इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 1 जुलाई 2013

नचकार

  • -  मंगत रवीन्द्र   -
नकुल हर नानपन ले गम्मत म नाचत हे। पहली तो गंड़वा बाजा म नाचे ल सीखिस। ददा हर मोहरिया रहिस। तिही पाय के बेटा घला ल नचकार सीखा डारिस। बर बिहाव, छटï्ठी बरही बर ककरो अंगना दुवार म जा के गुदरूम बाजा ल दमादम झमकावैं। भूती मिलै सिरिफ चोंगी माखुर अऊ दार चउर ... धीरे - धीरे आना सुखा मिले लगीस। बजनिया जात ... बाजा बजा  के अपन जिनगी ल पहावत हे। न खेती करे के सउंक न पढ़े लिखे के। बस, बड़े - बड़े मालिक मन के दुवारा म जा के राग रंगी म मोह लेंअ अऊ दु - चार आना मिलै तिही म गुजर बसर करत हे। आदि पुरखा ले ए बुता हर आवत हे। पुरखौती बुता जान के आन बुता ल धियान नइ ए। कहै - पुरखा के काम ए ददा, रिवाज ल चलावत हन आने काम तो आय नहीं ... मालिक मन के असीस मिलै, इही म हमर गुजारा हे। बजाबो मालिक मन के तभे हमर पेट चलही। एही भाव म चिपके बजनिया समाज अपन उबार नइ कर सकत हे। देखौ, ओमन ल आज ... गरीबी अऊ पिछड़ापन हर नइ छोड़े हे। बने घर दुवारी बना ली, खेती किसानी ल चबंद करी पढ़ लिख के पुलुस दरोगा बनीन अइसे सोच के कमी म गरीबी के पहुना हर नइ टरत ए ... अइसे मोला लागथे।
नकुल थोरकन बने जानीस तहाँ ओला लोकरंग गम्मत पार्टी हर ले लीस। बज गाँव के गुड़ी म खचाखच मनखे भरे रहैं। पेटी तबला के सरगम बाजै ता ... ताकथीथइया ताकथीथइया, पाँव ल पटक - पटक के नाचै। हाथ मुंह ल मटकावै। नकुल सम्हरै ता निचट छोकरी कस लगै। पातर कनिहा, पाँव म घुंघरू, आँखी म काजर, गाल म हरपाल, छाती म पोइलका अऊ तन म लाली के साड़ी ल पहिर के चाकामिरी किंदर के नाचै ता पैसा म गूंथा जाये। फॉफी राग ... प्यार किया तो डरना क्या, अजी प्यार किया तो ... जइसे गीद म रूपया गदा जाये।
नकुल के सुवारी सुकली, गाँव के बेटी ए। छोटे खूंटी के रहिस। ओकर नचकार पति नाचे ल जाए ता तीनों लइका के जोरा जोखा म रहय। गरीब मनखे के आय। गम्मत के पइसा म बारह महिना थोरे पहाही। बनी भूती तो करेच्च ल परही। असवा, मोती अउ मनी ... तीन ठन बाबू। असवा बड़े छोकरा ए। सज्ञान होगे। सुकली हर छोटे बाबू मनी ल बुगी बांध के ककरो कनकी कोढ़ा छनके पछिने ल चल देअ। कभू - कभू तो रो डारै। चूल्हा बर लकरी नइ ए। मदरसा म चउर नइए अऊ ओती गम्मत म मजा उड़ावत हे। पालथी मोड़ के खावत होही अऊ ऐती हड़िया उपास ... नान नान लइका, डउकी परानी के कछु चेत नइ ए ...। चाहे घर ती काहीं होय। पर कभू पारा - परोस के माई लोगन मन कहैं के, तोर घर वाला हर नाचथे ता समाज हर मूते नइ उठै। सुन के सुकली हर पंचर साइकिल म हवा भरे कस थोरकन फूल जाये ... तहाँ फेर ओसक जाए ...।
