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शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

सौन्‍दर्य भी है और सुगंध भी

.  समीक्षक - मुकुन्‍द कौशल
लेखक को मैं किसी वैचारिक खूँटे से बाँधने का पक्षधर कभी नहीं रहा अतः प्रस्तुत कथा संग्रह पर विचार व्यक्त करते हुए मेरा कोई पूर्वाग्रह भी नहीं है कि छत्‍तीसगढ़ी कहानियों के कथ्य में क्या होना चाहिये और क्या नहीं होना चाहिये। हाँ, आज लिखी जा रहीछत्‍तीसगढ़ी कहानियों की भाषा और शिल्प पर चर्चा अवश्य की जानी चाहिये क्योंकि यही कहानियाँ, आगे लिखी जाने वाली कहानियों का मार्ग प्रशस्त करेंगी।
छत्‍तीसगढ़ी कहानियाँ, चाहे वे पारंपरिक लोक कथाएँ हों या लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ, सभी कहानियों में अपने समय की वास्तविकता तो चित्रित होती ही रही है, इस अर्थ में छŸाीसगढ़ी की तमाम कहानियाँ कहीं न कहीं लोक जीवन की संघर्षशीलता की ही कहानियाँ हैं।
श्री कुबेर का कथा संग्रह कहा नहीं मेरे समक्ष है। कुल जमा छः छोटी-बड़ी कहानियों के संग्रह की सभी कहानियाँ अत्यंत रोचक हैं।
छत्‍तीसगढ़ी कथा लेखन में कुबेर का नाम अब नया नहीं है। कहा नहीं कुबेर का द्वितीय कथा संग्रह है। उनका प्रथम संग्रह ’भोलापुर के कहानी’ शीर्षक से सन् 2010 में प्रकाशित हो चुका है।
गीतों में जैसे गेयता अनिवार्य होती है वैसे ही कहानियों में रोचकता। कथा कहने का अंदाज़ और घटनाक्रम कहानी को गति देते हैं। हमारे आसपास जो भी घटित हो रहा होता है उसकी तीव्रतर अनुभूति कल्पना का आश्रय पाकर जब शिल्पित होती है तो वह एक कहानी का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। हर कथाकार के पास घटनाओं को देखने की जहाँ एक अलग दृष्टि होती है वहीं उन्हें व्यक्त करने का एक अपना अंदाज़ भी होता है।
ज़ाहिर है कि यह अंदाज़ कुबेर के पास भी है। कुबेर, मनुष्य तो मनुष्य, पशु-पक्षियों तक की आंतरिक सम्वेदना को अत्यंत निकट से महसूस करते हैं और शायद इसीलिये उनके कथ्य उनकी अंतर्दृष्टि के संवाहक प्रतीत होते हैं।
संग्रह की पहली कहानी आज के सतवन्तिन: मोंगरा ऐसी कंगारू है जिसमें कहानी के गर्भ में एक और कहानी है। प्राचीन तोता-मैना के किस्सों में इसी तरह कहानी से कहानी निकाली जाती थी। सच तो यह है कि कोई भी कहानी कभी पूरी नहीं होती, हो भी नहीं सकती, बस एक पड़ाव पर जाकर रुक जाती है; वहीं से आगे की कहानी आरंभ होती है।
आज के सतवन्तिन: मोंगरा कहानी में सतवंतिन की लोककथा को एक दहेज विषयक कहानी के भीतर अंतर्कथा के रूप में प्रयोग किया गया है। यह मोंगरा की कहानी है। समाज में प्रचलित दहेज की कुप्रथा, पारंपरिक स्त्री की दारूण व्यथा और दबी मनोवृत्तियां की मनोदशा को व्याख्यायित करती इस कहानी में चिड़िया का मानवीकरण कर लेखक ने जो अद्भुत प्रयोग किया है, वह पाठकों की संचेतना को झकझोरने में सक्षम है। संपूर्ण कथा में यह पक्षी ही एक ऐसा पात्र है जो अद्योपान्त उपस्थित रहकर कहानी के सिक्वेंस को क्रमशः आगे बढ़ाता चलता है और कथा के ताने-बाने को अंत तक बाँधे रखता है। मानवीय संवेदना को गहरे तक स्पंदित करती, यह  एक ऐसी शोषित-दमित-उत्पीड़ित और निरीह स्त्री की व्यथा-कथा है जिसकी विवशता हमें विगत सदी की नारी के कथित आदर्शों का दिग्दर्शन कराती है। ’बाम्हन चिरई’ के माघ्यम से फेन्टेसी गढ़ते हुए वर्तमान स्थितियों की छवि दिखाना असंभव भले ही न हो, कठिन अवश्य है।
कुबेर की स्वानुभूत संचेतना जब किसी घटना को आकृति प्रदान करती है तो वह ’बाम्हन चिरई’ जैसी कहानी बन जाती है।
