इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 10 जुलाई 2013

जीवन-रथ के गीत-सारथी:पं. रमाकान्त शर्मा

  

  • समीक्षक: डॉ. गणेश खरे (राजनांदगांव )

'दूर क्षितिज में' नामक कविता संग्रह में पं. रमाकान्त शर्मा की 101 कवितायें संग्रहीत हैं जिनमें 74 गीत-कविताये,ं 23 हास्य, व्यंग्य तथा नयी कवितायें और 4 छत्तीसगढ़ी भाषा में कवितायें हैं। इससे भी अधिक कवितायें अभी आपकी अप्रकाशित हैं। यह आपका पहला काव्य संग्रह है जिसे मई 2012 ई. में हिन्दी साहित्य समिति, छुईखदान, जिला राजनांदगांव, (छ.ग.) द्वारा प्रकाशित किया गया है।
पं. शर्मा 20 शताब्दी के छठवें दशक  से काव्य-साधना में लीन हैं तथा शिक्षकीय कार्य से निवृत्त होने बाद अब भी वे इस कार्य के प्रति पूर्णत: समर्पित हैं। आप मूलत: गीतकार हैं। दर्द, वेदना, पीड़ा- यह त्रिवेणी आपकी जीवन-संगिनी भी है और आपके गीतों की प्ररेणा-भूमि भी। इनका सरगम आपकी हर सांस में बजता रहता है। आपके गीतों में अंतर्व्यथा की यही झंकार झंकृत होती रहती है। पर आपकी वेदना व्यक्तिगत न होकर समष्टिमूलक है। आपको दुख इस बात का है कि आज बेशरम भ्रष्टाचार अमरबेल की तरह सारे समाज में फैल गया है जिसके कारण आज सारा लोक जीवन संत्रस्त है, अधिकारी तथा नेतागण मौज मस्ती से जी रहे हैं और गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाली शोषित, पीड़ित पीढ़ी आहें भर रही है, उसकी सुख सुविधाओं की ओर ध्यान देने वाला कोई नहीं है। इस तरह आपकी वेदना मानवीय धरातल पर आधारित है। इस संदर्भ में एक उदाहरण प्रस्तुत है।
मेरे गीतों में टीस, वेदना, पीड़ायें हैं
आंखों के दर्पण में दिखती धारायें हैं...(पृ.55)
चोर लुटेरे घूम रहे बन जादूगर, संन्यासी
दानवता हो गई है कितनी, आज खून की प्यासी (पृ.56)
आपके आत्मपरक गीतों का मूल स्वर यही है। मूलत: शिक्षक होने के कारण आपकी रचनायें नैतिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। मंहगाई की मार से संत्रस्त कवि इस बात की चर्चा अपनी अनेक रचनाओं में करता है। 'चांदी हैं नामक रचना में वह लिखता है--
कहने को आजाद देश है, पर हुई बहुत बर्बादी है
भूख गरीबी है घर-घर में, नेताओं की चांदी हैं।
न्यायालय में न्याय नहीं है, आसमान मंहगाई है
कुटियों में फैला अंधकार है, सिसक रही तरूणाई है. (पृ. 88)
मानवीय जीवन की विषमताओं, मंहगाई और भ्रष्टाचार के कारण जनता की विवशताओं का अंकन आपने 'कलियुग चालीसा' में और व्यापक ढंग से किया है, यहां एक उदाहरण प्रस्तुत है--
मंहगाई सुरसा भई, प्रतिदिन चढ़े अकास
बेचारी जनता पिस रही, शेष रही न आस. (पृ. 93)
इस तरह वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्यों के आंकन में आपने पूरी निष्ठा, ईमानदारी, पारदिर्शता और निर्भीकता का परिचय दिया है। इस प्रकार के युग-बोधों के अनेक चित्र में  हमें उनकी निम्न रचनाओं में भी मिल जाते हैं । आजादी की त्रासदी, दाल-दर्शन, मास्टर की पेशी, शिक्षक, अपना देश, मृग मरीचिका, चेहरा हिन्दुस्तान का आदि। इन सब रचनाओं में कवि की सपाट बयानी ही श्रोताओं और पाठकों को प्रभावित करती है। इनमें न हमें कोई अलंकार मिलेगा, न बिम्ब और न कोई प्रतीक जो रसास्वादन में किसी प्रकार की दीवार खड़ी करें।
'दूर क्षितिज में' में सबसे अच्छी रचनायें वे हैजो कवि की आकांक्षा, विवशता, उद्बोधन ओर आवाहन से संबंधित है। कवि की आकांक्षा से संबंधित पंक्तियां देखिए--
