इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

फक्कड़ कवि थे निराला



- कृष्ण कुमार यादव  -
निराला हिन्दी के उन चंद कवियों में हैं, जिनकी लोकप्रियता व फक्कड़पन को कम ही लोग छू पाये हैं। यद्यपि अर्थाभाव के कारण निराला को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा पर न तो वे कभी झुके और न ही अपने उसूलों से समझौता किया। यही कारण है कि उन पर अराजक और आक्रमण होने तक के आरोप लगे, पर वे इन सबसे बेपरवाह अपने फक्कड़पन में मस्त रहे। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1897 को पं. रामसहाय त्रिपाठी के पुत्र रुप में हुआ था। कालान्तर में आप इलाहाबाद के दारागंज की तंग गलियों में बस गये और वहीं पर अपने साहित्यिक जीवन के तीस - चालीस वर्ष बिताए। निराला जी गरीबों और शोषितों के प्रति काफी उदार व करुणामयी भावना रखते थे और दूसरों की सहायता के प्रति सदैव तत्पर रहते थे। चाहे वह अपनी पुस्तकों के बदले मिली रायल्टी का गरीबों में बांटना हो, चाहे सम्मान रुप में मिली धनराशि व शाल जरुरतमंद वृद्धा को दे देना हो, चाहे इलाहाबाद में अध्ययनरत विद्यार्थियों की जरुरत पड़ने पर सहायता करना हो अथवा एक बैलगाड़ी के एक सरकारी अधिकारी के कार से टकरा जाने पर अधिकारी द्वारा किसान को चाबुको से पीटा जाना हो और देखते ही देखते निराला द्वारा उक्त अधिकारी के हाथ से चाबुक छीनकर उसे ही पीटना हो। ये सभी घटनायें निराला जी के सम्वेदनशील व्यक्तित्व का उदाहरण कही जा सकती है।
जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महोदेवी वर्मा के साथ छायावाद के सशक्त स्तम्भ रहे निराला ने 1920 के आस - पास कविता लिखना आरम्भ किया और 1961 तक अबाध गति से लिखते रहें। इसमें प्रथम चरण 1920 - 38 में उन्होंने अनामिका परिमल व गीतिका की रचना की तो द्वितीय चरण 1939 - 49 में वे गीतों की ओर मुड़ते दिखाई देते हैं। मतवाला पत्रिका में वाणी शीर्षक से उनके कई गीत प्रकाशित हुए। गीतों की परम्परा में उन्होंने लम्बी कविताएं लिखीं तो 1934 में उनकी तुलसीदास नामक प्रबंधात्मक कविता सामने आई। इसके बाद तो मित्र के प्रति, सरोज - स्मृति, प्रेयसी, राम की शक्ति - पूजा, सम्राट अष्टम एडवर्ड के प्रति, भिखारी, गुलाब, लिली, सखी की कहानियाँ, सुकुल की बीबी, बिल्लेसुर बकरिहा जैसी उनकी अविस्मरणीय पद्य - गद्य कृतियाँ सामने आई। निराला ने कलकत्ता पत्रिका, मतवाला, समन्वय इत्यादि पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। राम की शक्ति - पूजा, तुलसीदास और सरोज - स्मृति को निराला के काव्य शिल्प का श्रेष्ठतम उदाहरण माना जाता है। निराला की कविता सिर्फ एक मुकाम पर आकर ठहरने वाली नहीं थी वरन अपनी कविताओं में वे अंत तक संशोधन करते रहते थे। तभी तो उन्होंने लिखा कि - अभी न होगा मेरा अंत / अभी - अभी तो आया है, मेरे वन मृदुल वसन्त / अभी न होगा मेरा अंत।
निराला की रचनाओं में अनेक प्रकार के भाव पाए जाते हैं। यद्यपि वे खड़ी बोली के कवि थे पर ब्रजभाषा व अवधी में भी कविताएं गढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना, कहीं देश - पे्रम का जज्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका जोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर था। सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखांकन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है - वह तोड़ती पत्थर / देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर / वह तोड़ती पत्थर / कोई न छायादार पेड़ / वह जिसके तले बैठी स्वीकार / श्याम तन, भर बंधा यौवन / नत नयन प्रिय, कर्म - रत मन / गुरु हथौड़ा हाथ / करती बार - बार प्रहार / सामने तरु - मल्लिका अट्टालिका, प्राकार / इसी प्रकार राह चलते भिखारी पर उन्होंने लिखा - पेट - पीठ दोनों मिलकर है एक / चल रहा लकुटिया टेक / मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को / मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता / दो टूक कलेजे के करता पछताता।
