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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

हाथों के फूटेंगे छाले एक दिन


1
हाथों के फूटेंगे छाले एक दिन
जायेंगे कुछ सिर उछाले एक दिन
हौसले जुगनुओं के देखिये
लड़के लायेंगे उजाले एक दिन
जुल्म खुद ही खुद दफन हो जायेगा
हाथों के पत्थर उठाले एक दिन
मुल्क से तब जायेगी ये गरीबी
होगा श्रृमिकों के हवाले एक दिन
तब ही होगी हर तरफ खुशहालियां
पेट भर खाये निवाले एक दिन
2
हमको सब मंजूर है अब
मंजिल बहुत दूर है अब।
चाहें जितना जुल्म करें
उनका नहीं कसूर है अब।
भ्रष्टाचार जड़ों तक है
पाला ये नासुर है अब
जब से सिंहासन पाया
रहबर मद से चूर है अब।
बेईमानों से लड़ने को
ये किसान मजबूर है अब।
पता - सावरकर वार्ड , कटनी (म.प्र.)

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