इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

ममतामयी मिनीमाता : तीन यादें




- दादू लाल जोशी ' फरहद '
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ममतामयी मिनीमाता आज हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनसे जुड़ी हुई, कुछ भूली-बिसरी यादें यदाकदा हमारे मनोमस्तिष्क में उभरती हैं। तब महसूस होता हैं कि उनका व्यक्तित्व कितना सहज, सरल लेकिन विराट था। उनकी वाणी मधुर और व्यवहार ममतापूर्ण व स्निग्ध होते थे। उनके सान्निध्य में बहुत कुछ सीखने समझने को मिलता था।
यह मेरा सौभाग्य ही था क तीन मर्तबा भेंट करने का अवसर मुझे मिला। उन तीन मुलाकातों में उनसे कुछ न कुछ शिक्षा मुझे अवश्य मिली थी।
मिनीमाता जी से जब मेरी प्रथम मुलाकात हुई थी तब मैं मात्र पंद्रह वर्ष का था। शायद उस समय मैं सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था। मुझे हल्की सी याद है, यही कोई सितंबर या अक्टूबर का महीना था। संध्या के चार बजे सोमनी के बस स्टॉप पर एक बस आकर रुकी। उस बस में अन्य यात्रियों के साथ एक गोरी और सामान्य कदकाठी की पतली सी महिला उतरी। बार्डर युक्त सफेद साड़ी और गहरे हरे रंग के ब्लाऊज में उस महिला का चेहरा दमक रहा था। ओठों में मधुर मुस्कान लिये उन्होंने थोड़ी देर खड़ी होकर इधर-उधर देखा। तभी लगभग दस-बारह व्यक्ति अपने-अपने चप्पलों को पैरों से झटका देकर पीछे की ओर फेंक दिये और उस महिला की ओर दौड़ पड़े। वे सब अपने सिरों को उस महिला के चरणों पर टिकाते गये। महिला सबको दीर्घायु होने का आशीर्वाद दे रही थी। अद्भुत था वह दृष्य। मैंने पहली बार किसी का इतने समर्पित श्रद्धाभाव से सम्मान होते देखा था। मैं अभिभूत हो आश्चर्य के साथ उस अविस्मरणीय दृष्य को देख रहा था। मेरे साथ ही वहाँ पर उपस्थित अन्य नर-नारी  भी विस्मय से वह नजारा देख रहे थे। थोड़ी देर में ही और दस-पंद्रह लोग वहाँ आ गये थे, उनके ही मुँह से सुना कि - वह महिला मिनीमाता थी।
बस स्टॉप में ही सड़क के किनारे एक बैलगाड़ी खड़ी थी। उस पर थोड़ा सा पैरा रखा था और उसके ऊपर एक नई स्वच्छ चादर बिछी हुई थी। सहसा मैंने मेरे ज्येष्ठ पिता स्व. श्री भारत दास जी गौटिया को बैलगाड़ी के पास से आते हुए देखा। उन्होंने माता जी के पास आकर उनका चरण स्पर्ष किया और कहा - माता जी! बैलगाड़ी तैयार हे, चलव बइठौ।''
यह सुनकर माताजी ने कहा - गाँव ह तो नजदीक म हवै गा, रेंगत चल देबों। गाड़ी के जरूरत नई हे।''
माता जी की बात को सुनकर सभी लोग एक साथ बोल पड़े - नहीं माता! रेंगत काबर जाहू? चलौ, गाड़ी म बइठौ।''
लोगों के आग्रह को माता जी टाल नहीं सकीं। वे गाड़ी में बैठ गई। बैलगाड़ी चल पड़ी। उसके पीछे-पीछे सभी लोग पैदल चलने लगे। वह प्रभावशाली, गरिमामयी माता जी मेरे ही घर जा रही हैं; यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई। दूसरे दिन पूरे समय माता जी और मेरे ज्येष्ठ पिता स्व. भारतदास जी गौंटिया के बीच किसी खास समस्या पर गंभीर चर्चा होती रही। ज्येष्ठ पिता स्व. भारतदास जी मालगुजारी प्रथा के अंतर्गत ग्राम फरहद के अंतिम मालगुजार थे। यह गाँव छोटा सा है। इस गाँव में पिछली कई सदियों से हमारा परिवार मालगुजारी करते आ रहे थे। इसलिये लोगबाग हमारे परिवार के सभी सदस्यों को गौंटिया ही कहा करते थे। मेरे पिता जी को मिलाकर वे लोग चार भाई थे। सबसे बड़े स्व. भारत दास जी गौंटिया, उसके बाद स्व. नारद दास जी (जिनकी मृत्यु बहुत पहले ही हो चुकी थी) उसके बाद तीसरे क्रम में मेरे पिता जी स्व. खेदू राम जी