इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

समकालीन बोध और स्‍त्री विमर्श



  • दादूलाल जोशी -' फरहद ' 
       समकालीन,समकालीनता, समसामयिकता को आधुनिकता के संदर्भ में विविध रुपों में व्याख्यायित किया गया है। नव लेखन के अंतर्गत भिन्न - भिन्न रुपों में इन शब्दों का प्रयोग हुआ है। कईयों से आधुनिकता का पर्याय तक मानने की हुई है। कंटेम्पोरेनिटी तथा कोईबल शब्दों के समानवाची है, जिनका अर्थ है - उसी समय का कालखण्ड में होने वाली घटना या प्रवृत्ति या एक ही कालखण्ड में जी रहे व्यक्ति।
       किन्तु हिन्दी नवलेखन में इन शब्दों का समय परक अर्थ न लेकर प्रवृत्ति परक अर्थ ग्रहण करते हुए इनकी आन्दोलनधर्मी व्याख्या की गयी है। समकालीन, समकालीनता और समसामयिकता समयगत चेतना या बोध हैं जबकि आधुनिकता का समय - संदर्भ होने के साथ - साथ प्रवृत्तिगत अर्थ भी है। आधुनिकता का एक अपना तुलनात्मक संदर्भ भी है। आधुनिकता अपने पूर्ववर्ती समय से पृथक अपना स्वरुप और अस्मिता कायम करती है किन्तु इसका अर्थ भी नहीं समझना चाहिए कि समकालीन समकालीनता तथा समसामयिकता आधुनिकता की पूर्णत: विरोधी है। समकालीनता से आगे बढ़कर समसामयिक शब्द प्रवृत्तिगत अर्थ की ओर बढ़ने लगता है। कोई युग अपने समय में समकालीन या समसामायिक था या नहीं, इस प्रश्र के द्वारा हम उस युग की आधुनिकता की मात्रा से परिचित हो सकते हैं। एक ही युग में कई - कई समसामायिकताएॅ हो सकती है।
       इसी प्रकार वर्तमान युग की बहुत सी वस्तुएं और प्रवृत्तियाँ समसामयिक महत्व की हैं या नहीं - इस प्रश्र से इस युग की समसामयिकता को भी आंका जा सकता है। इस प्रकार समसामयिकता हमें अतीत और भविष्य के उचित बोध और सम्बंध से तो परिचित कराती ही है, वर्तमान युग की वृत्ति को भी समझने में भी सहायक है। इसीलिए डॉ. निहार रंजन जैसे विचारकों का मत है कि - समसामयिकता शब्द आधुनिकता की धारणा को बेहतर ढंग से मूर्त करता है।
        जिस युग के मूल्य और स्थितियाँ समसामयिक नहीं होते उनमें जड़ता आ जाती है और आधुनिता की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। इस प्रकार समसामयिकता आधुनिकता की प्रक्रिया को अग्रसादित तो करती ही है, वह उसे समझने में भी सहायक सिद्ध होती है। डॉ. रवीन्द्र भमर ने समकालीनता के तीन अर्थ बताये हैं -
1. काल विशेष से सम्बद्ध 2. व्यक्ति - विशेष के काल यापन से सम्बद्ध 3. साहित्य, समाज अथवा प्रवृत्ति विशेष से सम्बन्धित संशलिष्ट कालखण्ड। जिसे हम समकालीन कहते हैं, प्राय: दस - पाँच वर्षों का समय ही उसकी परिसीमा में जाता है। तो क्या दस - पाँच वर्षों के स्त्री - चिंतन को ही समकालीन स्त्री -  विमर्श की संज्ञा दें या इसकी उचित समय - सीमा क्या हो सकती है ? यह प्रश्र विचारणीय है। दूसरे यह जानना भी आवश्यक है कि समकालीन स्त्री - विमर्श से किस रुप में अपनी अलग पहचान बनाना है। अतएव समकालीन स्त्री - विमर्श की अवधारणा का स्पष्टीकरण निम्रलिखित दो रुपों में किया जा सकता है -
1. समकालीन की अवधारणा
2. समकालीन स्त्री - विमर्श की पहचान।
समकालीन की अवधारणा
       समकालीन नव लेखन के संदर्भ में प्रस्तुत अत्यन्त परिचित शब्द है। समकालीन संज्ञा साहित्य की प्राय: सभी विधाओं व विमर्शों के साथ प्रयुक्त हो रही है। यथा समकालीन कविता, समकालीन उपन्यास, समकालीन निबंध, समकालीन कहानी, समकालीन स्त्री - विमर्श, समकालीन दलित - विमर्श आदि। समकालीन लेखों, पुस्तकों, शोध ग्रन्थों में समकालीनता का संदर्भ विविध रुपों में बार - बार आता है। कहीं उसका अर्थ प्रवृत्ति मूलक है तो कहीं समय बोधक। जिस प्रकार प्रत्येक आधुनिक ने आधुनिकता की व्याख्या करना अपना परमपावन कर्तव्य समझा है, उसी प्रकार समकालीन साहित्यकारों ने  समकालीनता को अपने - अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है। यहॉ पर कुछ विद्वानों की परिभाषाएँ दी जा रही है -
समसामयिकता कलेवर की चीज होती है। आधुनिकता समसामयिक बिखराव और कलेवर गत उथल - पुथल के भीतर निरन्तर प्रवाहित गतिशील चेतना को समझने का दृष्टिकोण है इसलिए समसामयिक को आधुनिक मान लेना जोखम है।
       आज के संदर्भ में आधुनिक का एक संकुचित अर्थ समसामयिक भी उभरकर सामने आया है। इस संदर्भ में आधुनिकता का अर्थ है - वर्तमान का युगबोध। यहाँ दृष्टि वर्तमान पर ही केन्द्रित रहती है।
