तीसगढ़ी राजभाषा घोषित होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य के वटवृक्ष बनने का सपना देखना बेमानी - सा लग रहा है।
उक्त कार्यक्रम में दानेश्वर शर्मा  द्वारा पूछे गये एक प्रश्र के जवाब में समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए भी शासन द्वारा एक रुपये की सहायता नहीं दी गई है। यह बात वास्तव में छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य की उपेक्षा का ज्वलंत उदाहरण है। जबकि सरकार द्वारा अनेक प्रकार के औचित्यहीन उल जूलूल योजनाओं में लाखों रुपये का अनुदान मुक्त हस्त से बांट दिया जाता है। लेकिन प्रांतीय स्तर के ऐसे बड़े कार्यक्रम जिसमें हजारों की संख्या में छत्तीसगढ़ी साहित्यसेवक व विद्वान एक होकर छत्तीसगढ़ी साहित्य की समृद्धि के लिए प्रयास करते हैं, के लिए सरकार द्वारा फूटी कौड़ी की सहायता नहीं दिया जाता। वाकई प्रबल असंतोष का कारण है। ऐसे में साहित्यकारों के मन में भी हताशा की भावना उत्पन्न होगी। विशेष रेखांकित करने वाली बात तो यह भी थी कि उक्त राज्य स्तरीय कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की ओर से भी कोई सहयोगात्मक व्यवहार नहीं दिखाई दिया। यहां तक कि आयोग का एक भी सदस्य वहां उपस्थित नहीं हुआ।
छत्तीसगढ़ी भाषा - साहित्य की समृद्धि व विकास के लिए गठित आयोग के सदस्यगणों का आखिर ऐसे महत्वपूर्ण अवसरों पर नदारत रहना उनकी नीयत पर संदेह उपस्थित करती हैं। वैसे भी उक्त आयोग के अध्यक्ष व महामंत्री के बीच की आपसी अहं के टकराव की गूंज तो सभी सुन चुके हैं। उन दोनों को उनकी अड़ियल रवैये से  व्यक्तिगत क्या फायदा हो रहा है, यह तो वे ही जाने लेकिन इससे कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य का अहित अधिक हो रहा है इसीलिए छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु ने आयोजन के पूर्व लिखे अपने लेख में उक्त आयोग को सफेद हाथी की संज्ञा दी थी।
वैसे सुशील यदु भी स्वयं आत्मावलोकन करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। उनके द्वारा किये जाने वाले ऐसे वार्षिक आयोजन में भी तटस्थता का अभाव दिखता है। लगता है यदु भी खास वर्ग के साहित्यकारों के प्रभाव में आकर काम करते हैं इसीलिए ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में वही घिसे पीटे लोगों को बार - बार प्राथमिकता देकर मंचासीन करते रहते हैं तथा योग्य व अयोग्य साहित्यकारों के बीच की विभाजन रेखा को भी नहीं समझ पाते। प्रांतीय स्तर के अध्यक्ष का इस तरह दबाव में आकर काम करना भी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। ऐसी स्थिति में प्रतिभावान व उपलब्धि युक्त साहित्यकार अपने आप को ठगा सा महसूस करता है और हतोत्साहित भी होता है।
इन परिस्थितियों में छत्तीसगढ़ी साहित्य व भाषा का भला कतई नहीं होने वाला है। यह समय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ साधने का नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा की समृद्धि में अपना नि:स्वार्थ योगदान देने का है। हमें मिल जुलकर ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जिससे हमारी राजभाषा व साहित्य का समुचित विकास हो सकें एवं जन - जन उसे आत्मसात कर सकें। राज्य के 95 प्रतिशत लोगों द्वरा दैनिक जीवन में बोली जाने वाली लोक व्यवहार की भाषा भला अपनी धरती में कैसे उपेक्षित हो सकती है। इतनी बड़ी जनसंख्या का समर्थन मिलने के बावजूद हम अपनी राजभाषा व साहित्य को उचित सम्मान न दिला पायें तो यह हमारे लिए शर्मनाक है इसलिए आयें और समवेत रुप से इस दिशा में हम पुन: सकारात्मक कदम उठायें,जिससे राजभाषा व साहित्य का मान बढ़े एवं लोकप्रियता प्राप्त करें। प्रत्येक जिले में ऐसे भव्य कार्यक्रम वर्ष भर होते रहना चाहिए और छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए हर संभव उपाय  अपनाना चाहिए इसके लिए छत्तीसगढ़ शासन व स्तरीय प्रशासन खास आर्थिक सहयोग करें एवं ईमानदारी व कर्तव्यपूर्वक छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य रुप से राजकाज की भाषा बनाकर इसे जन - जन में लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न करें तभी छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा सही मायनों में स्थापित हो सकेगी।
  • पता - राजमहल चौक, कवर्धा [छ.ग.]

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