इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 13 जुलाई 2013

अतिथि संपादक दादूलाल जोशी की कलम से


साहित्यिक पतझड़ का मतलब .... ?

विगत दिनों दुर्ग स्थित स्वामी विवेकानन्द सभागार में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन सम्पन्न हुआ। मूलत: गीत विधा पर केन्द्रीत उक्त कार्यक्रम को गीत वितान नाम दिया गया था। वहाँ उपस्थित साहित्यकारों को एक रंगीन पत्रिका वितरित की गई। उसमें प्रकाशित एक आलेख ने हमारा ध्यान आकर्षित किया। लेख का शीर्षक था - च्च् राजनंादगांव जिले में साहित्यिक पतझड़ ज्ज् जिसके लेखक भिलाई नगर के श्री अशोक सिंघई है।
लेखक ने राजनांदगांव के पत्रकार सम्पादक लेखक और चिन्तक शरद कोठारी के दुखद निधन पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उक्त आलेख को लिखा है। लेख को पढ़ने पर यही आशय निकलता है कि श्री कोठारी जी के देहावसान के बाद राजनांदगांव जिले में साहित्यिक पतझड़ आ गया है। हम हतप्रभ हो गये। गहन चिन्तन - मनन में डूब गये। साहित्य में भी पतझड़ आता है, यह हमारे लिए बिल्कुल नई बात थी। हम सोच में पड़ गये कि क्या स्व. कोठारी जी राजनांदगांव जिले के साहित्यरुपी पेड़ के पत्ते मात्र ही थे? जो सूख कर पतझड़ हो गये और पतझड़ आ गया ? या फिर लेखक का मतलब राजनांदगांव जिले के साहित्यिक वृक्ष की हरियाली खत्म हो गई? या जिले का साहित्यिक जगत पूरी तरह वीरान हो गया ? उक्त लेख के बारे में राजनांदगांव के साहित्यकारों को जानकारी मिली तो वे काफी नाराज हुए। उनका कहना था कि - '' इस तरह के उट पठांग लेख लिखकर लेखक क्या साबित करना चाहते हैं ?''
निश्चित रुप से स्व. शरद कोठारी जी का हमारे बीच से असमय चला जाना अपूरणीय क्षति है। साहित्यिक बिरादरी ही नहीं बल्कि आम जन भी सदैव उनकी कमी को महसूस करते रहेंगे। वे एक युग पुरुष थे। उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में नये प्रतिमानों को स्थापित किया है। वे तीन पीढ़ियों के साक्षी और सहभागी रहे हैं। डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र और डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के युग के तथा अपने समकालीन गजानन माधव मुक्तिबोध, डॉ. नन्दूलाल चोटिया, रमेश याज्ञिक, और मेघनाथ कन्नौजे के युग के साथ - साथ वर्तमान पीढ़ी के रचनाकारों के मध्य वे निरन्तर साक्षी और सहभागी  के रुप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। उनकी कृतियाँ - च्च् और दिग्वि मर गय ज्ज् च्च् दो जम्हूरे की दास्तान ज्ज् सबेरा संकेत में  प्रकाशित उनके नगरवासी की सामयिक टिप्पणियाँ, राजनांदगांव की साहित्यिक बिरादरी के लिए प्रकाश पुंज की तरह सदैव आलोकित रहेंगे। स्व. कोठारी जी साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे शाश्वत  विरवे रोप गये हैं,जो सदा हरे - भरे रहेंगे और उनसे हमेशा प्रेरणा और ऊर्जा रुपी ऑक्सीजन उत्सर्जित होते रहेंगे। जिन्दगी और उसकी सहज गति तथा सृजनशीलता के प्रति उनके हृदय में गहरी आस्था थी। आज उनकी भौतिक काया भले ही हमारे बीच नहीं है किन्तु उनके चिन्तन और कृतित्व राजनांदगांव जिले में नित - नूतन साहित्यिक सृजन और आयोजन की प्रेरणा देते रहेंगे। साहित्यिक पतझड़ आ जाये या गति रुक जाये ऐसी परिकल्पना उनके मन में लेशमात्र भी नहीं थी।