समसायिक और आधुनिक में जो अन्तर है वह केवल समय का ही नहीं, अन्तदृष्टि का भी है। कदाचित रचना - विधान का भी है।
       समकाल शब्द यह बताता है कि काल के इस प्रचलित खण्ड या प्रवाह में मनुष्य  की स्थिति क्या है ? इसे उलटकर कहें तो कहेंगे कि मनुष्य की वास्तविक स्थिति देखकर या उसे अंकित - चित्रित करके ही हम समकालीनता की अवधारणा को समझा सकते हैं। शर्त यही है कि लेखक आज के देशकाल स्थित मनुष्य के अंकन में वस्तुगत रहे यानी उसके चित्रण की विधि कोई भी हो लेकिन उससे जो मानव - बिम्ब उभरता हो, वह वास्तविक जीवन के निकट हो।
       किसी युग विशेष से क्रियाशील जीवन प्रद्धति और उस प्रद्धति को झेलते हुए मानव के अन्तभार्वों और उसकी स्थितियों का चित्रण समसामयिकता के लिए पर्याप्त नहीं है, अपितु युग सन्दर्भ को उद्वेलित या विकसित करने में विगत प्रक्रियाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी पहचान भी समसामयिकता के लिए अनिवार्य सत्य है।
       समकालीनता का अर्थ किसी कालखण्ड या बयान भर नहीं है बल्कि उन्हें ऐतिहासिक अर्थ में समझना, उनके मूल स्त्रोत तक पहुंचना और निर्णय ले सकने का विवेक अर्जित करना है। समकालीनता, तात्कालिकता नहीं है।
       सचेतन समकालीन व्यक्ति का कालबोध, देशबोध, व्यक्ति और समूह- बोध संग्रथित बोध होता है। वह काल के किसी बिन्दु को निरपेक्ष और अलग - अलग नहीं मानता। वर्तमान में वह भूत और भविष्य को समझता है। यह समझ ही व्यक्ति को समकालीन बनाती है और उसे काल की निरन्तरता या प्रवाह और परिणितियों की सम्भावनाओं का ज्ञान कराती है। समकालीन बोध परम्परित मूल्य चेतना को नहीं मानता है। नये मूल्यों की तलाश में वह जिस प्रकार का अनुभव प्राप्त करता है जिस समस्याओं से उसे गुजरना पड़ता है, इन सबके मूल में जो कुछ उसे सही और सार्थक प्रतीत होता है उसे प्रतिमानों के रुप में घोषित करता है।
       इस प्रकार उपर्यक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समकालीनता एक कालखण्ड की समस्याओं से परिचित कराती है। वह किसी भी परम्परा को फैशन के रुप में स्वीकार नहीं करती। वह उसकी समाजोपयोगी धारणाएं देखती है। समकालीन रचनाकार आम आदमी के घृणित यथार्थ का उद्घाटन करता है, जो उसकी विषम परिस्थितियों से सम्बन्धित है। इसमें एक जड़ परम्परा और जड़ व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव है। समकालीन रचनाकार सबसे पहले अपने को व्यापक मानव - नियति के प्रति प्रतिबद्ध अनुभव करता है।
       समकालीनता देश की अनिश्चयात्मक स्थितियों को एक चुनौती के रुप में स्वीकार करती है। और उससे लड़ने के लिए वैचारिक आधार पर विरोध और विद्रोह का सहारा लेती है। वह देश काल के बदलाव को मानवीय संदर्भ में देखने की पक्षपाती है जिससे आम आदमी भी खास आदमी की तरह रह सके, जी सके। काल का बोध या समकालीन बोध, उस व्यक्ति को होता है जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। समकालीन साहित्य में जो निषेध , अस्वीकार आक्रोश, व्ंयग्य, लताड़ और दुलत्ती का स्वर देखने को मिलता है वह अपने परिवेश और व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोही चेतना के रुप में मुखरित होता रहा है।
समकालीन स्त्री - विमर्श की पहिचान :-
       समकालीन स्त्री - विमर्श पूर्ववर्ती स्त्री - विमर्श से अलग अपनी पहचान के बिन्दु रखते हैं। समकालीन स्त्री - विमर्श अपने पूर्ववर्ती स्त्री - विमर्श से जिन विभूतियों पर अलग हुआ उसकी चर्चा विभिन्न विद्वानों द्वारा बड़े - बड़े दावों के साथ की गई है लेकिन इससे वस्तु स्थिति को समझने में विशेष सहायता नहीं मिली। इस अन्तर को स्पष्ट करने के लिए कहीं - कहीं तो केवल शब्दों की उहेलिका में भरमा दिया गया।
       हिन्दी साहित्य में बदलाव की दिशा सन् 1960 ईस्वी के बाद ही दिखाई देने लगती है। सन् 1965 ईस्वी तक पहुंचते - पहुंचते स्त्री विमर्श का यह बदला हुआ रुप पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। समकालीन स्त्री - विमर्श के प्रारंभिक वर्षों 1960 - 65 के बीच हमारे देश में व्यक्ति की जीवन स्थितियाँ बहुत तेजी से बदली। सन् 1962 ईस्वी मे हिन्दी - चीनी भाई - भाई के नारे को जूतियाते हुए चीन ने हमारी सरहदों को रौंद डाला और हमें एक लज्जा जनक हाल और अपमान को कड़वा घूंट पीना पड़ा। फिर सन् 1965 ईस्वी में हुए भारत - पाक युद्ध में प्राप्त विजय में देश को एक अपूर्व आत्मविश्वास से