इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 13 जुलाई 2013

मेरा मन बैरागी



-  इब्राहीम कुरैशी  -
इस रुप श्रृंगार के चौराहे पर
क्यों हुआ मेरा मन बैरागी।
जग का हर आकर्षण कहता
देख तो ले जरा ओ वितरागी।।

सागर, झरना, झील, सरिता
पर्वत,घाटी दृश्य मनोरम
उषा की लाली मतवाली
हृदय नाचता छम छम छम
सब हैं सुंदर पर जाने क्यूं
बन न पाया मैं अनुरागी।
क्यों हुआ मेरा मन बैरागी।।

विश्वास मेरा दर्पण जैसा था
टूट के चकनाचूर हो गया
जीवन का हर सपना साथी
नैनों से अब दूर हो गया
कोई न जाने किस कारणवश
हो न सका मेरा सहभागी।
क्यों हुआ मेरा मन बैरागी।।

सूख गई इच्छा की सरिता
तूफानी अरमान थम गए
छोड़ के सारे नाते रिस्ते
हम बियाबानों में रम गए
कोई कहे अभागा मुझको
कोई कहे मुझको बड़भागी।
क्यों हुआ मेरा मन बैरागी।।

पता - स्टेशन रोड, महासमुन्द छत्तीसगढ़ - 493445

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