इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 1 जुलाई 2013

क्रोध का मंत्र

-  गिरीश बख्शी -
नाम था उसका बोधीराम। माता - पिता ने बहुत सोच समझकर, उनकी बाल बुद्धि को परख कर बड़े प्यार से उनका नाम रखा था - बोधीराम। वे बड़े होते गये और उनकी बुद्धि बढ़ती गई। एक दिन बहुत बोध हो गया मतलब बहुत ज्ञान हो गया उनको। एक ऐब न होती तो सचमुच वे गाँव के ज्ञानी कहलाते पर प्याज में गंध आ ही गया। अमृत फल होता है प्याज। पर गंध के कारण बहुतों के लिए हो गया त्याज्य। और वह अमृत फल मात्र प्याज होकर रह गया। वैसे ही बोधीराम ज्ञानीराम होते पर क्रोध के कारण क्रोधीराम होकर रह गये। गाँव के लोग पढ़े - लिखे लोग कहते- बोधीराम तो हमारी जिज्ञासा के, हमारे प्रश्रों के, हमारी समस्याओं के डिक्शनरी है भाई। उनके पास जाओ तो जिज्ञासा शान्त होती है, प्रश्र हल होते हैं और समस्याओं का समाधान हो जाता है। पर वे बोधीराम, हमारी डिक्शनरी हमारे ज्ञानीराम कब किस बात पर भड़क कर अचानक क्रोधीराम हो जाय कुछ कहा नहीं जा सकता। यही कारण है कि अधिकांश लोग बोधीराम के पास जाने, उनसे बात करने, उनके पास बैठने से हिचकिचाते थे। प्याज की गंध से हर कोई दूर रहना चाहता है।
बोधीराम की समझ, उनकी प्रतिभा, दुनिया - जहान की जाने कितनी - कितनी घटनाएं की, बातों की याददाश्त, सब उनके क्रोध की आग में भस्म हो जाती। उनके साथ पढ़े परसादी भैया को आश्चर्य होता - ये बोधी को हो क्या गया ? बात - बात में क्रोध। ऐसा तो वह स्कूल लाइफ में नहीं था। क्या प्रेम व शांति  से वह हम बेंच फे्रन्डस को गणित, बीजगणित,रेखागणित, सब समझाता था। ऐसे बढ़िया ढंग से कि हमारे गणित - गुरूजी भी नहीं समझा पाते थे। हम तब उन्हें बोधी मास्टर कहा करते थे। और वे हमारे कंधे पर हाथ रखकर मुसकराते हुए कहते थे - गणित को तुम लोगों ने हौआ समझ रखा है। ये मान बैठे कि गणित, बाबा रे बाबा, हमको तो गणित से डर लगता है। अरे, परसादी गणित से डरते क्यों हो ? ऐसा घबराते क्यों हो ? गणित से प्रेम करना सीखो, उनके सूत्रों को जानों, फिर देखो। गणित खुद ब खुद तुम्हारे पास आ जायेगा। तुम लोग तो सिर्फ ....।
- वाह, क्या मार्के की बात कही ...। मोहित कह उठता - पर ये तो बताओ परसादी, फिर बोधी ऐसा क्रोधी ...।
- परसादी भैया अनुभवी हंसी हंस उठते - हमी लोगों ने उसे क्र ोधी बना दिया।
मोहित हैरान हो जाता - तुम लोगों ने ..... ?
