इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 1 जुलाई 2013

अंगरा के अंजोर

- डॉ. जीवन यदु  -
पात्र
रचनाकार जीवन यदु

1. बुधनी - सुकवारो की माँ
2. सुकवारो - पढ़ने वाली लड़की
3. रमा और श्यामा - पढ़ने वाली लड़कियाँ
4. पारो - रमा और श्यामा की माँ
5. दादा - पारो का श्वसुर और रमा - श्याम का दादा
नाटक शुरू
बुधनी - बेटी सुकवारो ? कहाँ हस ओ ?
सुकवारो - माई - कुरिया हवँ दाई। इसकुल जाय के तियारी करत हवँ। आज 26 जनवरी आय। आज इसकुल जल्दी जाना हे मोला। झंडा फहराहीं आज इसकुल मं।
बुधनी - अतेक बिहनिया ले जाबे इसकुल ? आज झन जा बेटी। तयँ हा इसकुल जाबे,  त घर ल कोन राखही ? कोन खेलाही बाबू ल ?
सुकवारो  - मोर संग पढ़ैया जमो नोनी बाबू मन इसकुल जाहीं, त मयँ कइसे नइ जाहूं दाई ? का कहहीं बहन जी मन ?
बुधनी  - [गुस्सा में ]अरे, छोड़ तोर इसकुल अउ बहनजी ल। नइ भेजवँ तोला इसकुल। पढ़के सहिबिन बने बर हे ? जिहाँ जाबे, उहाँ चुल्हा तो फुकबे। तेकर ले तयं हा बाबू ल खेला, अउ घर राख। आज ले तोर इसकुल जवइ बंद। समझे।
[सुकवारो रोने लगती है]
बुधनी - बंद कर तोर रोवा - राही। मयँ परोस ले आगी लावत हवँ। जल्दी राँध - पसा के काम - बुता मं निकलहूं।
[प्रस्थान। बुधनी एक चक्कर मंच का लगाती है और एक कोने में जाकर आवाज लगाती है।]
बुधनी - अइ, पारो ? हवस नहीं बहिनी ?
पारो - आ बहिनी बुधनी, आ बइठ।
बुधनी - अभी बइठे के बेरा नइ हे बहिनी। छेना मं आगी दे - दे बहिनी। चुल्हा सिपचाहूं।
पारो - हव, देवत हव बहिनी। ये देख न, आज निचट बिहिनिया ले रमा अउ श्यामा के तियारी करत हवँ
रमा - होगे काकी सुकवारो ह तियार। ओला तो भासन घलो देना हे।
श्यामा - गजब सुघ्घर भासन देथे सुकवारो ह। कोनो जघा नइ अटके , काकी।
रमा - सुरु होथे तो बस, पड़ - पड़ बोलतेच जाथे।
श्यामा - आसो घलो फस्ट आही, काकी तोर सुकवारो ह।
बुधनी - का करही फस्ट आके ? बेटी के जात के का पढ़इ अउ का लिखइ ? मयँ तो ओकर इसकुल जवइ ल आजे ले बंद करत हव।
पारो - अइ, काबर ?
रमा - अइसन झन कर काकी। तोर सुकवारो ह तो हमर किलास मं सब ले होशियार हे।
श्यामा - वो तो खेल - कूद मं घलो फस्ट आथे, काकी।
बुधनी - तुमन पढ़ो बेटी हो। सुकवारो ह पढ़े ल जाही त घर ल कोन राखही ? नान्हे बाबू ल कोन खेलाही ?
पारो -देख बहनी, बेटी ल पढ़ाना बड़ पुन्न अउ धरम के काम आय।
बुधनी - का के पुन्न बहिनी, बेटा ह कमा के घर ल पोसथे। सुकवारो ह पढ़ लिख लिही तभो पर के घर मं चुल्हा फुंकही। बाबू ल पढ़ाबो, तेहा काम आही।
[ रमा के दादा का प्रवेश]
बुधनी - पाँव परत हवँ कका।
दादा - आसिरबाद बेटी, जियत रहय अउ नोनी बाबू ल जम के पढ़ा - लिखा।
बुधनी - बाबू ल तो पढ़ाहू कका, फेर नोनी के पढ़इ ल आज ले बंद करत हव।
दादा - मयँ खटिया मं सोय - सोय तोर गोठ ल सुनत रहेवँ बेटी। का तयँ ह थोरको पुन्न नइ कमाना चाहत हस ? बेटी ल पढ़ाय मं पुन्न मिलथे।
पारो - इहिच बात ल तो महूं समझावत रेहेवँ बुधनी बहिनी ल।
दादा - देख बेटी, पुन्न मिलथे धरम के काम मं। धरम का ये ? ये ला जान ले। जेन काम करे मं कोनो सुवारथ नइये, उही धरम के काम आय। जइसे बेटी ल पढ़ाना। बेटा ल पढ़ाय मं तोर सुवारथ हे। हे के नइ ?
बुधनी - हव, सुवारथ तो हे कका। बेटा ह हमला कमा के खवाही। इही सुवारथ हे हमर।
पारो - अउ बेटी ल पढ़ाय मं कोनो सुवारथ नइ हे। वो हा पर घर के धन आय। पर के धन ल बढ़ाय मं हमर कोनो सुवारथ नइ हे। अब बता, ये पुन्न अउ धरम के काम आय के नोहे ?
बुधनी - हव, पुन्न के काम आय।
दादा - सुन बेटी बुधनी, हमर नोनी मन दू ठन बंस ल तारथे। मइके अउ ससुरार - दुनों के नाव उजागर करथें।
बुधनी - बने बात कहत हस कका। मय तो मूरख आवँ। मयँ नइ समझे रहेंव ये बात ल। आज मोर आँखी ह खुलगे। मयँ इहाँ आय रेहेंव अँगरा - आगी माँगे बर, पर धर के जावत हवँ गियान के आगी ल।
दादा - ये गियान के आगी ल सिपचा बेटी। आगी ह आँच भर नइ देवय, अँजोर घलो देथे। गियान के आगी के अँजोर ह अउ जादा होथय बेटी।
बुधनी - बने बात बतायेव कका। मयँ जानत हवँ। पहली अपन बेटंी ल इसकुल जाय बर तियार करहूं। ओकर पाछू चुल्हा सिपचाहूं
दादा - जा बेटी जा, सुकवारो ल तियार कर। इसकुल भेज वोला।
। सुकवारो जतका पढ़ही ततका पढ़ाहुँ। ये मोर प्रन हे।
  • पता - ' गीतिका' दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला -  राजनांदगांव ( छ.ग.)

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