हर देहरी का मिटे अंधेरा, ऐसा दीप जले
श्रम की धरती पर फसलों की बाली खूब फले...
सौख्य शांति की किरणें फूटें उज्जवल प्रभा ढले... (पृ. 64)
इसी संदर्भ में कवि का कथन है कि भारतीय संस्कृति के सुन्दर और सुहाने रूप की महिमा सारा विश्व जानता है अत: हम सबके मन में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम का भाव प्रतिपल बढ़ते रहना चाहिए। हमें अपने अमर शहीदों की कुर्बानी को भी याद रखना होगा और हम सबका जीवन ऐसा हो जैसा हंसता हुआ मस्त गुलाब होता है। हमें ऐसे प्रयत्न करने हैं कि जिससे स्वार्थ और पाप की भट्टी में कोई भी इंसान गल न सके।
यह आकांक्षा तो मानवीय है पर वर्तमान जीवन का दानवीय पक्ष भी देखिए जिसके कारण कवि अपने घर के द्वार पर दीप जलाने में भी स्वयं को विवश पाता है। वह लिखता है--
साथी कैसे दीप जलाऊ...
बेकारों की भरपूर फसल है, नेताओं की मरी अकल है,
भाषण का अंबार यहां है, नारों का गुंजारा यहां है,
जर्जर तन है, मूक है वाणी, कैसे पापाचार मिटाऊ...(पृ. 71)
इसी संदर्भ में कवि के आवाहन और उद्बोधन के स्वर भी देखिए...
दीप पर्व है आज द्वार पर आओ दीप धरें
आलोकित हो द्वार, तमस को दूर करें। (पृ. 69)
आगे कवि लिखता है कि आज मानवता भटक गई है, छल प्रपंच की घास चारों ओर उग आई है, मीठी बोली में भी विष की बूदें घुल गई हैं पर यह विषपान करके भी और तिल-तिल जलकर भी हम इस विश्व को प्रकाश से भर देंगे।
उद्बोधनों से संबंधित कविताओं की संख्या तो काफी है, यथा ऐसा दीप जलाता चल, अब न बैठो हाथ पर तुम हाथ धर कर, यह तो कुछ भी कर गुजरने का समय हैं, झंझा है दूर अभी, हंस ले जीवन-प्रसून, जगती की बगिया में सौरभ तू भर दे, या आवाहन है आज तुम्हारा आओ कल की याद करें, जो बीती काली रातें हैं, उन रातों को याद करे आदि
पत्नी के निधन पर लिखित 'दूर क्षितिज ' में शोक गीत की मर्मस्पर्शता है और बेटी की विदाई में विरह-व्यथा का दंश। इनके अतिरिक्त कवि ने कुछ प्रशस्तिपरक और वर्णनात्मक रचनायें भी लिखी हैं पर इस संग्रह में पं. शर्मा की प्रकृति परक रचनायें अधिक कलात्मक और प्रभावशाली हैं। इस संदर्भ में बादलों से संबंधित उसकी रचनायें दृष्टव्य हैं। असाढ़ के काले बादलों में बिजली की पायल के चमकने तथा रेतों की चादर में घायल नदियों के तड़फने के मानवीय बिम्ब हमें सहज ही केदारनाथ अग्रवाल की याद दिला देते हैं।
समग्रत: हम पं. शर्मा की इन रचनाओं को हिन्दी के किसी वाद की सीमा में बांध नहीं सकते। उनके गीतों में उनके करूणामय हृदय की तीव्र अभिव्यक्ति है, आव्हान-उद्बोधनमूलक रचनाओं में उनके सृजनधर्मा कवि का कौशल है, आत्मपरक और संबंधपरक रचनाओं में उनके मन के उद्वेग तीव्र गति से फूट पड़े हैं तथा प्रकृतिपरक रचनाओं में उनके छायावादी संस्कार मुखरित हैं पर उनका समस्त कृतित्व उनके चिंतनशील शिक्षकीय जीवन से आच्छादित हैं।
तुम जग के हो पालनहारी गावें गौरव विश्व तुम्हारी, (42) मां ने अपनी छोटी बगिया बस दिन स्वार्थहीन ही सींचा (47), मुझमें पलती हैं विश्वासें...व्यथा वेदना की हैं राशें (49) आदि पंक्तियां मैं इसलिए उद्धृत कर रहा हूं कि पाठकगण इनकी ओर ध्यान न दें, भले ही इनमें व्याकरणिक या लयभंग आदि के कुछ दोष हों पर कवि के भाव
आवेग के प्रवाह में ऐसे दोष स्वयं तिरोहित हो जाते हैं।
  • पता -98 सृष्टि कालोनी, राजनांदगांव (छ.ग.)
सूरज से सीखें रोशन करना

