इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

पुरानी चीजों को टिकाने की कला




  • -  कांशीपुरी कुंदन  -

पुरानी चीजों को टिकाने की कला में कुछ लोग इतने माहिर हैं कि अपनी फटीचर से फटीचर वस्तओं को भी वे नई चीजों के दाम में बेचकर इस कहावत को सत्य साबित कर देते हैं कि जब तक मूर्ख जिन्दा है, बुद्धिमान भूखा नहीं मर सकता।
कुछ दिनों से हमारी श्रीमती जी टी. वी. की माँग को विपक्षियों की तरह बराबर दुहरा रही थी। उसकी वजह थी, पड़ोसी के यहां टी.वी. का आना। मैं भी चाहता था कि यह माँग त्वरित पूरा करूं लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मजबूर था। जब इस छोटी सी माँग के कारण पत्नी की सदन से वाक आउट घर छोड़कर मैके जाने की नौबत आई तब हमने इसे गंभीरता से लिया और सलाहकारों से सलाह लेकर अमल में लाने का विचार किया। कहते हैं कि किसी चीज के बारे में चार लोगों से जानकारी लेकर खरीदो तो माल सही मिलता है। इस गरज से हमने शुभचिंतकों की सलाह मांगी और अपनी स्थिति भी स्पष्ट कर दी। एक बोले - इसमें चिंता करने की कौन सी बात है। अपनी तो कई टी. वी. सेंटर वालों से अच्छी जान पहचान है। बाद में पता चला कि वहां से उनको परसेन्टेज मिलता है। लेकिन एक बात है, अगर किश्तों में खरीदोगे तो मंहगा पड़ेगा। वैसे मैं भी अपना टी. वी. बेच रहा हूं। क्योकि मुझे रंगीन खरीदना है। खराबी जरा भी नहीं, पुराने मॉडल का अच्छा टी. वी. है। आप जैसा उचित समझे। मैं बिल्कुल ही उसे निकालने के पक्ष में नहीं हूं, पर क्या करोगे, वो रंगीन पर अड़ी हुई है। हमने सोचा अपने मित्र है, माल भी अच्छा मिल जायेगा और दाम भी सही, इसलिए उनसे टी.वी. खरीद लेने की इच्छा जाहिर की। टी. वी. दिखाकर कीमत पूछने पर उन्होंने कहा आप जिद्द कर रहे हैं इसलिए मुझे आपको देना पड़ रहा है। ऐसा मॉडल आजकल मिलता नहीं है। कल ही एक खरीददार पाँच हजार में माँग रहा था। हमने नहीं दिया आप अपने है इसलिए ले जाइये, रूपये आसान किश्तों में दे दीजियेगा। कुछ दिनों बाद हमेंं भान हुआ कि कीमत हमसे नये सेट का लिया गया है। साथ ही टी. वी. भी ओरिजनल नहीं है, पर अब क्या कर सकते थे, शौक जो चर्राया था।
एक है कल्लू मियां कबाड़ वाले, जो इस कला में इतने पारंगत है कि चलते - चलते अपनी कला का प्रदर्शन कर उल्लू सीधा कर लेत हैं। उनकी आदत है कि अपनी वस्तुओं की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कर ना, जैसे घड़ी पहने है तो बार - बार समय देखना, जूते पहने हैं तो पाजामा उठाते रहना आदि। उस दिन हमसे अचानक चौराहे पर टकरा गये, बोले गुरू, आज तो खूब जंच रहे हो, कहाँ गाज गिरने वाली है ? नये सूट, नये जूते .... वाह। क्या बात है, पर एक चीज तुम्हारी खटक रही है यार, ये क्या बाबा आदम जमाने की खैनी डिबियानुमा घड़ी लटकाए हो। अपनी देखो इम्पोर्टेड है। पिछले माह चाचा जी विदेश यात्रा पर गये थे जबकि उनके चाचा मुहल्ले से आगे नहीं बढ़े तो मंगवाया था।  