इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 13 जुलाई 2013

व्यवस्था


-  शिव नारायण -
एक शहर के मुख्य चौराहे पर एक नौजवान भीख माँग रहा था। उसकी हथेली पर एक सिक्का रखते हुए मैंने दबे स्वर में पूछा - एक युवा प्रधानमंत्री के देश में नौजवान होकर भीख माँगते तुम्हें शर्म नहीं आती? उसने मेरी बातों का कोई उार नहीं दिया। शाम के झुटपुटे में इधर - उधर देखकर जब मैंने पुन: अपनी बात तिहराई तो उसने मुझे आपादमस्तक निहारा और एक ओर चलने का इशारा किया। फुटपाथ पर पहुँच उसने सधे ढंग से उार दिया- मेरे पिता, बाबा सभी भीख माँगते थे। जिनका अनुसरण कर मैंने अपने पूर्वजों की परपंरा की रक्षा की है। यह मेरा पेशा है, जिसे निभाना मेरा धर्म है, फिर शर्म कैसी?
- एक युवक होकर भीख को धर्म मानते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? मेरी बात से उसके चेहरे पर एक विद्रूप मुस्कराहट तैर गई। मुझे उपेक्षा की नजर से देखते हुए वह बोला- जब पेट में दाने डालने और अपनी कूवत बनाने की चिंता होगी तो सब मालूम हो जाएगा बाबू। इस बार मुझे उस पर क्रोध हो आया। मैंने तनकर कहा- कुछ भी होने पर तुम्हारी तरह कोई भीख नहीं माँगने लग जाएगा। बर्बादी के अंतिम क्षण में भी मुसीबतों से जूझते रहने में भीख माँगने से ज्यादा सुख मिलेगा, समझे!
इस बार उसके भीतर कहीं कुछ टूटा ....थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वह बुदबुदाने लगा - हाँ, तुम्हारी बात शायद ठीक हो .... मेरे पिता यही कहते थे पेशे से कुली मेरे पिता दो आखर पढ़े भी थे, किन्तु उन्हें भी अंतिम दिनों में भीख ही मांगनी पड़ी थी। अपनी भयंकर बदहाली की स्थिति में भी उन्होंने मुझे पढ़ाया और खूब पढाया। वे किसी दफ्तर में मुझे क्लर्क देखना चाहते थे और इसी सपने को लेकर मर गए। मेरी माँ और बहन भी मेरे छुटपन में ही हैजे में मरी थी। पिता ने मरने पर उनके सपने को पूरा करने के लिए छोटे - छोटे ट्यूशन कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। पढ़ाई खत्म होने पर नौकरी के लिए भटका और भटकता ही रहा। नौकरी के लायक अब उम्र भी जाती रही। हर जगह पैरवी, घूस, भ्रष्टाचार,एक कुली के बेटे को भला कौन नौकरी देता। दो दिन से मेरे पेट में दाने नहीं पड़े। भीतर से बेतरह टूटे मन ने मुझे पूर्वजों के पेशे को ही अपनाने के लिए बाध्य किया। मान अपमान की कई - कई परतों को तोड़कर आज पहली बार मैंने इस पेशे को अपनाया और तुम इस रूप में मिल गए। उसकी आवाज बहुत धीमी हो गई, जिसे अब सुनना भी मुश्किल हो रहा था। हाँ, उसकी अंतिम बात बहुत मद्धिम स्वर में सुनाई पड़ी - लेकिन अब मैं भीख नहीं माँगूँगा मेरे भाई, भीख नहीं माँगूँगा ।् मैंने करुण स्वर में उससे पूछा- तुमने कहाँ तक की शिक्षा पाई है? पहले वह हिचका लेकिन फिर संयमित आवाज में उार दिया-  मैंने फिलॉसाफी से एम किया है। लगा मेरे सामने किसी ने दर्पण रख दिया है।

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