इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

छाती म गोली खाबे



- शरद शर्मा  -
जा बेटा, तैं धरती के पार
तोर मुड़ म हे, करजा अपार
चुन - चुन तैं, बैरी ल मार
पहिराहूं तोला, फूल के हार
मैं बांधेव तोर गठरी म लाड़ू
जा बेटा, तैं मोर दुलारू।
तैं रहिबे सबो ले आगू
झन दिखाबे तैं हर पाछू
छाती म गोली खाबे,
बेटा, बिन जीते, तैं झन आबे
मोर दूध मा, अतका - आगी
मोर बोली म , अतका गोली
ऊंहे मनावें तैं देवारी अऊ
ऊंहेच्च खेलबे तैं होली
छाती म गोली खाबे
बेटा, बिन जीते तैं झन आबे
अपन देश बर, जीबे- मरबे
भूखे - पियासे, भले तैं रहिबे,
सब्बो झन के पीरा हरबे,
अपन भुइंया के पिआस बुझाबे
भले छातीम गोली खाबे
बेटा रे , बिन जीते, तैं झन आबे।
ये जी,
काबर धरती ल लजाथो ?
काबर जन - जन के लहू बोहाथो ?
ये देश, तुंहार नो हे का ?
ये लहू, तुंहार नो हे का ?
काबर अपन ल रोवाथो ?
अऊ काबर बैरी ल हंसाथो ?
काबर मंदिर मा महाभारत मचाथो ?
काबर पनही - चप्पल चलाथो ?
काबर आगी भभकाथो ?
ये ही सबो ल करके तुमन,
का जिनीस ल पा जाथो ?
बेटा रे,
इहीच्च बात ल, समझे ल परही
इंखरेच्च - बर, छाती ठोके ल परही
तैं संसद- बिहाड़ म जाबे
अपन धरती के पिआस बुझाबे
तैं अपन म गोली झन चलाबे
तैं अपन ल झन रोआबे
तैं बैरी ल झन हंसाबे,
तैं कभू पाछू झन देखाबे
भले छाती म गोली खाबे
बेटा रे,
बिन जीते तैं, अपन मुंहूं झन देखाबे

पता - ब्राम्‍हा्णपारा, राजिम  (छ.ग.)

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