इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 27 जून 2013

आम्बेडकरवादी कविताएं



-  समीक्षक - किसान दीवान   -

विचारों के इस युग में जो विचार नहीं करते वे अक्सर धोखा खाते है, जरूरी है भवों में विचारों  का रूपान्तरण दिमाग, दिल की गहराई में उतरे और लक्ष्य भेद करे। दिल और दिमाग के निष्कर्ष को आत्मसात क रें। आदमी के चेतना में रचे- बसे स्थायी भाव, जब साधक वाचक, लेखक, विदूषक , कलाकार आदि की पवित्र चित्तवाली शुद्ध भावना में विलय हो जावे। तब जो स्फुरण, अभिव्यक्ति होती है, उसका सारा रस फैलकर, उलट- पलट कर प्रत्येक विवेकी के हृदय में बस जाते है। उसी तरंग में अनन्त संगीत, लय, काव्य पसर जाते है। सबको लगता है कि साधक की बात अपने ही है। उनकी अभिव्यक्ति, आपबीती, जगबीती हो जाती है, तो जाने अनजाने मानव मन में संस्कार समझ और आत्मीयता भरने लगती है।
साहित्य क्षेत्र में भी यही स्थिति होती है, जब न्यूरो ट्रान्समीटर द्वारा बात होती है और तब वह रचनाकार से सृष्टि बन जाता है। वैदिक ऋषि मनीषा ने जिस सृष्टि को कविर्मनीषी परिभू- स्वयंभू कहा उसी का महाकाव्य है ये सृष्टि जो उसे समझ लेता है, वह वही बन जाता है। मनुष्य के भीतर चल रहें इलेक्ट्रॉन, प्रोटान, न्यूट्रान के लय बद्ध नर्तन की खबर विज्ञान देता है। स्वांस प्रस्वांस का लय टूटते ही शरीर और जीवन की कविता भी टूटने बिखरने लगती है। साहित्य में इसे भावस्खलन कहते है।
हर वर्तमान अपने अतीत की कोंख से पैदा होकर स्वयं अतीत बन भविष्य की बुनियाद गढ़ता है। अत: नवीनता अथवा वाद- विवाद की सनक में अतीत की अच्छाइयों का एक तरफा तिरस्कार समझदारी नही है। भूत और वर्तमान की संगति, सामंजस्य, ताल- मेल से ही उज्जवल भविष्य संभव है। कल के अच्छे बुरे का गवहीनता के बजाय आज को सफल बनाने का मध्य मार्गी होना ही उपाय है। सदुपयोग की समझ हो तो खण्डहर के मलबे को संजोकर नई इमारत बनाया जा सकता है। श्री जे. के. कानेकर द्वारा संपादित पुस्तक अंबेडकर वादी कविताएं भी कु छ इसी तरह का है। अनेक विद्वान और मान्य रचाकारों की कविताएं संकलित है। समग्र और सार्वभौम से कटकर ही कोई वाद का अस्तित्व कायम हो सकता है अगर इसे स्वाभिमान की कविताएं इंसानी कविताएं जैसी कोई शीर्षक अधिक सार्थक होता। डॉ. यशवंत मनोहर ने बताया कि अम्बेडकर साहित्य की स्थापना नागपुर में सन 1935 को हुआ था। जिसे 1948-50 में दलित साहित्य कहा गया फिर इसे 1961 में बौद्ध साहित्य की संज्ञा दी गई परन्तु साहित्य ही चर्चित प्रचलित है। 1935 में हिन्दु रूप के अनुसार जन्ममरण की कुण्डली को नही मानने से सामाजिक बहिष्कार, अनाचार एवं हत्याओं के कारण बौद्ध साहित्य जलन शील हो गया। तेवर  उग्र होकर, भारी विद्रोह होने लगा।
जो बौद्ध नही हो पाये वे आज भी दलित है, उनका ही दलित साहित्य कहलाता है। धम्म स्वीकारने वाले दलित नही रहे, वे जाति, वर्ग धर्म से मुक्त हो गए। धर्म, अध्यात्म और ईश्वर क ी बाते, जातिभेद, आर्थिक विषमता को स्थायी बनाए रखने का प्रयत्न करती है। चातुर्वर्ण्य में अतिशुद्र नही आते थे। बुद्ध काल में शुद्रों, अछूतों, दलितों के पूर्वज बौद्ध थे, हिन्दु जैसा आचरण, व्यवहार करते रहे परन्तु हिन्दू धर्म शास्त्रों ने उन्हें हिन्दू कही नही माना। इनके पूर्वज नागवंशी थे, सिन्धु सभ्यता में मूल और तात्कालीन राजकीय सभासद थे वे कट्टरपंथी कभी नही थे। सतत प्रगतिशील रहे, जो स्त्री - पुरूष में भेद नहीं मानता वह अम्बेडकरवादी है जो धर्म, वांडमयी और राज्य सत्ता के आगे नहीं झुकता वह अम्बेडकर वादी है, जो  लेखन और जीवन में फर्क नहीं समझता, जो किसी भी धर्म ईश्वर पाश्विक शक्ति की गुलामी नहीं करता, ऐसे बुद्धिवादी मनुष्यता का स्वप्र दृष्टा अम्बेडकरवादी है। स्त्री - पुरूष में जो चाक्षुस विरोध है, उसे निर्मूल किया जा सकता है। कवि कहते हैं - शक्ति, शौर्य, प्रकर्ष और बौद्धिक पराक्रम दिलायेंगे। आकाश को ठिगनेपन का अहसास कराने वाले होनहार बिरले चाहिये।