परसादी भैया पालथी मार के बैठकर कहते - वो ऐसा मोहित कि हम लोग उसकी खूब तारीफ करते उसे कहते - विद्वान, प्रतिभाशाली, बुद्धिमान और जाने क्या - क्या। नहीं, नहीं चिढ़ते नहीं थे। मन से कहते थे। हम सचमुच उन्हें अपने से कहीं अधिक बड़ा मानते थे और हमारे इसी बड़ा मानने के भाव ने बोधी में ऐसा बड़प्पन जगा दिया कि उसमें धीरे - धीरे  अहमï्ï जागृत होने लगा। वह नहीं, कहना चाहिए उनका अहम हम लोगों को तुच्छ समझने लगा और हम कुछ भी कहते तो वह भड़क जाता - क्या इत्ती सी भी बात की समझ नहीं है तुममे? जिस बात को नहीं जानते तो चुप रह करो।
- पर ऐसा एकाएक भड़कना क्यों ? मोहित पूछ  उठता।
परसादी भैया हंसकर कहते - जैसे सोमवार के बाद मंगलवार आता है न, वैसेइ अहम के बाद क्रोध आता है। यह स्वाभाविक है।
मोहित ने जिज्ञासा की - स्वभाव तो मानव का जनम जात होता है न ?
परसादी भैया बोले - हां, तुम्हारा कहना ठीक है, पर कुछ का स्वभाव बाद में पद, प्रतिष्ठïा और लोगों की सम्मानीय दृष्टिï से बदल जाता है। बोधीराम वही बदले हुए  स्वभाव वाला आदमी है। यदि वह हम लोगों का वह आदर्श पुरूष का भाव उसके लिए न होता और वे गाँव के सम्माननीय बड़े गुरूजी की पदवी न पाते तो वे न  अहंकारी हो पाते और न क्रोध आता।
फिर मोहित भी परसादी भैया की तरह बोधीराम से बच - बच कर चलने लगा। न जाने कब उनके सामने पड़ जाने पर ... तो उन्हीं बोधीराम को एक दिन बोध हुआ - गाँव के लोग मुझे मान - सम्मान तो देते हैं, पर मुझसे मिलना - जुलना पसंद नहीं करते। कोई मिलता भी है तो जैरामजी तक। परसादी और मोहित भी बहुत दिन हुए इधर नहीं आए। आखिर बात क्या है? मेरे हाव - भाव में, मेरे स्वभाव में कहीं खोट आ गई है ? चलो, मेरे साथ सदा रहने वाली, मेरे दुख - सुख में साथ देने वाली मेरी पत्नी से आज पूछा जाय। पति की ठीक, सही सही कमजोरी को बता सकने वाली थर्मामीटर होती है - पत्नी।
पत्नी ने मसखरी से मुसकरा कर कहा - देखो, तुमने मुझे थर्मामीटर कहा है और थर्मामीटर कभी गलत नहीं होता। तो ठीक - ठीक बताऊं, नाराज तो नहीं होओगे?
बोधीराम चिढ़ उठे - अरे, बताओ न बाबा। इतनी भूमिका बांधने की क्या जरूरत, जल्दी बताओ।
चिर संगिनी से सपाट स्वर में कहा - तुम बड़े क्रोधी हो ? फिर तो ... फिर तो फट पड़े बोधीराम - मैं ... मैं क्रोधी ? मैं इतना पढ़ - लिखा, दर्शनशास्त्र में एम. ए. पास, मैं क्रोधी। स्कूल कालेज में अपने क्लास के साथियों को गणित सिखाने वाला, लांगफेलो के पोयम को समझाने वाला, मैं क्रोधी ? क्या मूर्खों जैसी बकवास करती हो ? तुममे समझ कितनी है, चार क्लास भी तो पढ़ी नहीं। अपढ़ - गंवार कहीं की। मुझे, मुझ बोधीराम को क्रोधी कहने आयी है। चल भग यहां से ....।
पत्नी तो जानती थी, वह उनके नस नस को पहचानती थी। वह क्या बोले ? चुपचाप भात चढ़ाने चली गई।
पत्नी के कुछ न कहने पर, चुप चले जाने पर बोधीराम को पहली बार एक रहस्य का पता चला कि पत्नी शांति बाई सचमुच कितनी शांत और सुशील है, और मैं बोधी एम ....। फिर हठास उन्हें आत्मबोध हुआ - सचमुच हां, सचमुच मैं क्रोधी हूं। पत्नी को मैंने थर्मामीटर कहा और मुझे थर्मामीटर के क्रोध बताने पर मैं भड़क गया। कैसे चिल्ला उठा, कैसे उसी पर ... यह क्रोध नहीं है तो और क्या ?
