इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

मारा गया साहित्यकार का हक ?


छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रत्येक वर्ष राज्योत्सव के अवसर पर विभिन्न क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्ति / संस्था को राज्य शासन द्वारा सम्मानीत किया जाता है। इस सम्मान में पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान भी शामिल है। जिसे साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले को दिया जाना सुनिश्चित किया गया है।
दुर्भाग्य ही कहा जाए कि प्रत्येक वर्ष कोई न कोई सम्मान विवादित हो ही जाता है। इस वर्ष पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान विवादित हो गया।  प्रदेश के साहित्यकारों का मानना है कि डॉ. मन्नूलाल यदु भाषाविद् है न कि साहित्यकार। यदि डॉ. मन्नूलाल यदु साहित्यकार नहीं है तो उनका चयन किस मापदण्ड के तहत पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान के लिए किया गया।
विचारणीय तथ्य यह है कि क्या राज्य शासन द्वारा प्रदत्त सम्मान के लायक वह व्यक्ति या संस्था राज्य शासन को नहीं मिल पाता जिसके लिए सम्मान का निर्धारण किया गया है या फिर जान बूझ कर इस प्रकार के कृत्य किये जाते हैं। क्या चयन समिति बिना किसी जाँच पड़ताल के किसी भी व्यक्ति या संस्था को सम्मान के लिए चुन लेती है जिसका कि उस क्षेत्र में दूर - दूर तक कहीं कोई सरोकार नहीं है। यदि ऐसा नहीं तो फिर दाऊ मंदराजी सम्मान के बाद साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले को दिया जाने वाला पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान क्यों विवादित हो गया?
पूर्व में भी राज्योत्सव के अवसर पर दिये जाने वाले सम्मान विवाद के घेरे में रहा इसके बावजूद क्यों चयन समिति की आँखें नहीं खुलती। इससे तो साफ झलकता है कि इस प्रकार के कृत्य जानबूझ कर सुनियोजित तरीके से किये जाते हैं और सम्मान उन्हें दे दिया जाता है जिसका उस क्षेत्र से तो दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता अलबत्ता वह शासन और सत्तापक्ष की गलियारों में जी हुजूरी करता फिरता है।
साहित्यकारों ने यह स्वीकार किया है कि डॉ. मन्नूलाल यदु एक अच्छे भाषाविद् है,साहित्यकार नहीं। फिर साहित्यकार के हक को मारकर भाषाविद् को क्यों पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान से नवाजा गया। क्या भविष्य में इस प्रकार के पक्षपात रवैये से शासन व सत्तापक्ष बाज आयेगा? बेहतर तो यही होगा कि व्यक्ति/ संस्था का चयन एक वर्ष पूर्व हो तथा उसका सूची सार्वजनिक की जाय ताकि उसके संबंध में दावा आपत्ति प्राप्त हो सके। निर्विवाद की स्थिति में ही अंतिम चयन मान्य होना चाहिये। इससे सम्मान का न अनादर होगा और न ही किसी ऐसे व्यक्ति / संस्था को सम्मान मिल पायेगा जिसका उस क्षेत्र से दूर - दूर तक कोई वास्ता न हो।
सम्‍पादक 
नवंबर 2011

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