भर दिया। इसके साथ ही भंयकर सूखा और अकाल की स्थितियाँ देश में नक्लवादी प्रवृत्तियों को बोलबाला, मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन से उत्पन्न भयंकर संकट और सूरसा सा मुँह फैलाती महंगाई, खाद्यान्नों आदि का संकट और इस संबंंध में देश की परभुखापेक्षिता, आवश्यकता की विभिन्न वस्तुओं पर राशन और उनकी प्राप्ति के लिए लम्बी - लम्बी कतारें देश में दिन - प्रतिदिन बढ़ती शिक्षितों की बेरोजगारी और उससे उत्पन्न आक्रोश और क्षोभ देश में वामपन्थी चिन्तन को बढ़ावा, कांग्रेस तक में वामपंथी दल का अभ्युदय आदि विभिन्न घटनाओं और स्थितियों ने जीवन जीने की परिस्थितियों को जटिल और संक्रात कर दिया। इन सबके परिणाम स्वरुप देश के नवयुवकों की पीढ़ी ने एक जुझारू मुद्रा प्राप्त कर ली। जीवन का यथार्थ इस समय बदला हुआ था। यथार्थ चित्रण के इस बदलाव को प्रमुख विभाजक रेखा मानते हुए यहां उन प्रमुख बिन्दुओं को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। जो समकालीन स्त्री - विमर्श को पूर्ववर्ती स्त्री - विमर्श से पृथक करते हैं।
वास्तविक यथार्थ की ओर प्रयाण:-
       पूर्ववर्ती स्त्री - विमर्श के कल्पना प्रसूत यथार्थ चित्रण की बंधी - बंधायी परिपाटियों और जोड़ियों के प्रति विद्रोह कर युवा स्त्री - विमर्श कारों ने उस यथार्थ को अपना कथ्य बनाया जो उनके चारो ओर प्रस्तुत था। इस पीढ़ी के स्त्रीवादी लेखक लेखिकाएं अपने लेखन में यथार्थ को चित्रित नहीं करते थे अपितु वे उसे जीते थे। पूर्ववर्ती स्त्री विमर्श के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर जब यथार्थ को समेरिक आदर्श में लपेट कर प्रस्तुत कर रहे थे ऐसे समय स्त्री - विमर्शकारों की एक पूरी पीढ़ी जीवन के भयावह यथार्थ का साक्षात् अपने स्त्री - विमर्श में करती है। इन्होंने जीवन जिस रुप में पाया उसी रुप में उसको अपने लेखन में प्रस्तुत किया। वर्तमान से भिड़ने का यह आग्रह समकालीन स्त्री - विमर्श को जीवन की खुरदरी जमीन पर ला खड़ा किया। इन लेखकों ने ऐसा केवल फैशन या दिखावे के लिए नहीं किया अपितु युग जीवन के बदलते हुए यथार्थ को वाणी देना अपना कर्तव्य समझा, क्योंकि वह जो जीवन भोग रहा था, उससे अलग जीवन अपने लेखन में वर्णित करना उसे बेमानी और बेईमानी लगा। जिस जीवन में तुम्हें यंत्रणा ही यंत्रणा मिल रही हो  उससे मुंह मोड़ना स्त्री - विमर्शकारों द्वारा सच्चाइयों को झुठलाना होता है। इन स्त्री - विमर्शकारों ने सच्चाइयों से मुंह न मोड़ कर उन्हें पूरी तरह जिया है।
       वास्तविक यथार्थ की यह खोज समकालीन स्त्री - विमर्श में किसी एक ही दिशा तक सीमित नहीं रही। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनछूए प्रसंग और स्थितियाँ अपने पूर्ण विवरणों में पूरी ईमानदारी से यहाँ वर्णित है। इस प्रकार समकालीन स्त्री - विमर्श का वास्तविक यथार्थ बहुत आयामी है। सामान्य स्त्री की जिंदगी में जीवन जीने की विषम आर्थिक स्थितियाँ, वैज्ञानिकरण, औद्योगीकरण और तकनीकी के विकास से उत्पन्न विभिन्न नवीन स्थितियाँ और समस्याएं पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के भयावह त्रासद परिणाम नैतिक रूढ़ियों और मान्यताओं का विघटन स्त्री जीवन में घर कर गई निराशा और कुण्ठा, महानगरीय जीवन और उसकी बहुमुखी समस्याएं भ्रष्ट राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था के प्रति स्त्री का तीव्र आक्रोश एवं असंतोष प्रेम और सेक्स, नूतन भाव बोध आत्मिक संबंधों पर अर्थतंत्र के बढ़ते दबाव ओर खण्डित पारिवारिक संबंध नौकरी पेशा नारी की समाज में बदली हुई स्थिति, नारी में आधुनिकता और पुरातनता का द्वंद, देश की राजनीतिक परिप्रक्ष्य का सांगोपांग चित्रण, युवा आक्रोश, छात्र - छात्राओं की अनुशासनहीनता देश में शिक्षित बेरोजगारों की भयंकर समस्या, योग्यता और प्रतिभा की खुली अवमानना तथा उससे उत्पन्न क्षोभ, देश से दूर रह रहे भारतीय स्त्रियों व पुरुषों के मानसिक स्थिति के विभिन्न रुप, देश के नौकरशाही का भ्रष्ट व्यवहार एवं स्त्रियों के शोषण का कार्यलयीन वातावरण आदि जीवन की न जाने कितनी स्थितियों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरण और उन सब समस्याओं पर लेखकीय दृष्टि और पकड़ का बड़ा गहन परिचय, समकालीन स्त्री - विमर्श में मिलता है।
