इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 1 जुलाई 2013

छछुन्दर क्या जाने अदरख का स्वाद

 -  डॉ. तारिक असलम ' तस्नीम '

मौसम के मिजाज और सरकार के मिजाज का भला क्या कहना जो आप समझ जाएं कि अगले पल क्या होने वाला है। यानि कि उन दोनो के मिजाज में क्या तब्दीली आने वाली है। कहां बादल घिर आएंगे और कहां बारिस होगी या फिर हल्की बूंदा - बांदी होगी या तेज हवाएं चलेंगी। जिससे आपको कुछ राहत मिलेगी या अनावश्यक परेशानी झेलनी होगी। यह कहना किसी के बस की बात नहीं होती। सब कुछ पूर्वानुमान के भरोसे चलता रहता है। जो अधिकतर गलत ही साबित होता आया है।
कुछ ऐसे ही हालात से हमारे आफिस के नाजिर बाबू समय - असमय दो - चार होते रहते हैं। खास कर जब कोई बड़ा अफसर आफिस के निरीक्षण के लिए पधारने वाला होता है। नाजिर बाबू को कटकटी जाड़े में भी पसीने छूटने लगते हैं। चैम्बर में बुलाकर उन्हें पहले ही निचले दर्जे के अफसर कड़क लहजे में सख्त हिदायत दे देते हैं कि - देखो, साहब की प्रत्येक इच्छा तुरत पूरी होनी चाहिए। उन्हें कसी बात की कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। वह जो मांगे तुरत हाजिर कर देना वर्ना तुम्हार क्या बिगड़ेगा। लेकिन मेरे प्रमोशन की फाइल जरुर अटक जाएगी और मैं इसी टेबिल पर हाथ - पांव मारता रह जाऊंगा रिटायरमेंट तक। समझ में आयी मेरी बात ? इसलिए किसी कीमत पर कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। साहब की खातिरदारी में। भय का ऐसा जलवा होता है जनाब कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को निगल जाने को तत्पर अफसर भी कभी भीगी बिल्ली बनने को विवश और लाचार दिखता है। ऐसे ही बेचारे अभी साहब दिख रहे थे।
अब बेचारे नाजिर बाबू भी करें तो करें क्या। उनके एक तरफ खायी तो दूसरे तरफ खंदक। तिस पर अपने साहब का हुक्म सिर आंखों पर।
आखिर हमारे ठेठ नेताओं के तर्ज पर राजधानी की सैर - सपाटे करते हुए साहब जिला मुख्यालय के सर्किट हाऊस में पहुंचे तो साथ में मेम साहिबा भी थी। यह देख नाजिर बाबू ने चपरासी की मौजूदगी के बावजूद स्वयं आगे बढ़कर वातानुकूलित कमरे का दरवाजा खोला। साहब अन्दर दाखिल हुए, सोफे पर पैर पसार कर लेट गए। मेम साहब ने ईजी चेयर पर पसरते हुए खाली पड़े टी टेबिल की ओर देखा। जंगली बिल्ले के समान नाजिर बाबू को समझते देर नहीं लगी कि मेम साहब क्या कहना चाहती है किन्तु उनके मुख मंडल की आभा किसी खलनायिका सी रौद्र रुप धारण करें इससे पहले पास ही दुम दबाए कुत्ते की तरह खड़े चपरासी राम खेलावन की ओर आंखें तरेरते हुए देखा। वह भी तीस मार खां के अंदाज में तेजी से बाहर निकला और पल भर में पुन: कमरे में दाखिल हुआ तो उसके हाथों में टी ट्रे थी। जिसमें काजू, बादाम किशमिश, अंगूर, सेब बढ़िया किस्म के केक और बिस्कुट सजे थे। फिर वह दौड़कर गर्म काफी और चाय भी लेकर हाजिर हो गया। इतना कुछ पलक झपकते हुआ तो