राम की शक्ति पूजा के माध्यम से निराला ने राम को एक समाज में एक आदर्श के रुप में प्रस्तुत किया। वे लिखते हैं - होगी जय, होगी जय / हे पुरुषोत्तम जीवन / कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन। सौ पदों में लिखी गयी तुलसीदास निराला की सबसे बड़ी कविता है जो कि 1934 में लिखी गयी और 1935 में सुधा के पाँच अंकों में किस्तवार प्रकाशित हुई। इस प्रबंध काव्य में निराला ने पत्नी के युवा तन - मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को बखूबी दिखाया है - जागा, जागा संस्कार प्रबल / रे गया काम तत्क्षण वह जल / देखा वामा, वह न थी, अनल प्रमिता वह / इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान / हो गया भस्म वह प्रथम भान / छूटा जग का जो रहा ध्यान।
निराला की रचनाधर्मिता में एकरसता का पुट नहीं है। वे कभी भी बंधकर नहीं लिख पाते थे और न ही यह उनकी फक्कड़ प्रकृति के अनुकूल था। निराला की जूही की कली कविता आज भी लोगों के जेहन में बसी है। इस कविता में निराला ने अपनी अभिव्यक्ति को छंदों की सीमा से परे छन्दविहीन कविता की ओर प्रवाहित किया है - विजन - वन वल्लरी पर / सोती थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्र मग्न अमल कोमिल तन तरूणी जूही की कली / दृग बंद किये, शिथिल पत्रांक में / वासंती निशा थी। यही नहीं निराला एक जगह स्थिर होकर कविता पाठ भी नहीं करते थे। एक बार एक समारोह में आकाशवाणी को उनकी कविता का सीधा प्रसारण करना था तो उनके चारों ओर माइक लगाए गए कि पता नहीं वे घूम - घूम कर किस कोने से कविता पढ़े। निराला ने अपने समय के मशहूर रजनीसेन, चण्डीदास, गोविन्द दास, विवेकानन्द और रवीन्द्र नाथ टैगोर इत्यादि की बांग्ला कविताओं का अनुवाद भी किया। यद्यपि उन पर टैगोर की कविताओं के अनुवाद को अपना मौलिक कहकर प्रकाशित कराने के आरोप भी लगे। राजधानी दिल्ली को भी निराला ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति दी - यमुना की ध्वनि में / गूंजती सुहाग - गाथा / सुनता है अंधकार खड़ा चुपचाप जहाँ / आज वह फिरदौस, सुनसान है पड़ा / शाही दीवान, आम स्तब्ध है हो रहा है / दुपहर को पार्श्व में / उठता है झिल्ली रद / बोलते पत्थर रात यमुना - कछार में / लीन हो गया रव / शाही अँगनाओं का / निस्तब्ध मीनार, मौन है मकबरे।
निराला की मौलिकता, प्रबल भावोद्वेग, लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली, अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तर्निहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं। वसन्त पंचमी और निराला का संबंध बड़ा अद्भुत रहा और इस दिन हर साहित्यकार उनके सानिध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में निराला की काव्य रचना में यौवन का भावावेग दिखा - रोक - टोक से कभी नहीं रुकती है / यौवन - मद की बाढ़ नदी की / किसे देख झुकती है / गरज - गरज वह क्या कहती है, कहने दो / अपनी इच्छा से प्रबल वेग से बहने दो। यौवन के चरम में प्रेम के वियोगी स्वरू को भी उन्होंने उकेरा - छोटे से घर की लघु सीमा में / बंधे हैं क्षुद्र भाव / यह सच है प्रिय / प्रेम का पयोधि तो उमड़ता है / सदा ही नि:सीम भूमि पर।
निराला के काव्य में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, रहस्यवाद और जीवन के गूढ़ पक्षों की झलक मिलती है। पर लोकमान्यता के आधार पर निराला ने विषयवस्तु में नये प्रतिमान स्थापित किये और समसामयिकता के पुट को भी खूब उभारा। अपनी पुत्री सरोज के असामायिक निधन और साहित्यकारों के एक गुट द्वारा अनवरत अनर्गल आलोचना किये जाने से निराला अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में मनोविक्षिप्त से हो गये थे। पुत्री के निधन पर शोक - सन्तप्त निराला सरोज स्मृति में लिखते हैं - मुझे भाग्यहीन की तू सबल / युग वर्ष बाद जब हुई विकल / दुख ही जीवन की कथा रही / क्या कहूं आज, जो नहीं कही।
15 अक्टूबर 1961 को अपनी यादें छोड़कर निराला इस लोक को अलविदा कह गये पर मिथक और यथार्थ के बीच अन्तर्विरोधों के बावजूद अपनी रचनात्मकता को यथार्थ की भावभूमि पर टिकाये रखने वाले निराला आज भी हमारे बीच जीवन्त है। मुक्ति की उत्कट आकांक्षा उनको सदैव बेचैन करती रही, तभी तो उन्होंने लिखा - तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा / पत्थर की, निकलो फिर गंगा - जलधारा / गृह - गृह की पार्वती / पुन: सत्य - सुन्दर - शिव को सँवारती / उर - उर की बनो आरती / भ्रान्तों की निश्चल धु्रवतारा / तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा।
  • भारतीय डाक सेवा निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबर द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर - 744101

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