एक दिन सुकली हर बड़े गउटिन के बलाव म चउर पछिने ल गइस। असवा घला पाछु - पाछु चल दिस। दाई महूं जाहूं ... झन  जा रे ... घरे म रह बेटा। मैं गउटिन घर चंउर निमरे  ल जावत हौं, तोर बर खाई लाहूँ ... टूरा बड़ जिदहा ए गोहना के चल दिस ...।
पीढ़ा म बइठे बइठे जुवार भर ले चउर ल निमारिस। बेटा असवा हर गंउटिया घर के लइका मन संग खेले म भुलागे। जेकर घर केसो तेला का के अंदेसो ... उज्जर - उज्जर लइका, सुन्दर - सुन्दर पहिरना ओढ़ना ... कभू लकरी के घोड़ा म चढ़ के खेलै त कभू हाथी म चढ़ै। बघवा भलुवा के दन पुतरी ता बड़े  लइका, तीन चकिया साइकिल ल ढुलावैं। लेंटर के घर ... ऊपर पंखा घुमरत रहै। जम्मों लइका कुदरा - कुदरा के खेलत रहैं। खाय के बेरा होइस तहाँ बड़े गंउटिन हर कहिस - सुकली नोनी,
- काय गंउटिन....।
- अब थोकिन सुरता ले। जा कुंआ म नहा खोर के आ जा। ओ दे गंज हे। सुकली अइसनेच करिस। अपन बाबू असवा ल लेके पोता दसा के परछी म बइठ गे। तहाँ बड़े गंउटिन थारी म दूध भात, कटोरी म करोंदा के चटनी, माली म मखना के साग ल परोसिस। ले खा ले ... हमरो घर ...। बड़े गंउटिन के परोसे अऊ मया ... गंगा जमुना के धार ए। सुकली पेट भर खाइस। भाजी नून के खवइया, कभू - कभू तो अइसन भोजन मिलथे। असवा के लइका हूँस ... रपोट - रपोट के खाइस। सुकली हर माँज धो के डेहरी म मढ़ा दिस। बड़े गंउटिन कहिस - थोकिन सुरता ले तहां ले बहंचे हे कोहड़ा तेला पछिन देबे। तहाँ घर जाबे। सुकली हर अइसनेच करिस।
सब के लइका बरोबर ए ... मया तो एक ठन होथे अइसे गुन के बड़े गंउटिन हर सुकली के बेटा बर एक छिटिया कांदा ल उसन के पन्नी म जोर दिस। कहिस - एला धरले, तोर लइका बर अऊ काली फेर आबे ओ पिछोत के भिथिया हर उकले हे छाब देबे ... हौ कहत सुकली अपन घर आवत हे ...।
असवा हर अपन दाई के अंगठी ल धरे हे, चुलबुल लइका, टुपटुपाउन गोड़ ल उसालत हे। रस्दा म दाई ल कथे - दाई, गंउटिन घर आनी - बानी के खिलौना हे। ओ मोरो बर ले देबे ना।
- हमन कहाँ पाबो बेटा ? गरीब मनखे ...। - ता ओमन कहाँ पाइन ? - ओमन किसान ए ग। चीज बस भरे हे। - ता हमर घर काबर नइ ए ...।
-हमर खेती डोली नइए बेटा, पैसा कौड़ी नइए।
- ता ओमन कहाँ ले पाइन ?
- टार ग बेटा, एके ठन गोठ ल केचत रथस। जाने सुने के लइक होबे ता जानबे।
- ऊँ ... ऊँ, बता न दाई, महुँ ओइसनेच लेहहौं ... ददा ल कहूँ। ओमन के बड़का घर बड़का परछी। हाँ हम अपनो ददा ल कबो ... बनाए ल ...।
- तोर दाद मनचाटन ए ता कहाँ ले बनाही। नाचे तो गए हे।
- ता नाचे म पैसा नइ मिलै दाई ?
- मिलथे ग, पर ओतका म पुरखा थोर तरही।
- ता ओकर ददा हर नइ नाचै ...?
- छि: रे, गंउटिया हर नाचही। बड़का मनखे ए नौकरी करथे। खेती करथे। तभे तो ढाबा भर धान पाथें।
- ए नौकरी काय दाई ?
- अरे, सरकार के नौकरी ... पइसा देथे सरकार हर।
- ता हमर ददा काबर नइ करै ?