प्रस्तुत कविता संकलन में श्रद्धेय वामन दादा कर्डक जी गौतम न मिलेगा तथा अम्बेडकर ने अपनी कविताओं में इंसानियत के बीच स्वाभाविक जीने का अरमान, जगाने का सार्थक पहल किये हैं। श्री बाबूराव बागुल जी की कविताएं मशाल कांति को तथा जिसने की गलती यहां जन्म लेने की भी उन्हीं भावनाओं के साथ, मशाल लेकर आम लोगों के पास जाने प्रेरित करते हैं, ये जगाते हैं कि तुम उठो सीना ताने, अछूत वाली बीमारी, कालरा - कैंसर की छोटी बहन नहीं है। केवल धरती पर जन्म लेने की गलती से ही है। याद रखो, वेद से पहले तुम थे। तुम्हारे कारण ही धरती सजीव हुई, श्री यशवंत मनोहर के उद्गार  तड़पती नाड़ी युग की मानवता के मंदी में, यह गांव तू युद्ध हुआ था - कविताओं से है कि दुख अपमान के विरूद्ध सशस्त्र वेदना संग्राम के लिए बेचैन है तंत्रिकाएं। खून की भाषा को मातृभाषा नहीं होने देंगे। बेवजह किसी भी उजाले की नाकाबंदी नहीं होने देंगे। अब तो मृत्यु ने गाँवों को गोद ले लिया है। राख से उभरा आंदोलन है यह, अंधों की बिजुरी तूफान है, पीड़ितों का महाकाल है यह युद्ध इन रचनाओं में प्रतिशोधी गमक और शोषण, अपमान प्रताड़ना के विरूद्ध असीम मर्म भेदी छटपटाहट है।
इसी प्रकार श्री नामदेव ढसाल, श्री केशव मेश्राम, श्री दया पवार, श्री वामन निम्बालकर, श्री ज. वि. पवार, श्री भुजंग मेश्राम, श्री अरूणकाले, श्री त्रबंयक सपकाले, राम दोतोड़े, प्रज्ञा लोखंडे आदि की चुनिन्दे कुल त्रेपन कविताएं हैं, जिनमें सामयिक असंतोष, विस्तृष्णा, आक्रोश कथ्यों की ताजगी और बहुआयामी सौन्दर्य भी है। यथा - धूप में खड़े पत्तेहीन पेड़ों का अर्थ मिलता है। उन्होंने जबरिया कब्जा कर मूल निवासियों को कुचला, वर्ण और वर्ग भेद बनाया। गुलाम स्वर्ग, देव, नरक, सीमा बांध आदि घटक निर्मित किए। जीवन का सब कुछ बिगाड़ा। हिन्दू संस्कृति की चक्की में देह शुष्क हुआ मेरे ही रस से खिली लताएं मुझे छाया में आने से रोकती है। पेट कब्रिस्तान हुआ तो मैं क्या करूं ? सत्ता सुख में डूबे हुओं के बीच सवालों के घेरे से मुझे बचाने कौन आयेगा ? वे जीते तो साहित्य इतिहास बनाने हम जीते। हे, युग का इतिहास बनाने। सुलगती लंका के लिए मेरी झोपड़ी में पानी कहां ? सार्वजनिक राहों की आजीवन गुलामी का झाड़ू को सलामी ही नियति है।
कवि श्री अर्जुन डांगले, श्रीमती ज्योति लांजेवार, हीरा वानसोडे ने भी अपनी पैनी और तीखी रचना संजोये हैं। कुछ दृष्टि गौरतलब है - इतिहास की तारीख मिटाने कुन्ती का मौन व्रत लेकर कर्ण के लिए लड़ना चाहती है। बेचने निकाली गयी रद्दी कागज जैसी निकम्मी हुई जिन्दगी लेकर कुछ तोते आये। शब्द बिकाऊ नहीं होते, यह सुन उनने शब्द प्रबंध सामने रख दिया । हे संस्कृति, तूने कुन्ती बनकर हमसे सौतेला पनका विषम कुटनीति कर गई। कर्ण जैसे मातृत्व नकारने आयी। हे मृत्युगणों, जिनके लहू पीकर तू तृप्त हुआ हैं, उन्हीं की अरमानों भावों पर खड़ा हो, मैं तुम्हें सही रास्ता दिखाने ललकार रही हूं। इसी तर्ज पर श्री अर्जुन डांगले, श्री शरण कुमार लिंबाले, श्री प्रकाश बच्छा व श्री भदन्त एन. बोधिरत्न नामक थेरो, श्री लोकनाथ, यशवंत, श्री अमर रामटेके, श्री जी. के. कानेकर जी की प्रेरक रचनाएं संकलित है, जिसमें चुपचाप जुल्म सहने के बजाय शब्दों में प्रलय की आग, कलेजे के बोल पिरोने के संदेश है। पुस्तक पठनीय है। सभी रचनाकार व सम्पादक बधाई के पात्र है।