समीक्षक: डॉ. रामसिंह यादव (जादौन,उज्जैन)

कवि जगन्नाथ विश्व का संघ प्रकाशित कविता संग्रह सूरज से सीखें जग रोशन करना पढ़कर लगता है कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि, इस काव्य संकलन की रचनाओं से यही अनुभूत होता है। एक बात विशेष इस ग्रंथ की कविताओं में भाव पक्ष की प्रबलता है। जिसके कारण विद्वत सुधि पाठक विमुग्ध और अभिभूत होता है। ये कविताएं बंधनों से परे होकर भी नवीन उपमानों का पट खोलती चलती है। गीत, नवगीत, मुक्तक, गजल और मुक्त छंद, हास्य श्रृंगार, वीर सभी रसों में परांगत कवि विश्व है। सूरज से सीखे जग को रोशन करना पुस्तक के मुख पृष्ठ का कलेवर बहुत ही आकर्षक है। वहीं शीर्षक अपनी व्याख्या स्वयं घोषित करता है। कवि की सूक्ष्म दृष्टि से मानव को देख रहा है जो बहुजन हिताय और परोपकाराय सत्ता विभूतय के मानवीय सूत्र को विस्तृत पशुता का बाना ग्रहण कर चुका है। आज का मानव कर्तव्य बोध को नकारता हुआ स्वार्थ और हताश के बीच लटका हुआ दिखाई देता है। कवि विश्व का यह संकलन मानव के नकारात्मक सोच, इर्द- गिर्द अवसाद में डूबे मावन और अस्तित्व को यथार्थ के फलक पर रेखांकित करने में पूर्ण सफल है। अपने स्वयं के बारे में जैसा मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने कहा था उसी तरह बेहिचक यह कवि भी कहने में अपने को छोटा महसूस नहीं करता है-
मैने एक मजदूर के घर जन्म लिया है
मैने इस जीवन को पाकर कैसे जिया है
मैने फटी सी जिंदगी को कैसे सिया है
मुझसे भुख ने बड़ा महंगा सौदा किया है।
 आज के विकट और जटिल जीवन को जी रहे व्यक्ति की व्याकुलता अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त कितनी सूक्ष्मता से कवि ने चरेवैति- चरेवैति के रूप में व्यक्त की है।
  जनकवि जगन्नाथ विश्व युग की अंतर्वेदना को पूर्णत: अपनी वेदना अनुभव करके आदमी में भगवान का रूप देखते है और वह है उनका मेहनतकश इंसान-
कोई मठ, मंदिर, मस्जिद में खोज रहा भगवान है
मेरा तो आराध्य देवता मेहनतकश इंसान है।
   मानव समाज की पीड़ा, उन्भथित कवि का जीवन चिंतन तथा समाज की व्यथा- कथा का एक संपूर्ण अभिसार बन गया है। साक्षी के लिए नारी वंदना नामक गीत की ये पंक्तियां देखिए-
अर्चना करती किरण प्रात: की ओ, सिन्दूरी शाम
भारत की नारी तुमको है बारम्बार प्रणाम
नारी समाज के प्रति आदर भाव, सामाजिक दायित्व के निर्वहन शोषित- पीड़ित सर्वहारा वर्ग मजदूर किसान बसंत शरद, ग्रीष्म और वर्षा के अलावा देश प्रेम राष्टीयता के गीत भी कवि ने लिखे हैं। बानगी इस प्रकार है -
