इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 10 जुलाई 2013

आकांक्षा यादव की दो लघुकथाएं


अधूरी इच्छा

आज शाम से ही उमा आंसुओं की बरसात में भीगी जा रही थी। रमेश के बार - बार समझाने पर भी उसका मन नहीं बहल रहा था। बस बार - बार वह उस पल को कोस रही थी जब उसने अल्ट्रासाउंड कराकर भ्रूण की हत्या करवाई थी।
आज भी उसे वो दिन अच्छी तरह याद है जब उसने सुना कि उसके गर्भ में लड़की है तो उसने अपनी डाक्टर से कहा कि उसका अबार्शन करवा दें। डाक्टर ने उसे समझाया भी कि यह उसकी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा और अबॉर्शन कराना गलत है। पर उस पर तो मानो पागलपन सवार था। अंतत: उसने एक दूसरी डाक्टर  ढूंढ ही लिया, जो पैसे लेकर अबार्शन करती थी। कितनी खुश थी वह उस दिन, मानो अपना अंश नहीं बल्कि शरीर का कोई फोड़ा निकलवाकर आई हो। चहकते हुए उसने रमेश से कहा था कि इस बार हम शुरू से ही पूरा ध्यान रखेंगें कि लड़का ही पैदा हो।
वक्त पहिये लगाकर चलता रहा। जब कई महीने बाद भी उसे गर्भ नहीं ठहरा तो डाक्टर के पास पहुँची। डाक्टर ने उसके कई चेकअप कराये पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। डाक्टर ने उसे गौर से देखा और कहा -  सारी, अब आप कभी माँ नहीं बन सकतीं।
- लेकिन डाक्टर साहिबा,भला ऐसा कैसे हो सकता है ?
- मैंने तो आपको पहले ही समझाया था पर आप नहीं मानीं।
ऐसा लगा मानो उसके ऊपर वज्रपात हो गया हो। उसका सारा शरीर सुन्न सा पड़ गया। उसके सारे अरमान एक ही पल में बिखर गए। अगर उस दिन यह भारी भूल न की होती तो आज वह भी माँ बन चुकी होती। लेकिन अब तो ताउम्र यह बांझपन उसके साथ रहेगा।
अचानक उसे लगा कि कोई उससे चीख - चीख कर कह रहा है - आखिर तुमने मुझे क्यों मारा। मैं भी तो तुम्हारा ही अंश थी। उसने अपना चेहरा दोनों हाथों के बीच छुपा लिया और जोर - जोर से रोने लगी। डाक्टर ने उसे ढांढस बँधाया था।
उसने सिसकते हुए यही कहा था कि डाक्टर साहिबा, मेरी आपसे एक विनती है कि अब आपसे कोई भी माँ कभी अबार्शन के लिए कहे तो उसे मेरी ये दास्तां जरूर सुनाना। हो सकता है मेरी ये दुर्दशा समाज को आइना दिखा सके और उसके हाथों होने वाले पाप से वह मुक्त हो जाय।

काला आखर

बचपन से लिखी गयी कविताओं को काव्य.संग्रह रूप में छपवाने का मालती का बहुत मन था। इस विषय में उसने कई प्रकाशकों से संपर्क भी किया, किन्तु निराशा ही मिली। मालती कालेज में हिन्दी की प्रवक्ता के साथ - साथ अच्छी कवयित्री भी थी। काफी प्रयास के पश्चात एक प्रकाशक ने मालती के काव्यसंग्रह का प्रकाशन कर ही दिया। मालती के कालेज के प्रेक्षागार में ही इस काव्यसंग्रह के विमोचन की तैयारी भी प्रकाशक ने अपनी ओर से कर दी।
आज कालेज के अनेक सहकर्मी सुबह से मालती को उसके प्रथम काव्य संग्रह के प्रकाशन और मंत्री जी द्वारा प्रस्तावित विमोचन की बधाई दे रहे थे। मालती का मन नहीं था कि इस काव्य संग्रह का विमोचन मंत्री जी करें। इसकी बजाय वह विमोचन किसी वरिष्ठ साहित्यकार द्वारा चाहती थी ताकि साहित्य जगत में उसके प्रवेश को गम्भीरता से लिया जाय और इस संग्रह के बारे में चर्चा हो सके। किन्तु प्रकाशक ने उसे समझाया कि इस काव्य संग्रह का मंत्री जी द्वारा विमोचन होने पर पुस्तकों की बिक्री अधिक होगी। लाइब्रेरी तथा सरकारी संस्थानों में मंत्री जी किताबों को सीधे लगवा भी सकते हैं। आगे इससे फायदा ही फायदा होगा। देर शाम तक मंत्री जी अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकाल कर कालेज के प्रेक्षागार में तीन घण्टे देरी से पहुँचे। मंत्री जी के पहुँचते ही हलचल आरम्भ हुई और मीडिया के लोगों ने फ्लैश चमकाने शुरू कर दिये। संचालक महोदय मंत्री जी की तारीफों के पुल बाँधते जाते, जिससे वे और भी प्रसन्न नजर आते। अन्त में मंत्री जी ने मालती की पुस्तक का विमोचन किया। विमोचन के पश्चात मालती ने उपस्थित दर्शकों की तालियों के साथ अपनी प्रथम प्रकाशित काव्य संग्रह की प्रतियाँ अन्य विशिष्टजनों को भी उत्साह के साथ भेंट की। अपने इस पहले काव्य संग्रह के प्रकाशन से मालती बहुत खुश थी। मंत्री जी ने पुस्तक का विमोचन करने के बाद उसे मेज पर ही रख दिया और उपस्थित जनों को सम्बोधित करते हुये लम्बा भाषण दे डाला। मालती सोच रही थी कि अब मंत्री जी उसे विमोचन की बधाइयाँ देंगे पर मंत्री जी तो अपनी ही रौ में बहते हुए स्वयं का स्तुतिगान करने लगे। सम्बोधन के पश्चात मंत्री जी सबका अभिवादन स्वीकार करते हुये बाहर निकल गये। मंत्री जी और उनके स्टाफ ने विमोचित पुस्तक को साथ ले जाने की जहमत भी नहीं उठाई। मालती उस प्रेक्षागार में अब अकेली रह गयी थी। उसने चारों ओर देखा तो जिस जोश से उसने खद्दरधारी लोगों को पुस्तकें भेंट की थी, उनमें से तमाम पुस्तकें कुर्सियों पर पड़ी हुई थीं और कई तो जमीन पर बिखरी हुई थीं। वह एक बार उन पुस्तकों को देखती और दूसरे क्षण उसके कानों में प्रकाशक के शब्द गूँजते कि मंत्री जी द्वारा विमोचन होने पर पुस्तकों की बिक्री अधिक होगी।

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