       इस प्रकार कहा जा सकता है कि इन स्त्री - विमर्शों का चित्र - फलक अत्यन्त विस्तीर्ण है। एक प्रकार से आज के स्त्री की पूरी जिंदगी ही स्त्री विमर्श में आ गया है। समकालीन स्त्री - विमर्श में चित्रित इस वास्तविक यथार्थ की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि केवल दिखाने के लिए या मात्र वर्णन के लिए नहीं हैं अपितु वह स्त्री के इस भयावह यथार्थ की जिम्मेदार स्थितियों और कारणों पर स्त्री की सोच को उभारने का जोरदार प्रयत्न करता है। वह स्त्री की बौद्धिक चेतना को झकझोर और झिंझोड़ कर उन कारणों पर विचार करने के लिए बाध्य करता है जो उसकी उस वर्तमान स्थिति के लिए उत्तरदायी है। इससे स्त्री - विमर्श में एक विशेष तग्मता इंटेसिटी और प्रभाव क्षमता आ गया है। आज यदि स्त्री - विमर्श की वर्तमान स्थितियों के कारण सोच को प्रेरित नहीं कर सकता तो वह एक श्रेष्ठ स्त्री - विमर्श नहीं है।
रचना प्रक्रिया का मौलिक अन्तर
       यथार्थ के प्रति वास्तविक नई दृष्टि अपना लेने से समकालीन स्त्री विमर्श कार की रचना - प्रक्रिया में एक मौलिक अन्तर आ गया है। पहले विमर्शकार अपने को जीवन स्थितियों से अलग रखकर उन्हें देखता था, या उनमें प्रविष्ट होता था, आज वह जीवन की उन स्थितियों का सहभोक्ता है। ... पहले के लेखक की एक अतिरिक्त सत्ता थी, इसीलिए वह रचना करता था। आज लेखक रचना झेलता है, क्योंकि हर जगह भागीदार की हैसियत से वह विद्यमान रहता है
       वस्तुत: आज विमर्शकार स्त्री - जीवन की स्त्री - विमर्श में लाकर वह उन्हें काल और परिवेश के वृहत्तर प्रश्रों से जोड़ता है। वास्तविक यथार्थ यहाँ लेखक को विचार प्रवृत्त करता है। इस वैचारिक प्रक्रिया ने स्त्री और समाज की सत्ता को अलग - अलग रख कर नहीं देखता है। यहां इन यथार्थ अनुभवों के माध्यम से स्त्री - विमर्शकार अपने को समाज से, वृहत्तर स्त्री समाज से जोड़ता है।
       स्‍त्री और समाज के संबंध में उठे प्रश्रों के संदर्भ से कटकर स्त्री - विमर्श का यथार्थ समाचार - पत्र की रिपोर्टिंग मात्र रह जाएगा। लेखक से यह अपेक्षा होती है कि वह यथार्थ घटनाओं के माध्यम से मानवीय अस्तित्व से सम्बन्धित प्रश्नों पर दृष्टिपात करें।
       यह स्त्री - विमर्शकार का परिवेश होता है किन्तु इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि निबंधकार स्त्री की उपेक्षा करके समाज या परिवेश को ही महत्व दे। आज के स्त्री - विमर्श में स्त्री अपने माध्यम से समाज या परिवेश से जुड़ती है। यहां समाज और स्त्री अथवा कहें परिवेश और स्त्री की स्थिति अलग - अलग न होकर अंतर्गधित है। इसी प्रवृत्ति के कारण आज विमर्शकार स्त्री- अस्तित्व के व्यापक प्रश्रों पर अपनी चिन्ता प्रकट कर रहा है। जो समकालीन विमर्शकार ऐसा न कर मात्र यथार्थ - चित्रण करता है, वह निकम्मा व रद्दी लेखन कर रहा है। जिसे समय बड़ी निर्ममता से अस्वीकृत कर काल के गाल में डाल देगा।
       आज का स्त्री - विमर्शकार स्त्री समाज को जीवन्त स्थिति में स्वीकार कर उससे सम्बन्धित प्रश्रों को सुलझाने की कोशिश अपने लेखन में करता है। इस रुप में वह स्त्री समाज के बीच अपनी सही भूमिका की तलाश करता है। समकालीन स्त्री - विमर्श से विमर्शकार कहीं भी समस्या के समाधान को प्रश्रय नहीं देता, अपितु प्रश्रा कुलता में ही मानवीय सोच को उभारता है। वह समस्याओं की तह में गहरे प्रक्रिया एक शोध परक दृष्टि लिए हुए हैं।
परिवेश के प्रति अधिक जागरुकता
       आज की स्त्रीवादी विमर्शकार परिवेश के प्रति अधिक जागरुक है। यर्था की जिस अवधरणा को लेकर समकालीन विमर्शकार चला है उसके कारण वह बहुत अंतरंग रुप से अपने परिवेश से जुड़ गया है। आज के स्त्री - विमर्श का यथार्थ इसीलिए इतना प्रभावी और अनुभव - संवेध है कि वह उस परिवेश की चीज है जिसे पाठक और लेखक दोनों भोग रहे हैं। परिवेश से गम्भीर रुप से जुड़कर ही श्रेष्ठ स्त्रीवादी साहित्य की रचना हो सकती है। आज स्त्रीवादी लेखक अपने चारों ओर जो देख रहा है, उसी को अपनी रचना में जी रहा है। परिवेश के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी पक्ष उसके यथार्थ की प्रतीति कराते हैं।