कोठारी जी के निधन से राजनांदगांव की साहित्यिक बिरादरी दुखी और गमगीन जरुर हुई है - निराश और हताश नहीं। राजनांदगांव में साहित्यिक कर्म पूर्व की भांति बदस्तूर जारी है। आयोजन हो रहे हैं और होते रहेंगे। पतझड़ आने जैसी कोई बात नहीं है। '' विचार वीथी ''  एवं '' मुक्तिबोध और आलोचना '' जैसी साहित्यिक पत्रिकाएं निरन्तर छप रही हैं।
अब विचारणीय मुद्दा यह है कि इस तरह के बेतुके विचार लोगों के मन में क्यों आने लगे हैं ? दरअसल पिछले दो दसकों से भारतीय समाज में विवादास्पद बोलने और लिखने की प्रवृत्ति तेजी से उभर कर सामने आई है। इसी समानान्तर किसी व्यक्तव्य या लेख पर विवाद पैदा करने का चलन भी बढ़ा है। राजनीति में ऐसा क्यों हो रहा है ? इसे जानना - समझना अब आम जनता के लिए मुश्किल नहीं है। प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में मुख्य रुप से दो पक्ष होते हैं। पहला - सत्तापक्ष तथा दूसरा विपक्ष। जाहिर है, दोनो के सुर कभी भी एक नहीं होते। एक - दूसरे की आलोचना - प्रत्यालोचना करना राजनीति के अनिवार्य गुण - धर्म बन गये हैं। इस गुण - धर्म को निभाने की आपाधापी में राजनीतिक व्यक्ति उटपटांग व्यक्तव्य देकर विरोध और विवाद के विषय बन जाते हैं। कभी - कभी उनके सामान्य व्यक्तव्य को जानबूझकर विवाद का मुद्दा बना दिया जाता है। मीडिया में कुछ समय तक वाद - विवाद चलता है और बाद में सब कुछ शांत हो जाता है। भरपूर प्रचार दोनों पक्ष को मिल जाता है। बदनाम होगें तो क्या नाम न होगा ? की कहावत चरितार्थ हो जाती है।
राजनीति के क्षेत्र में ऐसा होना तो स्वाभाविक है किन्तु जब साहित्य और पत्रकारिता में इस तरह का कार्य व्यापार होने लगता है तब बौद्धिक वर्ग के लिए यह चिन्तनीय विषय बन जाता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में बोलने और लिखने का स्तर भी काफी परिवर्तित नजर आता है। कुछ पत्रकारों के व्यक्तव्य और लेख को सुन पढ़कर आम आदमी को पता ही नहीं चलता कि ये जो बोल - लिख रहा है, वह सचमुच पत्रकार है ? या फिर किसी राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता है?
साहित्य का क्षेत्र राजनीति और पत्रकारिता से सर्वथा भिन्न होता है। साहित्यकार का दायित्व राजनेता और पत्रकार से निश्चित रुप से बड़ा होता है। राजनीतिबाज और पत्रकार यह कहकर बचने का प्रयास कर सकता है कि उनके कथन या लेखन का ऐसा आशय नहीं था जैसा कि विरोध करने वाले निकाल रहे हैं। किन्तु साहित्य में ऐसा गुंजाइश नहीं होता है। साहित्यकार सृजेता होता है। भूत - भविष्य और वर्तमान का द्रष्टा होता है। समाज और परिस्थितियों को वह यथार्थवादी दृष्टि से देखने का अभ्यासी होता है। शब्द और भाषा के प्रति वह अनुसंधानकर्ता होता है। शब्द और भाषा का प्रयोग सोच समझकर विषय और प्रसंगानुसार सटीक और सार्थक रुप में करता है। इसीलिए हर युग में आम जन साहित्य को श्रेष्ठतम कार्य के रुप में मान्यता देते आये हैं। साहित्य , साहित्य होता है। इसमें न तो साहबगिरी चल सकती है और न ही जमींदारी। लापरवाही और दिशाहीनता की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है।
बहरहाल, राजनांदगांव को संस्कारधानी माना जाता है। पूरी दूनियाँ में यहाँ की साहित्यिक पहचान है। राजनांदगांव जिले में न तो कभी साहित्यिक पतझड़ आ सकता है और न ही यहाँ की साहित्यिक प्रतिभाएं मुरझा सकती है। अत: राजनांदगांव के बारे में किसी तरह की टिप्पणी करने के पूर्व यहां के गौरवशाली इतिहास का अध्ययन करना बेहद लाजिमी है।
अतिथि संपादक
    दादूलाल जोशी ' फरहद '
नवम्‍बर 2012   

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