इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 10 जुलाई 2013

कहीं लगा खुशियों के पौधे


-  मुकुन्द कौशल -
कहीं लगा खुशियों के पौधे, और कहीं मुस्कानें बो जा।
बादल बनकर बरस झमाझम,सबके मन में

जहाँ मिले धरती अम्बर, वहीं क्षितिज निर्मित हो जाता,
आसमान बन जाता हूं मैं, आ तू मेरी धरती हो जा।

मिला किसी से दिया किसी को, सबका अंतिम लक्ष्य समर्थण ,
पाना चाहे अगर स्वयं को, तो अपने ही भीतर खो जा।

जग वाले निष्ठुर होते हैं, पर की पीर न समझे कोई,
लोगों का दिल क्या पिघलेगा, चाहे तू कितना भी रो जा।

हँसी ठहाकों की मण्डी में, आँसू का कुछ मोल न होगा,
अपने आँसू की बूँदों को शब्द बनाकर हार पिरो जा।

नीले पीले लाल गुलाबी, सपनों में खोयी है दुनिया,
तू भी सपने देख सकेगा, शर्त यही है पहले सो जा।

दिल के टुकड़ों को ले जाकर, सबको क्या दिखलाना कौशल,
तू चाहे तो $गज़लों में ही, टूटे दिल का दर्द समो जा।

पता - एम. आई.जी.  516, पद्मनाभपुर, दुर्ग - 491001  (छग.)

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