’बसंती’ कहानी आकांक्षा और निश्चय की दृढ़ता को वाणी प्रदान करती, जीवनोत्कर्ष की एक प्रेरणास्पद् कथा है। खेतिहर मज़दूरों और बनिहारों के रूप में गाँवों में जहाँ सर्वहारा वर्ग की बहुतायत है वहीं मालगुज़ार, गंउटिया और दाऊओं के रूप में ग्रामीण अभिजात्य भी मौज़ूद हैं। सर्वहारा ’गनेसी’ और अभिजात्य ’ठकुराइन’ की मनोवृŸिायों का बोध कराती इस कहानी में शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित करती ’बसंती’ निश्चय ही एक संभावना बनकर उभरती है। ठकुराइन का संवाद, कि ’’अब तो तंय जउन दिन साहेबिन बाई बन के देखाबे, विही दिन मंय तोला मिठाई खवाहूं।’’ केवल अपनी झेंप मिटाने के लिये किया गया परिहास मात्र नहीं बल्कि एक निर्धन पर किये गए कटाक्ष-सा प्रतीत होता है। कुबेर अपनी छत्‍तीसगढ़ी कहानियों में इसी तरह की अर्थपूर्ण व्यंजनात्मक भाषा से कथाओं का अभिनव श्रृँगार करते चलते हैं।
’दू रूपिया के चाँउर अउ घीसू-माधव: जगन’ एक रिक्शा चालक की इस व्यथा-कथा में लेखक तमाम मानवीय प्रवृत्तियों की विवेचना करते चलते हैं। रिक्शा चालक जगन का कथन - ’’हमन कहाँ इंसान आवन साहब, हमन तो रिक्शा आवन।’’ सुविधा भोगी वर्ग का ऐसा कटु सत्य है जो तीर की तरह चुभता है। यह कहानी चिंतन और चेतना के आयाम को स्पर्ष करती है।
रागात्मक संबंधों की कथा ’कहा नहीं’ में प्रेम की शुचिता को प्रतिपादित करने का भरसक प्रयास किया गया है। इस कथा का बेहतरीन संवाद - ’’पवित्रता के आगू म पाप भला टिक सकही?’’ एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की तरह उभरता है। यह कथा शारीरिक आकर्षण के पार्श्व में स्त्री-पुरूष के अन्तर्सूत्र को स्पर्ष करती, यौनाकर्षण तथा प्रांजल स्नेह की महीन रेखाओं को व्याख्यायित करती एक रोचक कथा है। मुझे लगता है, इस कहानी का शीर्षक ’चंपा’ रखा गया होता तो संभवतः अधिक समीचीन होता।
संग्रह के आरंभ में ’अपनी बात’ (मन के बात) कहते हुए लेखक ने स्वयं यह स्पष्ट कर दिया है कि संग्रह में निहित गाथाओं की प्रामाणिकता को लेकर उनका कोई आग्रह नहीं है। किंवदंतियों व लोक कथाओं में ऐतिहासिक सत्यता भले ही शोध का विषय हो किंतु उन कथाओं सहित कल्पनाओं की अथाह गहराइयों में डूबे बिना लोक जीवन के कथ्य ढूँढ़ पाना भी असंभव है। कल्पनाओं के पारदर्शी आवरण से झाँकती सत्य की देह का सौदर्य अलग ही आकर्षक होता है।
जीवनानुभवों का सार्थक प्रकटीकरण और उसमें परिव्याप्त वैविध्य, कुबेर के शाश्वत चिन्तन का मूलाधार प्रतीत होता है। उनकी दृष्टि अंधश्रद्धा, सामाजिक कुरीतियाँ, सड़ी-गली मान्‍यताएं रूढ़ियाँ और व्यक्तिकेन्द्रित विद्वेष पर तो है ही किन्तु समस्या के साथ समाधान की ओर संकेत हो, तो रचना संदेश परक बन जाती है।
संग्रह की अंतिम कथा ’फूलो’ में भी छत्‍तीसगढ़ के गाँवों के निर्धन वर्ग के मध्य का आपसी सौहार्द्र, उनकी नेक नीयती, उनके बीच भावात्मक लगाव और सहयोगात्मक भावना का सजीव चित्रण है।
कुबेर, सौंदर्य वर्णन क्षमता के धनी हैं। उनके पास रूप और दृश्य को शब्दों के माध्यम से साकार कर देने की अद्भुत क्षमता है। कथा के ताने-बाने में छोटी-बड़ी घटनाओं को पिरो कर अपनी सृजनात्मक शक्ति का परिचय देती ये तमाम कहानियाँ छत्‍तीसगढ़ी कथा जगत के व छत्‍तीसगढ़ी गद्य साहित्य के क्रमिक विकास की महत्वपूर्ण पादानें हैं।
किसी भी सफल कहानी का प्रमुख सूत्र है रोचकता व जिज्ञासा। प्रतिपल पाठक को यह जिज्ञासा हो कि अब आगे क्या होगा? किन्तु कभी-कभी अधिक लम्बी वर्णनात्मकता इस जिज्ञासा के आड़े भी आती है। कहानी यदि वर्णनात्मक कम और तथ्यात्मक अधिक होगी तो संभवतः वह और अधिक प्रभावी होगी।