- ओई हर करही, लेढ़वा हर, पढ़े न लिखे, अड़हा तो आय।
- ता पढ़े ले नौकरी अऊ पइसा मिलथे दाई ?
- हहो रे ... निचट केचत रथस। गउंटिया हर पढ़ लिख के साहेब मुंशी बने हे। ऐकरे सेतीर सरकार हर ओला झोला - झोला पइसा देथे।
- ता महुँच्च पढ़हंू दाई, साहेब दरोगा बन के पैसा पाहूँ, अऊ रोंट रोट नाना परकार के खेलौना लिहौं। हां, अऊ तोर बर गंउटिन कस गल्ला के माला लिहौं।
- चुप्प रे, ददा अड़हा गंवार ... ता तैं का पढ़बे।
- ता का ददा अड़हा हे ता बेटा घला गंवार होथे ?
- नहीं, पढ़बे ता साहेब दरोगा बन जाबे।
- हौ दाई, महुँ खूब पढ़िहौं। कहत दाई के अंचरा ल धरे - धरे कुदरत धउरत घर आथे।
घर आते सात अपन भाई मन ल कथे - अरे महुँ पढ़ूँ अऊ दरोगा साहेब बनहूँ। मोती कथे - तहाँ हमन ल पुलुस बन के बांध के ले जाबे का ?
- नहीं रे, चोर मन ल पकड़हूँ अऊ जेहल म बन्द करहूँ। सरकार मोला एक जेब पैसा दिही। तहाँ रोंट घर बनाहूं, बड़े - बड़े खेल खेलौना लिहूँ। कहत भाई मन संग खेलई म भुलागे ...।
असवा हर रात के सोवय त बड़े - बड़े महल, बड़े - बड़े हाथी घोड़ा के खिलौना ल सपना डारै। रात के झकना के जाग जावै। तहाँ फेर सूत जाये। तीन महिना के गये ले नकुल ददा हर गम्मत नाच के आइस। कांध म अरझे बेग, आँखी म काजर, मुँह कान म पसीना डबडबाए हे। उरमाल म मुंह ल पोंछत परछी म घुसरथे। ददा ल आते साध असवा ओकर जांघ ल पोटर लीस। कथे - ददा, महूँ पढ़हू, साहेब दरोगा बन के बड़का - बड़का खिलौना लिहॅंू ... बड़े गंवटिन के बेटा मन ले अऊ बड़े - बड़े लिहौं। हौ न ग ददा ? ददा हर बेटा के अइसन गोठ ल सुन के अचरित होगे। आज बड़े मनखे कस मोर लइका हर गोठियावत हे।
फेर सुकली हर लोटा म पानी लान के नचकार ल देइस। बेग ल घर कती करिस। कछु - कांही ल हेरिस। तहाँ फेर असवा कथे - ददा, मैं पढ़हूं , चल भरती करा दे।
- कस ओ सुकली, ए लइका ल का सिखा देहे हस। सुआ मैना कस ? पढ़े - पढ़े के नाव लेथे।
- ए टूराहर न ओ, रातो के दसना म बरबराथे।
- ता फुंकवा नइ देहे रते ...।
- छी:, बइहा - भूतहा कस तहॅं गोठियाथस, जाना माना भूत धरे हे। ओ दिन गंउटिन घर चंउर पछिने गये रहें ता उहाँ के चीज बस ल देख के पूंछिस। ता कही पारें - गउंटिन के मनसे हर पढ़ लिख के साहेब दरोगा होए ता सब चीज बस ल करे हे। बस ओ दिन ले रटन धरे हे। अरे, कहाँ राजा भोज अऊ गंगू तेली ... घर म भांग नहीं अऊ बोर्री ले माला ... तहाँ फेर असवा हर ददा ल हला के कथे - ददा, पढ़हूं हाँ। - बेटा, गरीब मनखे ल पढ़े लिखे ल भगवान हर नइ कहे ए ...। - कब क हिस ददा ?
