इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

बसंत के बाजार में

- बसंत गीत

 हरीराम पात्र -
धरा में सुन्दर लगा बाजार है, आते बसंत बहार।
सज गई खूब है यहाँ दुकानें, वन, उपवन, कछार।।
आ गए पक्षी बड़े व्यापारी, उड़ते कई कतार।
गली - गली में फेरा लगाकर, करने लगे व्यापार।।
कई प्रकार के आए व्यापारी, बड़े बड़े ख्वाबदार।
सब अपनी अनुभूतियों की पूँजी, संजो होते मालदार।।
मन में भरते भाव अनेकों, हो रही भीड़ अपार।
खो रहे लोग है भीड़ में आकर, घर की सुध बिसार।।
आम्र - कुँजों के चौक - चौक में, कोयल खड़ा इस बार।
दे रहा हाँका लूट की लूट का, बना बड़ा कोटवार।।
बादल, बिजली, ठण्ड ,बरखा भयभीत हुए दुकानदार।
भाग चले सब छोड़ दुकानें, कोई रहा न पहरेदार।।
देखते ही देखते लगे लूटने, भौंरे है लटनहार।
लूट रहे पुष्प - तिजोरियों में रखे, रस के धन भण्डार।।
आए लुटेेरे हैं मादकता की, बंदूक लिए बयार।
लूट रहे शीतल, मंद और गँधों की, सबको गोलियाँ मार।।
कृष्ण की भाँति कृषक भी लूट चले, दही है फसलें काढ़।
सूखे पड़े सब मटके रह गए, खाली पड़े खेत - खार।।
देखो तो लूट रहा बड़ा लुटेरा, समय है ताकतवार।
जीवन के सारे जलाशयों से, खींच रहा आयु की धार।।
सभी तरफ लुट मची खूब है, लुटो सभी इस बार।
और लुटे कोई तुमको पहले, लुट लो सबसे प्यार।।
पता - ग्राम - राऊरवाही, पो. - करमोती,
व्हाया - सम्बलपुर, तह.- दुर्गकोंदल, जिला - उ.ब.कांकेर (छग.)

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