       स्त्रीवादी लेखक परिवेश से पूरी तरह साक्षात कर उसकी भयावह और त्रासद स्थितियों को सामने लाता है। परिवेश की हर अच्छी बुरी स्थिति पर स्त्रीवादी लेखक की दृष्टि गयी है। उसमें कहीं भी इन स्थितियों से अपने को काट लेने की मुद्रा नहीं अपनायी है। उसने अपना कथ्य परिवेश की इन्ही जीवन स्थितियों से उठाये हैं। इसीलिए विषय - वस्तु इतने जीवन्त और स्थितियाँ इतनी प्रभावी बन सकी है। आज के स्त्रीवादी साहित्य में आर्थिक समस्याओं का चित्रण अथवा जो राजनीतिक संदर्भ पाया जाता है, उसका मूल कारण लेखक का अपने परिवेश से जुड़ना है। आज के स्त्रीवादी खानो को बांटकर नहीं देखा जा सकता। आज ये सब स्त्रीवादी साहित्यकार के लिए यथार्थ का एक मिला - जुला रुप है। उसकी चेतना परिवेश में गहरे पैठी हुई होने के कारण इन सब स्थितियों से प्रभावित होती है। इसीलिए समकालीन स्त्रीवादी साहित्य हमें अपने समय की सच्चाइयों के दस्तावेज के रुप में दिखाई देता है। परिवेश के प्रति अतिशय संवेदनशीलता ने समकालीन स्त्रीवादी साहित्यकार में विशेष आत्मसजगता ला दी है। अपनी इस आत्मसजग प्रवृत्ति से वह स्त्रीवादी साहित्य में अपने परिवेश का अत्यंत अन्तरंग वर्णन करता है।
नयी मू्ल्य दृष्टि
       आज जीन के प्रत्येक क्षेत्र में बड़ा भारी परिवर्तन आया है। यद्यपि प्रत्येक युग के मूल्य कुछ समय पश्चात समय बाह्य हो जाते हैं किन्तु मानव सभ्यता के विगत 500 वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है। कि जब मूल्यों में परिवर्तन बड़े दु्रतगामी रहे हैं। इस परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी तेज है कि जब किसी युग के मूल्य पिछले युग के जीवन मूल्यों से ही अलग दिखाई नहीं देते अपितु आज एक ही व्यक्ति अपने छोटे से जीवन में या विभिन्न दशकों के और भी छोटे समय में मूल्य - दृष्टि के इस परिवर्तन का अनुभव करता है। यही कारण है कि आज रूढ़ियों के बीच अन्तराल बहुत अधिक दिखाई देता है। मूल्यों का एक दु्रत परिवर्तन, विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी में हुए तीव्र विकास का परिणाम है। तकनीक का यह विकास कुछ मूल्यों को बिल्कुल ही समाप्त कर देता है। कुछ नये मूल्य स्थापित हो रहे हैं। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नयी और पुरातन मूल्य दृष्टि का टकराव हो रहा है। कहीं पुरातन मूल्यों से चिपके रहने का अतिरिक्त दुराग्रह दिखाई देता है तो कहीं नये मूल्यों को स्वीकारने की व्याग्रता भी प्राप्त होती है। मूल्यों के प्रति यह बदलती दृष्टि समकालीन स्त्री - विमर्श में पूरी तरह वर्णित हुआ है। प्रेम, विवाह, परिवार मं माँ - पिता, भाई - बहन, पिता - पुत्र - पुत्री मित्र आदि के जितने भी सुदृढ़ सम्बन्ध हो सकते थे, उन सबके सम्बन्ध में हमारी सोच और चिन्तन प्रक्रिया में एक बड़ा भारी अन्तर दिखाई देता है। इन सब क्षेत्रों के मूल्यों में व्यक्ति स्वांतत्र्य या व्यक्तित्व स्वतंत्रता का अत्यधिक महत्व रहा है।
आज स्त्री - विमर्श जीवन की सच्चाईयों से निर्मम साक्षात्कार के लिए जूझता है, इसलिए कहीं भी यहाँ मूल्यों की रक्षा का मोह या अतिरिक्त प्रयास नहीं है। यदि एक अच्छा मूल्य समाप्त हो गया है या समाप्त होने की प्रक्रिया में है तो उसे यथावत ही प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यहाँ वे मूल्य टूटते दिखाई देते हैं, जो शास्वत मूल्यों के रुप में जाने जाते हैं। उनकी जगह व्यवहारिक मानवीय मूल्यों की स्थापना के संकेत समकालीन स्त्री - विमर्श में मिलते हैं।
सम्बन्ध के परम्परागत रुप का नकार
        मानवीय संवेदना पर अर्थ का स्वार्थ हावी होकर बहुत सारे आत्मिक सम्बन्धों को बेमानी या बेमलत का बोझ ढोने की रस्म सी बना रहा है। माँ - बाप, पिता - पुत्र - पुत्री, भाई - बहन, पति - पत्नी, भाई - भाई के बीच अनाम दूरियाँ आ गयी है। जिसके कारण ये सब सम्बन्ध दरकने लगे हैं। समकालीन स्त्री - विमर्श में इस विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। संबंधों की विसंगतियों, तनाव, जटिलता और दरकन को समकालीन स्त्री - विमर्शकारों ने अपने साहित्य में बहुत बेबाक रूप से प्रस्तुत किया है, जिससे समकालीन स्त्री - जीवन की बहुत प्रमाणिक तस्वीर उभरती है।
नया नैतिक - बोध
