इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 1 जुलाई 2013

कथावाचन परम्परा

- वी. के. शुक्ल  -

       श्रोता तत्काल समाधान कर लेता है कि भगवान श्री राम के लिए भी रात तक राज्य देने की बात थी और सुबह बनवास दिया गया तब यह मेरे लिये कोई नई बात नहीं है।
कथाओं में जहां दार्शनिक वर्णन, सृष्टि की रचना, जीवन का यथार्थ जीने की कला आदि की चर्चा होती है वही जन और समाज के स्थापना हेतु अनेक नीति परक चर्चाएं होती है नीति सामाजिक व्यवस्था का एक अंग है।
       कथाओं के माध्यम से ही संयुक्त परिवार में रहकर क्या व्यवहार होना चाहिए, समाज राष्ट्र के प्रति हमारा क्या दायित्व है, बड़ों के प्रति आदर भाव, मित्रों में समानता का व्यवहार और छोटो से मिलकर किस प्रकार जीवन का निर्वाह किया जाय, ये सब अंग परिपूरित होते हैं।
        महापुरूषों के द्वारा किये गये कर्म कथाओं के माध्यम से किस प्रकार जीवन पर नियंत्रण करते हैं इस संबंध में श्रीराम, श्रीकृष्ण, उनके समकालीन पार्षद अंगद, हनुमानजी, अर्जुन, द्रौपती, कुन्ती, विदुर आदि की कथाएं केवल धार्मिक नहीं अपितु लोक कल्याणकारी हैं, जिसे समाज के सामने प्रस्तुत करने से समाज जहां सुदृढ़ होता है वहीं मनुष्यों का निर्भीक जीवन यापन भी होता है।
       कथाएं जहां कुछ तो यथार्थ और घटित होती है वहीं कुछ संभावनाओं पर भी आधारित हैं। समाज में स्वर्ग - नरक और वहां पर घटित घटनाओं को कथा के माध्यम से समाज में प्रस्तुत कर बड़े - बड़े अपराधों से समाज को बचाया जा सकता है। जैसे निर्धन व्यक्ति को पुराणों के माध्यम से इस प्रकार आश्वस्त किया जाता है कि पूर्वजन्म में कुछ नहीं दिया गया इसलिये कुछ नहीं मिल पा रहा है। किसी व्यक्ति के वस्तु की अकाल चोरी हो जाय तो कथाओं के माध्यम से उसे यह आश्वासन मिलता है कि निश्चय ही अतीत में मैंने किसी भी वस्तु का अपहरण किया होगा। बड़े - बड़े रोगों एवं आपदाओं में फंसे लोग दूसरों को यह कहते  सुने जाते हैं कि हमने अवश्य ही किसी को क्षति पहुंचाई है या कष्ट दिया है जिसके कारण हमें भी कष्ट भोगना पड़ रहा है। जैसे - किसी मधुमेह के रोगी को चिकित्सक मीठा खाने से मना कर देता है तो उस समय वह रोगी यह कहता है कि हमने किसी मीठी वस्तु को खा ली होगी या किसी को मीठी वस्तु न दी होगी इसीलिए मुझे मधुमेह हो गया। समाज को इससे यह लाभ हुआ कि कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु को बिना बांटे नहीं खाता। इससे समाज को एक दिशा - निर्देश मिलती है।
       कथाओं के प्रभाव से न केवल मानव जाति को लाभ होता है अपितु प्राणी जगत में पक्षी आदि भी परस्पर कथा कहते सुनते रहे, इसकी भी चर्चा भारतीय शास्त्रों में है। जैसे - व्यासनन्दन महायोगी समदर्शी, विकल्प शून्य, एकान्मति श्रीमद् भागवत के गायक सुकदेव जी के संबंध में एक कथा प्रसिद्ध है - एक बार भगवान भगवान शिव पराम्बा भगवती पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। पार्वती जी बीच में हुंकारू भर रही थी परन्तु कथा के मध्य में कुछ ही समय पश्चात शंकरप्रिया निद्राविभूत हो गयी।
        संयोगवश एक सूक भी वहां बैठकर कथा श्रवण कर रहा था। जब पार्वती जी सो गई तब वही सूक - शावक ने हुंकारी भरना शुरूकर दिया। इसीलिए शंकर जी को पार्वती जी के सो जाने का पता न चला और उनके द्वारा अमर कथा का अनवरत प्रवाह चलता रहा। इस प्रकार उस शूक ने पूरी कथा सुन ली। इधर जब पार्वती जी जागी तो उन्होंने अपने प्राण वल्लभ से कहा - प्रभु इस वाक्य के बाद मैंने अमर कथा नहीं सुनी है क्योंकि मुझे नींद आ गई थी तब देवाधिदेव शंकर की आश्चर्य सीमा न रही। उन्होंने उपस्थित अपने गणों से कहा - आखिर कथा के मध्य में हुंकारी कौन भर रहा था। शीघ्र पता लगाओ। गणों ने वृक्ष पर बैठे शूक शावक की ओर इशारा किया। तब शंकर जी उसे मारने के लिए त्रिशुल लेकर दौड़ पड़े। वह शूक उड़ता हुआ व्यास आश्रम में पहुंचा और जम्हाई लेती हुई व्यास पत्नी वट्टिका के मुख में प्रवेश कर