तथा चौंथे क्रम में चाचा स्व. श्री छोटे लाल जी (पटवारी) थे। मालगुजारी प्रथा को देखने और भोगने वाले वे चारों अब सतलोकवासी हो चुके हैं। उनके साथ ही मालगुजारी प्रथा के सारे आन बान और माल भी समाप्त हो चुके हैं। कभी -कभी यह बात मजाक में मैं अपने भाइयों के बीच बोल देता हूँ कि मालगुजारी का सारा माल तो कब का गुजर गया है, अब केवल गुजारा ही बाकी है। यह सुनकर सब हँस देते हैं। खैर! इन बातों को यहाँ प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किन्तु ' गौंटिया ' शब्द आने के कारण ही प्रसंगवश इन बातों का उल्लेख करना पड गय़ा। इसके लिये पाठक गण मुझे क्षमा करेंगे। वैसे संस्मरण लिखते समय इस तरह की कुछ निजी बातों का उल्लेख आ ही जाता है।
माता जी तीसरे दिन मोवा (रायपुर) चली गई। पहली ही मुलाकात में उनकी पैदल चलने की इच्छा से मैं बहुत प्रभावित हुआ और यह समझा कि व्यक्ति चाहे कितने ही ऊँचे पद पर पहुँच जाय; कितनी ही संपत्ति का मालिक बन जाय; उसे अपना काम स्वयं करना चाहिये तथा शारीरिक श्रम से जी नहीं चुराना चाहिये। साथ ही अपने समर्थकों से तथा समाज से बहुत ज्यादा सुविधा व मान-सम्मान पाने की कामना भी नहीं करनी चाहिये।
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मिनीमाता जी से मेरी दूसरी मुलाकात भी मेरे ही परिवार के मध्य हुई थी। प्रथम मुलाकात से यही कोई डेढ़- दो वर्ष बाद की बात है। एक दिन दोपहर के समय मैंने ज्येष्ठ पिता के मकान में प्रवेश किया। बरामदे (छपरी) में आराम कुर्सी (इजी चेयर) में माता जी विराजमान थी। बाजवट (लकड़ी का बिना डिब्बे वाला वर्गाकार दीवान) पर मेरे ज्येष्ठ पिता स्व. श्री भारत दास जी बैठे थे। पास ही एक कुर्सी पर सोमनी निवासी डॉ. मुरलीमनोहर मिश्र जी एक बच्चे की नाड़ी परीक्षण कर रहे थे। डॉ. मुरलीमनोहर मिश्र सोमनी के अतराब में बेहद ख्यातिलब्ध एवं सिद्धहस्त चिकित्सक माने जाते रहे हैं। छ: फुट लंबे गौर वर्ण के भरे पूरे सुडौल गात के स्वामी डॉक्टर साहब का व्यक्तित्व अतिशय भव्य है। वे कुशल चिकित्सक तो हैं ही, सिद्ध कवि भी हैं। उनकी वाणी मधुर किन्तु ओजपूर्ण है। उनका शालीन विनोदी व्यवहार और बात-बात में ' धन्यवाद' कहना उनके व्यक्तित्व की निराली विशेषता है।
डॉक्टर साहब के क्रियाकलाप को मिनीमाता जी काफी देर से अवलोकन कर रही थी। अचानक माता जी ने प्रश्न किया - डॉक्टर साहब क्या आप नाड़ी छूकर हर तरह की बीमारियों को पहचान लेते हैं?''
- आफकोर्स! निश्चय ही।'' डॉक्टर साहब ने जवाब दिया।
- अब तो रोग परीक्षण के आधुनिक यंत्रों का इज़ाद हो चुका है, फिर भी आप प्राचीन पद्धति का ही सहारा लेते हैं?'' माता जी ने फिर प्रश्न किया।
आधुनिक यंत्रों का भी उपयोग हम करते हैं किन्तु आयुर्वेद के अनुसार शरीर में बिमारियों की उत्पत्ति त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के विकृत अथवा असंतुलित हो जाने के कारण होती है, जिनका प्रभाव हृदय पर भी पड़ता है। उसके स्पंदन की गति को नाड़ी के स्पर्ष के द्वारा मालूम कर लेते हैं। जिससे बिमारी किस दोष के कारण पैदा हुई हैइसका पता चल जाता है। यह भी वैज्ञानिक विधि ही है।'' डॉक्टर साहब ने कहा।
- ठीक है, अपना-अपना तर्क है। हाँ, डॉक्टर साहब! कल से मुझे जुकाम हो गया है। सिर में दर्द है। कोई अच्छी सी दवा हो तो दीजिये।'' मिनीमाता जी ने कहा।
डॉक्टर साहब ने बैग से दवा (पन्नी में पैक टेबलेट) निकाली और माता जी को देकर उसे लेने की विधि भी समझा दी।
- दवा का चार्ज (कीमत) क्या है?'' माता जी ने पूछा।