  • पता - नर्रा, बागबहरा जिला - महासमुन्द, ( छ.ग.)

 पुरवा कहती है

  • समीक्षक - आनन्द तिवारी पौराणिक 

समीक्ष्य कृति पुरवा कहती है - सुधा वर्मा का सद्य प्रकाशित प्रथम काव्य संग्रह है। संग्रह की कविताएं कवयित्री के सम्वेदनशील हृदय की गहराइयों से नि:सृत होकर अजस्त्र निर्झरिणी की तरह प्रवाहमान हुई है। कविता जीवन की लयात्मक और भाषात्मक संगीत होती है। सम्वेदनशील कविताओं में अपार सौन्दर्य - बोध के साथ अन्तस की भीतरी तहों को छूने की अद्भुत शक्ति होती है। इस काव्य संग्रह में कुल 60 रचनाएं हैं। कवयित्री की आशावादिता संग्रह की प्रथम कविता - ऐ नववर्ष में मुखर हुई है :-
ऐ नववर्ष, क्या सच तुम कर पाओगे।
भूखों की रोटी, गरीबों को घर दे पाओगे।।
नवसृजन के लिए कवयित्री का यक्ष प्रश्र एक चिन्तन के रूप में उभर आता है।
जब तलक न मन से मन का आलिंगन होगा।
कैसे फिर कोई सृजन होगा ?
टूटेंगे आज फिर हृदय के बन्ध - कविता में मन की अभिलाषा रस सिक्त हो उठी है -
है मादकता छाई मनोहरा।
तरंगित हो, गा उठा पपीहरा।।
कोयल बोले कुहू - कुहू में अमराइयों की महक और ध्यन्यात्मकता की लय है -
मन मयूरा झुम - झुम जाये
जब चले बासन्ती पवन धुन,
अब कोयल बोले कुहू - कुहू।
महुआ  झरे रस भरे कविता में प्रेम की उद्दाम लालसा मुखरित हुई है -
छलकी फिर नेह की गगरी, महुआ झरे, रस भरे।
संग्रह की प्रतिनिधि कविता पुरवा कहती है - जीवन के सकारात्मक सरोकारों से जुड़ी कामनाओं का बिम्ब खींचती है -
नवजीवन पा वसुधा ने, प्रणय गीत गाया है।
पुरवा करती है, फिर बसंत आया है।।
कविता - उमर की मधुशाला - अतृप्त मन की प्यास का सुन्दर चित्र खींचती है -
एक मुट्ठी भर अम्बर
तो ही मैने मांगा था
उड़ न जाये पंख पखेरू
जीवन की अभिलाषा ले।
स्मृतियों के फूल झरे - कविता बहुत पीछे छूटे हुए अतीत की याद दिला जाती है -
नयनों में निखर उठा,
सुवासित गाँव
दरिया का पानी है
और पीपल की छाँव।
कविताएं आकाशदीप, मन चन्दन चन्दन, टूटे न ये पाश प्रिये, माँ हूं मैं, उठो वीरों, गाँव खो गया, राजीव नयन संग खेलेंगे होली तथा घरौन्दा जीवन सन्दर्भों से जुड़े यक्ष प्रश्रों को उकेरती है। सशक्त रचना औरत - नारी शक्ति का प्रतिबिम्ब जगाती है।
मैं औरत नहीं सदी हूं।
अनवरत बहती नदी हूं।।
कविताओं की भाषा, साहित्य से ओतप्रोत है। शिल्प सुन्दर है। भावों की गहराइयां मन को छूती है। कवयित्री का प्रथम प्रयास सफल हुआ है। सुधा जी निश्चित ही साधुवाद की सत्पात्रा है। उनकी सारस्वत काव्य यात्रा अनवरत चलती रहे और वे प्रगति की ऊंचाइयाँ छुएं, यही कामना है।
  • पता - श्रीराम टाकीज मार्ग, महासमुन्द, (छ.ग.)

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