इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 13 जुलाई 2013

निज भाषा उन्‍नति है,सब भाषा मूल



  • -  जया केतकी -
       विचारों के आदान प्रदान में अपनी भाषा का जो प्रभाव है वह किसी अन्य भाषा का नहीं। जब हम परेशानी में होते हैं तब जो भी बोलते हैं अपनी भाषा में ही बोलते हैं, वैसे चाहे हम कितनी भी भाषाओं के ज्ञाता हों। एक बार अनेक भाषाओं का ज्ञाता राजा विक्रमादित्य के दरबार में आया। उसने नगर की जनता की समस्याओं का कई दिनों तक उन्हीं की भाषा में निराकरण किया। जो जिस भाषा में प्रश्न करता,ज्ञानी उसी भाषा में उसका जवाब देता। राजा परेशान था कि इसकी वास्तविक भाषा कौन सी है।
       राजा ने राज्य के विद्वान कालीदास को बुलाया और अपनी चिंता व्यक्त की। कालीदास ने एक दिन का समय मॉंगा। अगले दिन दरबार में नगरवासी अपनी समस्याओं के साथ बैठे थे। राजा भी आ गए। कालीदास दरबार के द्वार पर खड़े हो गए। जैसे ही वे सज्जन आए। कालीदास ने अपनी टॉंग उनके पैरों में अड़ा दी। वह व्यक्ति गिर पड़ा। गिरते ही अपनी भाषा में जोर - जोर से गाली देने लगा। कालीदास ने क्षमा मॉंगते हुए उन्हें उठाया और कहा महाराज यही इनकी असली भाषा है।
       इस कहानी को यहॉं बताने का कारण केवल यह है कि हम जीवन में कितनी भी भाषाओं का प्रयोग कर अपने विचारों का विस्तार करें पर जो भाषा हमारे सबसे करीब होती है वह हमारी मातृभाषा ही होती है।
       सामान्यत: भाषा को वैचारिक आदान - प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। जब से मानव अस्तित्व में आया तब से ही भाषा का उपयोग कर रहा है चाहे वह ध्वनि के रूप में हो या सांकेतिक रूप में या अन्य किसी रूप में। भाषा हमारे लिए बोलचाल का माध्यम है। संप्रेषण का माध्यम होती है।
       किसी प्रदेश की राज्य सरकार के द्वारा उस राज्य के अंतर्गत प्रशासनिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, उसे राज्यभाषा कहते हैं। यह भाषा सम्पूर्ण प्रदेश के अधिकांश जनसमुदाय द्वारा बोली और समझी जाती है। प्रशासनिक दृष्टि से सम्पूर्ण राज्य में सर्वत्र इस भाषा को महत्व प्राप्त है। भारतीय संविधान में राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए हिन्दी के अतिरिक्त 21अन्य भाषाएं राजभाषा स्वीकार की गई हैं। राज्यों की विधानसभाएं बहुमत के आधार पर किसी एक भाषा को अथवा चाहें तो एक से अधिक भाषाओं को अपने राज्य की राज्यभाषा घोषित कर सकती हैं। ये सब सुविधानुसार बनाए गए नियम हैं जो आवश्यकतानुसार बदले भी जा सकते हैं।
       भाषा के द्वारा विचार व्यक्त करते हैं। बातचीत करते हैं। दूसरों के विचार सुनते हैं। सही है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज का निर्माण मनुष्यों के पारस्परिक सहयोग से होता है। समाज में रहते हुए मानव आपस में अपनी इच्छाओं तथा विचारों का आदान - प्रदान करता है। विचारों को व्यक्त करने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है। अत: हम यह कह सकते हैं कि जिन ध्वनियों द्वारा मनुष्य विचार विनिमय करता है उसे भाषा कहते हैं। सार्थक ध्वनियों का समूह जो हमारी अभिव्यक्ति का साधन हो भाषा कहलाता है।
भाषा के साथ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा केवल ध्वनि से व्यक्त नहीं होती। संकेत तथा हाव- भावों से भी व्यक्त होती है। चेहरे की आकृति में परिवर्तन तथा अँगुलियाँ हिलाना। चित्र बनाकर संकेत करना। अब प्रश्न यह है कि क्या किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाया जा सकता है। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में विस्तार पाती है। संपूर्ण देश में यह संपर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लाई जाती है।
       विचार करें भाषा का निर्धारित होना राष्ट्र के लिए क्यों आवश्यक है? भाषा राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो एक भाषा होना चाहिए। इससे धार्मिक तथा सांस्कृतिक एकतारूपता बढ़ती है। प्रत्येक विकसित तथा स्वाभिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है जिसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त होता है।