       मूल्यों में परिवर्तन के साथ - साथ आज नैतिकता का परम्परागत अर्थ भी लुप्तप्राय हो गया है। आज की नैतिकता विगत युग की नैतिकता से पूर्णत: पृथक है। आधुनिक युग की जीवन स्थितियों ने हमारे नैतिक प्रतिमानों की बना - बनायी छवि को निर्ममता पूर्वक तोड़ा है। धर्म और ईश्वर की धारणा में भी परिवर्तन आया है। विभिन्न दार्शनिकों द्वारा ईश्वर की सत्ता की अस्वीकृति ने पाप - पुण्य और उनके आधार पर दण्ड की मान्यता को बदल दिया। इससे इस जीवन और लोक के पश्चात् दण्ड - विधान का जो भय था वह समाप्त हो गया इसलिए व्यक्ति का कोई भी कृत्य आज पाप बोध नहीं जगाता। वह जैविक धर्म या जैविक प्रवृति मानकर किसी भी प्रेम और वासना के कृत्य में संलिप्त होता है। गर्भ - निरोध के बढ़ते साधनों, इनकी सर्व - सुलभता और खुली चर्चा तथा प्रचार - विज्ञापन ने मनुष्य के आचरण प्रेम और यौन - सम्बन्धों की मान्यताओं में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। आज यौन - सम्बन्धों की खुली चर्चा भी किसी प्रकार के वर्जना - भाव को जन्म नहीं देती। समकालीन स्त्री - विमर्श से काम, भावना, यौन आदि को शरीर - धर्म के रुप में स्वीकृत कर नैतिकता के समस्त स्थापित मानदण्डों को छिन्न - भिन्न कर दिया है।
स्त्री - पुरुष सम्बन्धों में दृष्टि का बदलाव
        वर्तमान युग में स्त्री - पुरुष के पारस्परिक सम्बन्धों में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया है। मूल्य - दृष्टि, नैतिकता, बोध और जीवन परिस्थितियाँ बदल जाने से स्त्री - पुरूष सम्बन्धों में परिवर्तन आना सहज सम्भावी है। यह परिवर्तन विवाह और विवाहेत्तर प्रेम - सम्बन्धों दोनों में दिखाई देता है। स्त्री जब रोजी - रोटी की तलाश में अपने घर की चारदीवारी की लक्ष्मण - रेखा को लाँघकर बाहर आयी तो उसकी जीवन स्थितियों में बहुत अंतर आ गया। घर से बाहर आकर वह एकाधिक पुरुषों के सम्पर्क में आयी और अब तक पुरुष जिस विवाहेत्तर प्रेम को मात्र अपना अधिकार समझता था, वह स्त्री की पहुंच में भी आ गया। यदि स्त्री घर में पति से संतुष्ट नहीं है या विवाहिता नहीं है अथवा उसके विवाह को किसी न किसी कारण से टाला जाता रहा है तो उसके पास एक स्वाभाविक आधार था कि वह किसी पुरुष की ओर आकर्षित हो अथवा जिस प्रकार पुरुष अपनी भ्रमप्रवृति में एकाधिक पत्नियों या प्रेमिकाओं से प्रेमालाप कर सकता था उसी प्रकार स्त्री किसी भी पुरुष या एकाधिक पुरुषों से प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। नैतिकता के नये बोध ने यौन - शुचिता की धारणा को खण्डित कर काम को मात्र एक दैहिक, जैविक आवश्यकता के रुप में स्वीकारा। इस दृष्टि से प्रेम और विवाह की परम्परागत अवधारणाओं को समाप्त कर दिया। समकालीन स्त्री - विमर्श मं इन बदले सम्बन्धों पर बहुत अधिक लिखा गया है।
जीवन की आर्थिक पक्ष की प्रधानता
       सन् 1965 एवं 1971 ई. में हुए भारत - चीन और भारत - पाक युद्धों का अर्थ - व्यवस्था पर पड़ता दबाव, अकाल सूखा और अतिवृष्टि के कारण देश में बढ़ती भुखमरी और कितने ही खाद्य पदार्थों के अभाव से उत्पन्न संकट, मुद्रा - स्फीति और मुद्रा - अवमूल्यन के कारण मुद्रा की क्रयशक्ति का हा्रास और उससे उत्पन्न नैराश्य, कमरतोड़ मंहगाई, करो की मार आदि ने 1960 - 65 ई. के बाद जीवन जीने की स्थितियों को विकरालतर बना दिया। शिक्षित बेरोजगारी ने एक ओर नैराश्य और अवसाद को जन्म दिया। शिक्षा, योग्यता और प्रतिभा की दारुण अवमानना और भ्रष्ट अवस्था में भाई - भतीजावाद के प्रश्रय ने युवा मानस के स्वप्नों  को तोड़ घोर आर्थिक यंत्रणा में डाल दिया। समकालीन स्त्री - विमर्श वर्तमान जीवन की उन कटु सच्चाईयों से जुझता भयावह यथार्थ से साक्षात्कार करता है। वह अर्थतंत्र की विषम समस्याओं, उन मूलभूत प्रश्रों पर जिन्होंने मानवीय अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है, बड़ी गम्भीरता से विचार करता है।
व्यवस्था के प्रति तीव्र रोष
       परिवेश के प्रति अतिशय जागरुकता और जीवन जीने की स्थितियों की अतिशय जटिलता ने युवा मानस को अपने चारों ओर की भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति अत्यन्त रोषशील दिया। समकालीन वितर्शकार ने अपने चातुर्दिक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक सभी व्यवस्थाओं को भ्रष्ट पाया तो उसमें उनके प्रति रचनात्मक धरातल पर एक तीव्र रोष मिलता है। व्यक्ति के चारो ओर फैले इस भ्रष्टाचार ने समस्त व्यवस्था को फूंक देने के लायक ही बना दिया। इस भ्रष्ट व्यवस्था ने हमारे जीवन को एक विद्रुप भाव और विसंगति बोध से भर दिया है।
