इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 10 जुलाई 2013

कहीं लगा खुशियों के पौधे


-  मुकुन्द कौशल -
कहीं लगा खुशियों के पौधे, और कहीं मुस्कानें बो जा।
बादल बनकर बरस झमाझम,सबके मन में

जहाँ मिले धरती अम्बर, वहीं क्षितिज निर्मित हो जाता,
आसमान बन जाता हूं मैं, आ तू मेरी धरती हो जा।

मिला किसी से दिया किसी को, सबका अंतिम लक्ष्य समर्थण ,
पाना चाहे अगर स्वयं को, तो अपने ही भीतर खो जा।

जग वाले निष्ठुर होते हैं, पर की पीर न समझे कोई,
लोगों का दिल क्या पिघलेगा, चाहे तू कितना भी रो जा।

हँसी ठहाकों की मण्डी में, आँसू का कुछ मोल न होगा,
अपने आँसू की बूँदों को शब्द बनाकर हार पिरो जा।

नीले पीले लाल गुलाबी, सपनों में खोयी है दुनिया,
तू भी सपने देख सकेगा, शर्त यही है पहले सो जा।

दिल के टुकड़ों को ले जाकर, सबको क्या दिखलाना कौशल,
तू चाहे तो $गज़लों में ही, टूटे दिल का दर्द समो जा।

पता - एम. आई.जी.  516, पद्मनाभपुर, दुर्ग - 491001  (छग.)

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