       किस भाषा को राष्ट्रभाषा बनाया जा सकता है? किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में बोली- लिखी- पढ़ी और सुनी जाती है। संपूर्ण देश में यह संपर्क भाषा व्यवहार में लाई जाती है।
       राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावनात्मक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक एकता के साथ वैचारिक समरूपता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है। इसे बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होती है। हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी भारत के प्रमुख राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख रूप से बोली जाती है।
       राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। वह अधिकाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा होती है। प्राय: राष्ट्रभाषा ही किसी देश की राजभाषा होती है। भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए लिपियों की सहायता ली जाती है। भाषा और लिपि भाव व्यक्तीकरण के दो अभिन्न पहलू हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है। दो या अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है । उदाहरणार्थ पंजाबी, गुरूमुखी तथा शाहमुखी दोनों में लिखी जाती है जबकि हिन्दीए मराठी संस्कृत नेपाली इत्यादि सभी देवनागरी में लिखी जाती है।
       जो देश किसी अन्य देश की भाषा अपने देशवासियों पर थोपे, वह किसी बात में स्वाधीन नहीं होता। उसका दोहरा चरित्र औपनिवेशिक बन जाता है। यही पारदर्शिता की कसौटी है कि किसी भी समुदाय के लोग जिन्हें हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने में आपत्ति है। वह भारतवर्ष को फिर से विभाजन के कगार तक जरूर पहुँचाएँगे।
       लार्ड मैकाले का मानना था कि जब तक संस्कृति और भाषा के स्तर पर किसी भी देश को गुलाम नहीं बनाया जाएगा तब तक उसे पूरी तरह गुलाम बनाना संभव नहीं होगा। लार्ड मैकाले की सोच थी कि हिंदुस्तानियों को अँग्रेजी भाषा के माध्यम से ही सही और व्यापक अर्थों में गुलाम बनाया जा सकता है।
       उसने अंग्रेजी को व्यवसायिक भाषा का दर्जा देकर भारतीय बाजार को मानसिक रूप से गुलाम बनाया। अंग्रेजी को शासन की भाषा बनाए रखने के लिए उसी ने जोर दिया। उसे डर था अन्यथा विदेशी वर्चस्व जाता रहेगा और देश को अंग्रेजी की ही शैली में शासित करने की योजनाएँ कभी सफल नहीं होंगी।
       अंग्रेजीपरस्त नेताओं के काले कारनामों के कारण अंग्रेजी को जितना बढ़ावा परतंत्रता के 200 वर्षों में मिला, उससे कई गुना अधिक महत्व तथाकथित स्वाधीनता के केवल 60 वर्षों में मिल गया और निरंतर जारी है।
       मित्रो मत भूलो गांधी जी का सपना था कि अगर भारतवर्ष भाषा में एक नहीं हो सका तो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम को आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा। भारत की प्रादेशिक भाषाओं के प्रति गांधी जी का रुख उदासीनता का नहीं था। वह स्वयं गुजराती भाषी थे। किसी अंग्रेजीपरस्त काँग्रेसी से अंग्रेजी भाषा के ज्ञान में उन्नीस नहीं थे लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम छेड़ने के बाद अपने अनुभवों से यह ज्ञान प्राप्त किया कि अगर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम को पूरे देश में एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है तो केवल हिंदी भाषा में क्योंकि हिंदी कई शताब्दियों से भारत की संपर्क भाषा चली आ रही थी। हमारे देश के कर्मठ हाथों और अडिग कलमों के कारण हमें जो आजादी मिली उसे बनाए रखने के लिए अपनी भाषा को मजबूत बनाओ।
  • पता - 45, मंसब मंजिल रोड,कोहेफिज़ा भोपाल, ( मध्यप्रदेश ) 462001

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