       प्रत्येक कार्यालय, धार्मिक सुधार संस्था, राजनीतिक पार्टियाँ संस्थाएं, राजनेता, कानून और व्यवस्था की रक्षक पुलिस, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, कल - कारखानें जिस भी जगह का नाम लें, हर जगह घोर भ्रष्टाचार फैला हुआ है। समकालीन स्त्री - विमर्श को पढ़कर पग - पग पर यह एहसास और घनीभूत हो जात है कि आज स्त्री दमघोंटू परिस्थितियों में जीने के लिए विवश है। रचनात्मक स्तर पर स्त्री - विमर्शकार के इस रोष का अपने युग - जीवन से पूर्ण सम्पृक्ति है।
विद्रोही स्वर ओर दुर्दननीय जिजीविषा
       उपर्युक्‍त कारणों से ही समकालीन स्त्री - विमर्श का स्वर विद्रोही है, समझौते का नहीं। वह व्यक्ति की दारुण स्थितियों से समझौता न कर उन्हें पूर्णत: बदल देना चाहता है। जीवन जीने की विषम परिस्थिाँ जहाँ व्यक्ति के जीवन में फैले घोर नैराश्य का परिचय देती है, जहाँ स्त्री - विमर्श का कथ्य भाग्य को कोसने वाला नहीं होता। वह शिला सन्धि की दुर्वा की तरह अदम्य जीवनी शक्ति का परिचय देता है। इसलिए निराशावादिता जो आधुनिक बोध का अत्यन्त महत्वपूर्ण घटक माना गया है, से अलग हटकर इन विमर्शों में एक जुझारू मुद्रा मिलती है। यही स्त्री - विमर्श कार का जीन के प्रति आस्थावान दृष्टि है। व्यवस्था पर व्यंग्य करना और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचारों की निर्भयता पूर्वक बखिया उघेड़ना ही समकालीन विमर्श में समकालीन व्यक्ति की दुर्दन जिजीविषा है।
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
       समकालीन स्त्री - विमर्श अपने समय की राजनीतिक गतिविधियों से बेखबर नहीं, अपितु वह उससे पूरी तरह जुड़ा हुआ है। यद्यपि आज विमर्शकार की प्रतिबद्धता किसी राजनीतिक पार्टी से जरुरी नहीं है किन्तु उसके विमर्श में जीवन का राजनीतिक पक्ष बहुत स्पष्ट रुप से उजागर हुआ है, क्योंकि आज का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य उसके देखे - भोगे जीवन का अंग है। वह उसका यथार्थ है। वह अपने यथार्थ को राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि खानों में बाँटकर नहीं देखता। चुनावों की धांधलेबाजी, राजनीतिज्ञों द्वारा चुनाव में जनता का शोषण उससे किये गये वायदे और उनका थौथापन, चुनावों में जनता का शोषण उससे किये गये वायदे और उनका थोथापन, चुनावों के समय जिन लोगों के सिर पर देववत बैठाया जाता है, बाद में उनसे कौड़ी का भी न पूछना आदि चुनाव स्थितियों पर समकालीन स्त्री - विमर्श भरपूर प्रकाश डालता है। चुने जाने के बाद उसी व्यक्ति द्वारा उन मूल्यों की हत्या जिनके लिए वह लड़ा था, कोटे परमिट के बन्दर - बाट में उलझ जाना, अपनी कुर्सी और टोपी की सलामती के लिए तरह - तरह के हथकण्डे अपनाना जुलूस - हड़ताल की राजनीति, कल कारखानों की युनियनों में राजनीतिक चालें आदि पर सशक्त ढंग से प्रकाश डाला गया है।
भाषा की नयी तलाश और समृद्ध शिल्प
       समकालीन स्त्री - विमर्श भाषा का एक बिल्कुल नया और समृद्ध संस्कार दिखाई देता। भाषा को जीवन के निकट लाकर सहज और स्वाभाविक रुप प्रदान करने भी उसकी सम्प्रेषण क्षमता को बढ़ाकर मन की पर्तों को बड़ी सूक्ष्मता से पाठक के सामने उभारता है। यह सब भाषा के द्वारा ही संभव हो सका है। गद्य भाषा की सहजता में जीवन धरनी गंध लिए इतनी अर्थक्षम हो सकती है, समकालीन स्त्री - विमर्श भाषा इसका प्रमाध। यहाँ भाषा की सहजता और जीवन के निकट लाने का प्रयास बोलचाल के शब्दों को गद्य की लयानुसार अर्थ संगति देने के सुंदर प्रयास में भाषा को अपूर्व शक्तिमत्ता प्रदान की है। हर प्रकार की समेंटिंक प्रवृत्ति काव्यात्मक उपमान व बिंब इनकी चित्रालक व बिंबात्मक क्षमता की अभिवृद्धि कर सके इसे एक सहज सौंदर्य प्रदान करते हैं। भाषा की सरलता उसे सद ही नहीं बनाता अपितु वह उसको गहन और सूक्ष्म अर्थ की शक्ति प्रदान करते हैं। आज समकालीन स्त्री - विमर्श का भाषा गद्य के समस्त शक्ति को लिए हुए मानव मन में पैठती है।
       स्‍त्री - विमर्श न मजाक है न अपवाद वह एक ही समय हमारे देश काल और पूरी दुनिया से जुड़ा है - वह हमारे समय के जरुरत है वह समग्र आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, भाषिक और सांस्कृतिक विमर्श हिन्दी में पिछले कुछ वर्षों में मुखर हुए। स्त्रीत्ववादी - विमर्श ने अब एक वैचारिक मोड़ पैदा करना शुरु कर दिया है। डॉ. विनय कुमार पाठक का स्त्रीवादी - विमर्श इसी वैचारिक मोड़ की देन है