गया। शिवजी ने वहां पहुंचकर कहा - मैं वट्टिका का इस त्रिशुल से संहार करना चाहता हूं। व्यास जी ने पूछा - इसका अपराध क्या है ? तब शिवजी ने कहा इसके मुख में प्रविष्ट शूक ने अमर कथा सुन ली है। यह सुनकर व्यास जी मुस्कुराते हुए बोले - प्रभु, तब तो वह अमर हो गया। जो जैसी कथा सुनेगा वह वैसा ही हो जायेगा। अमर कथा सुनने वाला अमर हो गया। भगवान शिव निरूत्तर हो गये और लौट गए। वही शूक व्यास की पत्नी के गर्भ में बारह वर्षों तक निवास करता रहा। पत्नी को पीड़ित और बालक को गर्भ में ही स्थित देखकर व्यास जी ने दिव्य दृष्टि से देखकर उसे संबोधित किया - गर्भस्थ शिशु, बाहर क्यों नहीं आते। माँ व्यथित है। गर्भस्थ शिशु ने कहा - महर्षे, बाहर में माया व्याप्त है। मैं भी माया में आलिप्त हो जाऊंगा। अत: मुझे गर्भ में ही रहने दो। व्यास जी ने कहा - वत्स, तुम अमर कथा सुन चुके हो। अत: तुम्हें माया और मृत्यु दोनों छू नहीं सकेगी। भगवान श्री कृष्ण माया से तुम्हारी रक्षा करेंगे। कुछ दिनों बाद उसी बालक का जन्म हुआ।
       वही शूक आज भी अमर है। उस अमर कथा का प्रभाव है कि उनके मुख से निकली हुई भगवती गाथा से तक्षत द्वारा काटे गये अपमृत्यु जनित दोष से महाराज परीक्षित की मुक्ति हो गई।
       कथा न केवल चैतन्यावस्था में अपितु गर्भावस्था में भी लाभकारी है। इसके प्रमाण प्रहलाद और अभिमन्यु हैं। जब प्रहलाद जी के मित्रों ने प्रहलाद से पूछा - न तो आपने कभी कोई दूसरा गुरू बनाया न एकान्त में स्वाध्याय किया। हमारे साथ ही इसी गुरूकुल में पढ़े किन्तु यह अलौकिक अध्यात्म ज्ञान आपको कैसे प्राप्त हुआ ? प्रहलाद ने कहा - मेरी माँ को नारद जी ने मेरी गर्भावस्था में जिन कथाओं और उपदेशों को सुनाया था वे सब कथाएं मुझे ज्यों की त्यों स्मरण हैं। उसी का लाभ मैं पा रहा हूं।
       यही बात उस समय भी स्पष्ट होती है जब महाभारत के युद्धकाल में अर्जुन दूर थे और द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना कर पाण्डवों को संकट में डाल दिया था। उस समय पराक्रमी अभिमन्यु ने साहसपूर्वक घोषणा किया कि चक्रव्यूह भेदन मैं करूंगा। लोगों के द्वारा यह पूछे जाने पर कि सोलह वर्ष की अवस्था में इस दुर्गम व्यूह को भेदने की दुरूह विद्या तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुई तो उन्होंने कहा कि मेरे गर्भावस्था में मेरी माँ को मेरे पिता धंनजय ने चक्रव्यूह भेदने की विद्या कथा के माध्यम से सुनाई थी किन्तु छ: द्वार तोड़ने की कथा सुनने के बाद माँ विचलित हो गई और मैं पूरी कथा नहीं सुन सका इसलिये मेरे द्वारा केवल छ: द्वार ही भेदे जा सकते हैं। इस प्रकार इन आख्यानों से भी जो लाभ होते हैं वह वर्णनातीत है।
       जब कथाकार या कथावाचक वर्णन करता है तो उसके शब्द, भाव और प्रसंगानुकूल शैली श्रोता पर गहन प्रभाव डालते हैं। पढ़ने पर वही विषय पाठक के मन पर वैसा प्रभाव नहीं डाल सकते, कथा सुनने पर भाव प्रवीणता के आधार पर श्रोता के ऊपर विषय का प्रभाव आधारित होता है। उसी विषय को पढ़कर पाठक स्वयं श्रोता और स्वयं वक्ता होता है तो उसके निजी भाव ही उसको परिधि पर पहुंचाते है किन्तु उसी विषय को जब कथावाचक अपने भावों के साथ वर्णन करता है तो श्रोता को अनुपम आनंद और ज्ञान की उपलब्धि होती है।  इसीलिये कथा सुनने में जो आनंद  की रसानुभूति होती है वह श्रोता के चरित्र निर्माण और जीवनयापन का सम्बल होता है।
       जब श्रोता वक्ता के प्रति आदर और विश्वास का भाव लेकर उस कथा को सुनता है तो तर्क और शंकाएं नहीं रह जाती तथा आस्था व विश्वास सुदृढ़ हो जाते हैं। कथावाचन की महत्ता को गोस्वामी तुलसीदास जी के निम्न पंक्तियों में कहना श्रेष्ठतम होगा -
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करही।
भव बारिधि गोपद इव तरही।।
       अर्थात कथा का उभय पक्षी लाभ होता है। इससे कथाकार और श्रोता दोनों लाभान्वित होते हैं।

बिलासपुर, ( छ.ग.)

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