लइका के सवाल ल सुन के नचकार ददा के मुँह खिलागे। अंगठी ल चाब लीस। तहाँ फेर कथे - हमन बजनिया के जात, पढ़बो - लिखबो ता बाजा ल कोन बजाही। सुदामा तो पढ़े रहिस, का करिस ? जस के तस, मांग - जाँच के तो सुदामिन ल पोसै -
औरन को धन चाहिए बावरी, बाम्हन को केवल भिक्षा ...।
अतके बेरा ओती ले मंगत गुरूजी गली नाकत रहै। गुरूजी ल देख के नकुल कथे - जै राम गुरूजी। - जै राम भई नकुल, कब आये जी, गाना बजाना ले। - ऐ दे, अभीच्चे आये हौं सर ... हाथ गोड़ नइ धोए हौं ता मोर बड़े टूरा हर पढ़े के फरमाइस देवत हे। पढ़ई लिखई हर गीद गोविन्द थोरे ए सर के फरमाइस दे तहॉं -
॥ इहाँ के रहइया नोहै कापन ओकर गाँव ग॥
॥ दस के मोला नोट दिसे, सरजू ओकर नाव ग॥
फेर गुरूजी सम्मेत खलखलाके हाँस भरिन। सुन न नकुल भाई, तोर लइका के सब गोठ ल सुनत रहें। तोर लइका बने सउंक करे हे। स्कूल ल खुले दे तहाँ भरती करा देबे। पढ़े लिखे हर अकारथ नोहे ग। देख न, तैं नाच के सारी जिनगी ल पहा डारे, पर ए कुरिया के टेड़गा चउखट हर सीधा नइ होइस। सुकली के केंस म कभू नरियर तेल नइ ठोंकाइस। ओहिच्च घर, ओहिच्च दुवार, जिनगी म नइ अइस सुधार॥ तोर तीनों लइका ल पढ़ा, बनी कर भूती कर। ए गोठ ल गंठिया के धर... तभे तोर जिनगी हर होही सुधार। रूप के रहत ले नाचबे तहाँ ओ पार कइसे करबे। भीख मांगबे का ? नराज नइ होबे ता कहत हौं - देख तोर पुरखा ले एई धंधा ल करत आवत हें, का बनाईन ? के तहुँ का बनाबे ? जमाना बदल गे हाँ, सीजन आइस ता दु - चार दिन नाच ले, सउंक बुता ले।  एमा कला हर जिंदा घला रही। एकर पांछु जिनगी ल झन खपा ...कपड़ा धोवइया, धोते - धोते अपनो धोवा के सेटरा होगे। केंस कतरइया, कतरत - कतरत अपन सुख के जरी ल कतर डारिस। गाय चरइया बरदी चरावत - चरावत अपन सुख के कांदी ल जरमूर चरा डारिस। बाम्हन पोथी पढ़त - पढ़त अपन जिनगी के किस्सा ल नइ पढ़ पाइस ...। ए सब बुता रहै पर ओहिच्च म जिनगी ल निछावर नी करना चाही। जुग बदलगे। आँखी खोलौ, पढ़ौ - लिखौ। आगे बढ़व, एही म सुख हे।
फेर गुरूजी के बानी ल सुन के नकुल के आँखी उघरगे। संकलप लिस के गवई - बजई तो छुटै नहीं पर बाल - बच्चा ल खूब पढ़ाहूं- लिखाहूँ। भले मैं जोगी बन जावौं। अउ अइसनेच करिस। आज असवा , ददा के डहर बदले ले पढ़ लिख के बेंग के मनेजर हे। मोती भाई सरहद म सिपही हे अऊ छोटे बाबू मनी ... प्रायमरी स्कूल म लइका पढ़ावत हे। अब तो नकुल नचकार , नकुल बबा बन के परछी के बजवट म बइठे मनेजर साहेब के बेटी अयुष्का ल झुलावत ए गीद ल गावत हे -
॥ तेरे मन की गंगा और मेरे मन की गंगा॥
॥ बोल राधा बोल संगम होगा या नहीं ?
संगम होगे ... सुख के ... बबा नकुल के जिनगी म ... कथा पुरगे, दार भात चुरगे ...। कापन अकलतरा, जाँजगीर - चाम्पा छ.ग. 

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