प्रिय भारत देश महान है इस पर हमको अभिमान है,
करते सृजन और श्रृंगार इसका ये श्रमिक - किसान है।
रात गई सुबह हुई,टूटा भ्रमित सपना,
प्रखर सूरज से सीखे, जग रोशन करना।
इसी तरह कुछ और पंक्तियों जो पाठक को संवेदना उत्साह - प्रेरणा कुछ करने की दिशा में बोध कराती चलती है -
हमारे हितैषी अब बढ़ने लगे हैं,
इसलिए हाथ आलोचक मलने लगे हैं
सबसे बड़ा मानव - धर्म- कर्म कवि ने इन शब्दों में व्यक्त किया है -
सबसे बड़ी पूजा, सबसे बड़ा धरम,
गिरते किसी की आंख से आंसू उठाइए
छांदश सुन्दर छन्दों के इस विबंध और कविता संकलन में सहजता और पारदर्शिता संवेदनशीलता किसी एक  आइने की तरह प्रतिबंबित है।
जगन्नाथ विश्व ने समाज एवं राष्ट के बदलती परिस्थितियों का सही आंकलन सूरज से सीखे जग रोशन करना में किया है। राष्टवादी भावना भी कवि की देखते बनती है -
प्रिय भारत देश हमारा,इस पर हमें अभिमान है।
भारत के ऋतुओं - मौसम और त्यौहारों पर भी कवि ने सुन्दर रचनाएं लिखी है, जैसे -
मिल कर स्वागत गान करें,
आया वसन्त सम्मान करे।
आज प्रकृति ने कंचुकि फेंक दी उतार,
आया फिर फागुन  का पाहुन त्यौहार
व्यंग्य और हास्य का ठप्पा भी इस कवि पर लगा है यह भी गलत नहीं निम्रांकित पंक्ति सच को सार्थक करती है -
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट
विकास पर प्रतिबंध है एटम बम पर छूट
पर्यावरण प्रेमी कवि कहता है -
धरती दुल्हन सी लगे, पर्यावरण आधार
जन - जीवन फू ले - फले, हरियाली हो सार
पौधे रोपे रोज ही, सभी हजारों हाथ
कवि ने अपने एक आव्हान गीत में भारतवासियों से अपेक्षा करते हुए कहा है -
वक्त की आवाज अब गौर करें हम
काम करे ज्यादा और बात करें कम
शासन के चुभते नश्तरों के मध्य रहकर भी यह कवि अपने संस्कारों - कर्म - मेहनत का लोह स्तम्भ बनकर अडिग लिखता जा रहा है।
जगन्नाथ विश्व के कवित्व के बारे में जितना लिखा जाए कम होगा। एक शोध का विषय है विश्व का काव्य संसार। राजनीतिक, सामाजिक,सांस्कृतिक, वैचारिक सभी प्रकार की कवितओं का सृजक कवि जगन्नाथ विश्व है आज का सिरमौर।
काव्य संकलन सूरज से सीखे जग रोशन करना श्रेष्ठ पठनीय संजोकर रखने वाली कृति है। साहित्य जगत उसका सम्मान करेगा। विश्व सदैव उर्जावान रहे और साहित्य आकाश में जाज्वल्यवान नक्षत्र की तरह अपना प्रकाश बिखेरते रहे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ....।
  • पता - वरिष्ठ पत्रकार, 14,उर्दुपुरा, उज्जैन (म. प्र. )

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