विविध छबियों और दृश्यावलियों से समृद्ध इन कथाओं में लेखक का वाक्य विन्यास देखते ही बनता है, यथा - ’’सत के बघवा म सवार रणचण्डी ह निकल गे बड़ोरा कस।’’ या ’’बइहा पूरा ह ककरो छेंके ले छेंकाथे का?’’(कहा नहीं)। ’फूलो’ कहानी के अंत में फूलो को नथनी, झुमका और पैरपट्टी कहाँ से प्राप्त होते हैं, यही इस कहानी का मर्म है।
इन छत्‍तीसगढ़ी कहानियों में हिन्दी के कुछ शब्द अच्छी व्यंजना प्रस्तुत करते हैं जैसे - ’लहुट के आयेंव तब तक इंखरो गृह प्रवेश हो चुके रहय।’ (बाम्हन चिरई) और ’कते फिल्टर म छन के आवत होही अतका सुंदर हवा?’ (कहा नहीं)। वस्तुतः प्रत्येक भाषा के दो प्रकार होते हैं, पहली बोली जाने वाली और दूसरी लिखी जाने वाली भाषा। लिखी जाने वाली भाषा परिमार्जित होती है। कथाओं के संवाद जहाँ बोली जाने वाली भाषा के लेते हैं वहीं वर्णन परिमार्जित साहित्यिक भाषा में होता है।
छत्‍तीसगढ़ी भाषा की निजता से संपृक्त और ठेठ आँचलिक वाक्य विन्यास से सराबोर कुबेर की इन कहानियों में अनेक स्थान पर हिन्दी की ऐसी शब्दावलि सम्मिश्रित है जिसका अनुवाद भले ही संभव न हो भाषायी रूपान्तर तो किया ही जा सकता हैं यथा - मज़ाक, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे, संगी-सहेली मन, सोचथों (बसंती) प्राणी, पीछा करे लगथें, पसीना म भींग के (जगन) मीनमेख, प्रतिबिंब, प्रचलित विश्वास, अनुभव के आधार म, विरोध के प्रबलता, आक्रोश अउ संकल्प, हृदय परिवर्तन, मोर प्रति कृतज्ञता, सृष्टि के रचना (बाम्हन चिरई) जी ल कड़ा करके, चोली म समात नइ हे, मन तो चंचल होथे, बातूनी, शरीर, खाना, वासना, प्यार, काबिल, क़ुरबान, जीवन, चाहिये, सिवा, छलावा, खुशबू, पोशाक, वाहन, सुंदरता, आदमी, दोनों, संभव, महसूस, स्पर्श, धत् (कहा नहीं) कोरा म बिठा के, जानबूझ के, याद, भी,नाज़ुक-नाज़ुक, शोर इत्यादि ऐसे श्ब्द हैं जिससे छत्‍तीसगढ़ी कहानियों को बचाना होगा क्योकि एक ओर जहाँ ये शब्द आँचलिकता की सुगंध से सराबोर चाँवल रूपी साहित्य में कंकड़ की तरह खटकते हैं वहीं ये भाषा के सामर्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।
एक बात का और भी ध्यान रखना होगा कि छत्‍तीसगढ़ी में तालव्य ’श’ या ’ष’ का प्रयोग नहीं होता। इन तमाम छोटे-बड़े अवरोधों के बावजूद ये तमाम कहानियाँ केवल कहानियाँ नहीं, अनुभवों के उपवन से चयनित पुष्प हैं जिनमें सौदर्य भी है और सुगंध भी।
वस्तुतः रचनाकार के भीतर जब कोई बात भीतर तक कचोटती है तो ज़ाहिर है कि उसकी छटपटाहट दिशा ढूढ़ने लगती है और तब अभिव्यक्ति का कोई माध्यम ही उसे मन के बाहर आने का रास्ता देता है। अपने दर्द को, अपनी पीड़ा को और अपनी छटपटाहट को व्यक्त करते हुए कुबेर भले ही सीधे-सीधे अपनी पक्षधरता न ज़ाहिर करते हों किंतु अपने कथ्य को लेकर वे शोषितों-दमितों, और पीड़ितों के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। उनकी इन कहानियों में भले ही विद्रोह न हो, क्रांति की दुंदुभी भी न सुनाई पड़े और शोषक वर्ग के विरुद्ध कोई प्रतिक्रियात्मक प्रहार भी न दिखाई पड़े परंतु किसी प्रकार की नारेबाजी न करते हुए भी कुबेर छŸाीसगढ़ के दमितों-पीड़ितों, मजदूरों-किसानों और सीधी-सरल स्त्रियों के पक्षधर बनकर उनकी आवाज़ बुलंद करते दिखाई पड़ते हैं।
कुबेर के द्वारा किया गया विषयवस्तु का चुनाव अच्छा है किन्त मुझे लगता है कि छत्‍तीसगढ़ी  कहानियों के परिवेश, शब्दावलि, विन्यास, शैली और कथ्य पर और अधिक गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।
लेखक कुबेर संभावनाशील रचनाकार हैं और उनसे और अधिक बेहतर रचनाओं की उम्मीद तो की ही जानी चाहिये।
पता - एम आई जी, 516 साहित्य पथ, पदनाभपुर दुर्ग (छ.ग.) मो. 9329416167

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