इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

नशा



-  खलीलजिब्रान -
उस धनी आदमी को अपने पास जमा शराब के भण्डार पर बहुत नाज़ था। उसके पास बहुत पुरानी शराब से भरा एक जग था, जिसे उसने किसी खास मौके के लिए सम्भाल कर रखा हुआ था।
राज्य का गर्वनर उसके यहाँ आया तो उसने सोचा,एक मामूली गवर्नर के लिए इस जग को नहीं खोलना चाहिए।
बिशप का आना हुआ तो उसने मन ही मन कहा - नहीं, मैं जग नहीं खोलूँगा। भला वह इसकी कीमत क्या जाने। उसकी नाक तो इसकी सुगन्ध को भी नहीं महसूस कर पाएगी। राजा ने आकर उसके यहाँ भोजन किया तो उसने सोचा यह कीमती शराब एक राजा के लिए नहीं है।
यहाँ तक कि अपने भतीजे की शादी पर भी उसने खुद को समझाया - इन मेहमानों के लिए जग खोलना बेकार है।
वर्ष बीतते गए और एक दिन वह मर गया। उस बूढ़े आदमी को भी दूसरे लोगों की तरह दफना दिया गया।
जिस दिन उसे दफनाया गया। पुरानी शराब से भरा जग भी दूसरी शराब के साथ बाहर लाया गया। अड़ोस - पड़ोस के किसानों ने उस शराब का आनन्द लिया पर किसी को भी शराब की उम्र की जानकारी नहीं थी। उनके लिए तो प्यालों में ढाली जा रही शराब महज शराब थी।

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