वे तुरंत बरसाती जूता पहन, छाता हाथ में रख कर घर से तेजी से निकल पड़े। परसादी ने एक दिन बताया था कि पास के गाँव गोपालपुर में एक संत जी आये हैं। संत सचमुच में संत है, कोई ठग , चोर लफंगा नहीं। बड़ी अच्छी - अच्छी शिक्षाप्रद कथा सुनाते हैं। लोगों की कष्टï तकलीफ की दवा बताते हैं, आयुर्वेद के मंत्र बताते हैं। सावन भर रहेंगे वे। किसी दिन चलेंगे।
भावावेश में बोधीराम कब तीन किलोमीटर दूर गोपालपुर आ गये, उन्हें पता नहीं चला। बोधीराम का सौभाग्य कि उमेदीराम के घर ठहरे हुए संतजी छपरी में बैठे हुए, एकान्त - शान्त वातावरण में पुस्तक पढ़ रहे थे। बोधीराम को ध्यान से देख संतजी ने कहा - आप शिक्षक हैं शायद, आइए, बैठिए यहां मेरे करीब। हां, बताइये, कैसे आना हुआ।
बोधीराम को संतजी अच्छे लगे। हाथ जोड़कर उन्होंने अपने क्रोधी स्वभाव के बारे में विस्तार से उदाहरण सहित बता दिये।
संत जी मुस्काए। बोले - जानते हैं, सिद्धार्थ, भगवान बुद्ध कैसे हुए ? फिर रूककर बोले - विपस्सना ध्यान से, विपस्सना मतलब देखना तो आपको एक मंत्र देता हूं। उन्होंने छोटे से मोटे कागज में मंत्र लिखकर उसे चार बार मोड़ कर दिया।
बोधीराम ने पूछा - इसे चाँदी की ताबीज में भरकर गले में पहनना है ?
संत जी निश्छल हंसी हंस पड़े। बोधीराम ने कुरते के सामने जेब में रखते हुए बोले - इसे गले में पहनना नहीं, इसे जेब में अपने ह्रïदय के पास रखना और ... अहाँ .. यहां नहीं, इस मंत्र का पाठ घर में करना। तभी उमेदीराम संतजी को भोजन के लिए बुलाने आ गया। बोधीराम बड़ी श्रद्धा से संतजी के चरण छूकर घर लौट आये।
शान्तिबाई ने उन्हें देखते ही कहा - बड़ी देर हो गई आज तो, कहाँ चले गये थे ? खाना ठंडा हो गया। बोधीराम एकदम उत्तेजित हो गये। गरज उठे - मैं कहीं भी जाऊं, तुम्हें करना .. ? तभी जैसी बिजली कौंधी। उन्होंने जेब में हाथ डाल। कागज खोलकर मंत्र पढ़ा। लिखा हुआ था - देखो, देखो .. मुझे क्रोध आ रहा है। वे तुरंत सचेत हो गये। बड़े प्रेम से अपने चिरसंगिनी से बोले - नानुक की अम्मा, ये गोपालपुर में संत आये हैं। मैं उन्हीं के दर्शन करने चला गया था। बहुत - बहुत अच्छे महान संत हैं वे। अगले रविवार को मैं तुम्हें ले चलूंगा। आज तुम्हें भी देर हो गई। काफी देर हो गई। खाना परसो। आज हम दोनों साथ - साथ एक ही थाली में खाएंगे।
शांतिबाई चकित भाव से अपने पति को देखते रह गई।
  • पता - ब्राम्हा्रण पारा, दिग्विजय कालेज रोड, राजनांदगांव ( छ.ग.)  

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