       सारे साहित्यिक और सांस्कृतिक गरिमामय शब्दजाल से आदमी ने औरत की एक चीज को मारा कुचला या पालतु बनाया है। वह उसकी स्वतंत्रता। आदमी हमेशा से नारी की स्वतंत्र सत्ता से डरता रहा है। और उसे ही उसने बाकायदा अपने आक्रमण का केन्द्र बनाया है। अपनी अखण्डता और सम्पूर्णता में नारी दुर्जेय और अजेय वहां वह ऐसी शक्ति है जो स्वतंत्र और स्वच्छंद है। बनैली और स्वैरिणी इसीलिए आदमी ने उसे ही तोड़ा है। तोड़ का ही इसी को कमजोर और पालतू बनाया जा सकता है। आदमी ने लगातार और हर तरह कोशिश की है उसे परतंत्र और निष्क्रिय बनाया जा सके।
       उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि स्त्री के प्रति यही हजारों सालों से चले आते पुरुष संस्कार का सार है। शब्द चाहे जो भी हो पुरुष नारी को जो कुछ समझता है वह इन पंक्तियों से स्पष्ट है। सच तो यह है कि हमारे सारे परम्परागत सोंच में नारी दो हिस्सों में बांट दिया गया है। कमर से ऊपर की नारी, और कमर से नीचे के औरत हम पुरुष को उसकी सम्पूर्णता में देखते हैं, उसकी कमियों और कमजोरियों के साथ उसका मूल्यांकन करते हैं। नारी को हम सम्पूर्णता में देख पाते। कमर से नीचे वह कामकन्दरा है, उतसित और अश्लील है। ध्वंसकारिणी है, राक्षसी है और सब मिलाकर नरक है।
       डॉ. विनय कुमार पाठक ने लिखा है - समकालीन भारतीय साहित्य में स्त्री - विमर्श और दलित - विमर्श भारतीय समाज की विसंगतियों की उपज है। इसमें पहली चीज तो स्त्रीयों और दलितों में अपने प्रति किये जाने वाले अन्याय का प्रतिकार करना ही है। और यह तथ्य हर दलित या कमजोर जमात की लड़ाई बन रहा है। आज के बदले हुए परिवेश में स्त्रियों और दलितों से जुड़े सवालों की अनदेखी करना तो अब असंभव ही हो गया है। क्योंकि इससे असंख्य लोगों की कम ज्यादा भागीदारी है। भारत में मानवीयता और दनितोहसर का संबंध वर्ण व्यवस्था को नारी पराधीनता से रहा है। इन दोनों का सम्बंध अन्योन्याकित है। इसीलिए भारत में जब - जब कोई मानवीय विचारधारा लोकप्रिय और व्यापक आन्दोलन को जन्म देती है तब - तब उससे प्रेरित साहित्य वर्ण व्यवस्था और नारी पराधीनता पर प्रहार करता है। ये आन्दोलन अवर्ण जातियों और नारियों को सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय भी करते हैं। अवर्ण जातियों के कवियों के साथ कवित्रियां भी। इसीलिए विशेष रुप से भक्तिकाल और आधुनिक काल में ही दिखलाई पड़ती है। नारी और शुद्र दोनों मनुष्य ही होते हैं। नारियां पुरुषों से और दलित सवर्णों से हीन नहीं होते। सामाजिक व्यवस्था में इन्हें हीन बना रखा है। सामंती व्यवस्था ने इन दोनों को दलित व शोषित बनाया है। हमारे यहां धर्मग्रन्थों में नारी और शुद्र दोनों का सह उल्लेख बहुत मिलता है। सामंती समाज में नारी और भूमि को एक ही दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन आज यह स्थिति नहीं है। उसमें धीरे - धीरे परिवर्तन हो रहा है। स्त्री - विमर्श उसी परिवर्तन का जीवंत दस्तावेज है। समकालीन स्त्री सारे बन्धनों को तोड़कर आजादी प्राप्त करना चाहती है। स्त्री के संदर्भ में विचार करते हुए डॉ. इन्द्रबहादुर सिंह ने लिखा है - नारी केवल मांस पींड की संज्ञा नहीं है। आदिकाल से आज तक विकासपथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी यात्रा को सरल बनाकर उसके अभिशापन को स्वयं झेलकर और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शक्ति भरकर माननीय ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है उसी का पर्याय नारी है। आपने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पुन: कहा है - प्रत्येक कार्य में मंत्री के समान सलाह देने वाली सेवादि में दासी के समान काम करने वाली, भोजन कराने में माता के समान पथ्य भोजन कराने वाली, शयन के समय रम्भा के समान सुख देने वाली और धर्म के अनुकुल तथा क्षमादि गुण धारण करने में पृथ्वी के सदृश ऐसे छह गुणों से युक्त स्त्री की देह सम्पदा में पुरुष का शास्वत सुख रचा - बसा है।
       डॉ. इन्द्रबहादुर सिंह का उक्त विचार उनका स्वयं का विचार नहीं है यह विचार परंपरित सामंती युग का विचार है। डॉ. विनयकुमार पाठक इस विचार को स्वीकार नहीं करते। आज की स्त्री देवी के रुप को स्वीकार नहीं करती वह युग के अनुसार मानवीय बनकर रहना चाहती है। वह दूसरों के शोषण में विश्वास नहीं करती और न स्वयं को शोषण का पात्र बनने देती है।
  • पता - ग्राम - फरहद ( सोमनी ) जिला - राजनांदगांव (छ्.ग.)

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