हमने कहा - नहीं भाई, अभी कल ही खरीदी है। बे्रण्ड न्यू है। वह तपाक से बोला - हद करते हो। जमीन के अंदर से निकाली गई है ऐसी तो तुम्हारी घड़ी दिख रही है गनीमत हमें नहीं कहा इसे नया कहते हो। क्यों रूपये पानी की तरह बहाते हो। हाँ भैया ऊपरी कमाई वाले हो न, इसे पहनकर देखो .... अपना क्या है, फिर मंगवा लेंगे। मेरी कलाई सूनी रहेगी इसलिए तुम्हारी घड़ी बांध लेता हूं। घर जाकर सिर्फ नौ सौ रूपये भिजवा देना ... एक ही सांस में बोल गये वे। हम भी फॉरेन माल के लालच में कुछ नहीं बोल सके। बाद में पुलिस के चक्कर में जब पड़े तब पता चला कि घड़ी चोरी की है। हमने रूपयों के साथ घड़ी तो लुटाई, सूद में थाना सुख अलग।
एक बार हमारे रिश्तेदार आए। हम लोग उनके साथ बातों में इतने मशगूल हो गए कि पता ही नहीं चला कि बच्चे कब भाग गए। जाकर दूसरे कमरे में देखा तो मेहमान की अटैची के ऊपर वे कूद - कूद खेल रहे थे। हमने डांटते हुए मना किया। हमारी आवाज सुनकर वे भी आ गए। बोले - कुंदन जी बच्चे हैं खेलने दीजिए। इस सूटकेश की यही विशेषता है। आप इस पर बैठिये, कूदिये कभी गिर जाए तो भी कुछ नहीं होने वाला है। इसे ही देखिए, पांच साल हो गया है पर कहीं खरोच भी नहीं। इसे कहते हैं सस्ता रोये बार - बार महंगा रोये एक बार। हमारी श्रीमती जी उनकी बातों को ध्यान से सुन रही थी, बोली - क्यों भाई साहब, कितने में खरीदी थी ? सचमुच अच्छी लग रही है।
वे बोले - देखिए भाभी जी, कीमत को छोड़िए। सौ की एक बात, आपको पसंद है तो रख दीजिए। मेरा क्या, बाहर आना जाना लगा रहता है, दूसरी खरीद लूंगा।
हमने कहा - वो सब ठीक है पर आप हमारे मेहमान है। फिर आप अपने कपड़ों को किसमें ले जायेंगे ? नहीं - नहीं, ये ठीक नहीं है। फिर कभी आइएगा, तो जरूर लाइएगा। इस पर वे मत चूके चौहान के अंदाज में बोले - अरे भई, मैं भी घर का ही हूं। ऐसा कीजिए, आपके पास पुराना सुटकेश तो होगा। उसमें अपना सामान डाल लूंगा। आप भाभी जी का दिल क्यों तोड़ते हैं, रूपयों का क्या है आता जाता रहता है। फिर मैं तो वो मांग ही नहीं रहा हूं। अब आप ही सोचिए मेहमान को तो ऐसे ही सिर पर बिठाकर रखते हैं, उनकी हर बातों का ख्याल रखा जाता है। और अंत में खुशी - खुशी उपहार के साथ बिदा किया जाता है। हम भी क्या इतने अव्यवहारिक या कजूंस हो जाते ? अस्तु उपहार के साथ संयोगवश सूटकेश के दाम भी दिए, साथ में पुराना अलग।
ऐसे महान कलाकारों से आप जरूर बचिये क्योंकि इनका कोई ठिकाना नहीं, कोई भरोसा नहीं कब किस रूप में आपको मिल जाए और जब ढीली कर पछताने के लिए मजबूर कर दें।
  • पता - मातृछाया, मेला मैदान, राजिम, जिला  - रायपुर (छग.)

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