साहब बोले - बैरी गुड, इंतेजाम बढ़िया किया है तुमने। फिर मेम साहब की ओर मुड़ कर बोले - मैंने कहा था न, यहां का अफसर इंटीलेक्चुअल पर्सन है। नाजिर भी काफी समझदार है। वेरी इंटेलीजेंट ... लेकिन मैं कैशबुक वगैरह माइनुटली यानि एक एक वाउचर चेक करुंगा। तुम यह मत समझना कि मुझे अच्छी तरह खिला - पीला दिया तो सारे गुनाह माफ हो जाएंगे। मैं आनेस्ट कर्मचारियों की कद्र करता हूं। इसलिए अपने पेपर भी निरीक्षण के लिए तैयार रखना ... ठीक से समझ गए न ?
- यस सर ... । इतना भर ही नाजिर बोला।
जब नाजिर बाबू कमरे से निकलने ही वाले थे। साहब ने यह कहते हुए चौंक दिए - तुम खाने में क्या कुछ बनवा रहे हो। क्या मेनू बनाया है हमारे लिए ?
- सर, दोपहर के खाने में देहरादूनी चांवल, रोटियां, दाल मखानी, पनीर मटन दो प्याजा, चिकेन ओर मटन कबाब है। यह सुनकर मेम साहब बोली - मैं तो ब्वायलर चिकेन नहीं लेती। यह तो आप भी जानते हैं न।
- अरे हां, नाजिर बाबू देसी मुरगा भी बनवाना तुम। इसकी लज्जत ही कुछ अलग होती है। और उसकी टांग के स्वाद का तो कोई जवाब ही नहीं, बस नाजिर बाबू जरुर इंतेजाम कर लीजिएगा। हमारे टेबिल पर ब्वायलर चिकेन नहीं परोसा जाना चाहिए। समझ गए न ?
नाजिर बाबू कमरे से बाहर निकले तो उसके चेहरे की रौनक देखने लायक थी। ए . सी. कमरे के बावजूद उनके चेहरे और बदन से पसीना निकल रहा था। बड़े साहब के हुक्म की तामील करनी थी और मजेदार बात यह थी कि आसपास की किसी आदिवासीबस्ती में देशी मुर्गा उपलब्ध नहीं था। अब तक यहां जितने भी अफसर आए थे उन्होंने भी यही फरमाईश की थी, नतीजतन मुर्गा कौन कहे एक आध मुर्गी मिलनी भी मुश्किल थी। किन्तु राम खेलावन भी कुछ कम खिलाड़ी नहीं था। उसने नाजिर बाबू की हालत देखते हुए और अफसरों का जूठन खाने के एवज में उसने नाजिर बाबू को सुझाव दिया - इसमें चिंता की का बात है , नाजिर बाबू ? हम बताए देते हैं न एक नुस्खा ... अरे ई अफसरवन और छुछुन्दर में कोई अंतर थोड़े ही होता है। साहब का यहां आना कार्यालय का निरीक्षण करना थोड़े ही है। यह तो खाने - पीने और आराम करने की गर्ज से यहां ठहर गया है। आप बिलकुल चिंता मत करें। हम ब्वायलर मुर्गी लाए देते हैं। जिसे पकाने से पहले नीबू के रस भी खूब लपेट देना है। जिससे मांस का स्वाद ही बदल जाता है। समझ गए न ? फिर परोस देना है साहब के आगे। देखिए तो सही देसी मुर्गा से तनिक भी कम स्वाद दे तो हमरा नाम बदल दीजिएगा। राम खेेलावन ने गर्मजोशी से दावा ठोंका। नाजिर बाबू डरते - डरते ही सही उसकी बात मानने को सहमत हो गए।
दोपहर में साहब और मेम साहिबा खाने की टेबिल पर बैठे तो साहब और मेम साहिबा मुर्गे की तारीफ करने से नहीं चूके। तब नाजिर बाबू ने चैन की सांस ली और राम खेलावन के मुंह से निकला - ससुरा देशी मुर्गा खाएगा, यह तो बात वहीं हुई न छछुन्दर क्या जाने अदरख का स्वाद।

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