- ओह! नो चार्ज। मुफ्त में दे रहे हैं आपको।'' डॉक्टर साहब ने कहा।
- दवा तो मुफ्त मिलती नहीं है, इसलिये पैसे (चार्ज) तो आपको लेना ही होगा।'' मिनीमाता ने दृढ़ता के साथ कहा।
- धन्यवाद! धन्यवाद! पैसे लेने का का तो प्रश्न ही नहीं है। हम आपको इसे भेट स्वरूप दे रहे है। धन्यवाद।'' डॉक्टर ने भी आग्रह के साथ कहा।
- वाह डॉक्टर साहब! दवा भी मुफ्त दे रहे हो और धन्यवाद भी आप ही दिये जा रहे हैं। धन्यवाद के पात्र तो आप हैं।'' मिनीमाता ने हँसकर कहा।
यह घटना बहुत साधारण सी ही थी। किन्तु इसमें निहित शिक्षा काफी महत्वपूर्ण थी। उससे मैंने जाना कि कभी भी किसी से कोई वस्तु मुफ्त में ग्रहण नहीं करना चाहिये। यदि विवशतावश कीमत स्वरूप किसी तरह का प्रतिदान न दे सकें तो कम से कम धन्यवाद तो देना ही चाहिये तथा आभार मानना चाहिये। इस तरह हम देने वाले के अहसानों तले दबेंगे भी नहीं और मुफ्तखोरी का हम पर इल्जाम भी नहीं लगेगा।
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मिनीमाता जी से मेरी तीसरी और अंतिम मुलाकात  18 दिसंबर 1981 को ग्राम भाटापारा (राजनांदगाँव) के जयंती समारोह में हुई थी। उस समय मैं शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यलय दुर्ग का छात्र था और बी. ए. प्रथम वर्ष में पढ़ता था। उस दिन सुबह के दस बजे मैं सोमनी (गाँव) के बस स्टॉप पर खड़ा था। उसी समय एक एम्बैसडर कार आकर रुकी। कार में उस वक्त के दुर्ग जिले के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता स्व. श्री उदय राम वर्मा जी कुछ लोगों के साथ विराजमान थे। वे लोग भी जयंती समारोह में शरीक होने भाटापारा ही जा रहे थे। तब राजनांदगाँव जिला का निर्माण नहीं हुआ था और दुर्ग जिला के अंतर्गत था। वर्माजी के कार में बैठकर मैं भी भाटापारा पहुँचा।
ठीक 11 बजे एक जीप में मिनीमाता जी भूतपूर्व मंत्री श्री कन्हैयालाल कोसरिया जी के साथ भटापारा आई। बाजे-गाजे के साथ उनका सवागत करके उन्हें मंच तक लाया गया। उस दिन अपने उद्बोधन में मिनीमाता जी ने नारी शिक्षा एवं नारी जागृति पर जोर दिया। कुछ दिनों पूर्व ही माता जी विदेश यात्रा से लौटी थी। भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के साथ माता जी भी विदेश प्रवास पर गई थी। वहाँ के अनुभव सुनाते हुए उनहोंने कहा - विदेशों में नारियाँ अपने अधिकारों के प्रति बहुत जागरुक हैं। इसका कारण यह है कि वहाँ महिलाएँ शत प्रतिशत पढ़ी-लिखी होती हैं। आप लोग भी अपनी बेटियों को खूब पढ़ाओ-लिखाओ। खासकर सतनामी समाज की प्रत्येक बालिका को अनिवार्य रूप से स्कूल भेजना होगा।''
भाटापारा का जयंती समारोह लगभग तीन बजे समाप्त हुआ। वर्माजी भाटापारा से ही दुर्ग लौट आये। इसलिये मैंने माता जी और श्री कन्हैयालाल कोसरिया जी को अपना परिचय दिया। श्री कोसरिया जी मेरे ज्येष्ठ पिता जी और चाचा जी को अच्छी तरह जानते पहचानते रहे हैं। परिचय के बाद मैंने उनके साथ रायपुरा गाँव जाने की इच्छा व्यक्त की। अत: उन दोनो ने ही प्रसन्नता पूर्वक मुझे रायपुरा (डौण्डी लोहारा) के जयंती कार्यक्रम में चलने को कहा। मैं तो तैयार था ही। साढ़े तीन बजे के आस-पास हमने माता जी के साथ भाटापारा से प्रस्थान किया। चार बजे हम लोग नंदई चौक राजनांदगाँव पहुँचे। माता जी और कोसरिया जी ने वहाँ भी लगभग एक घंटे का समय दिया। राजनांदगाँव से हम लोग सवा पाँच बजे रवाना हुए और सात बजे के आस-पास रायपुरा गाँव पहुँच गये। वहाँ काफी संख्या में लेग बाग माता ही का इंतिजार कर रहे थे। उनमें काफी संख्या में महिलाएँ भी थी। रात के सात-आठ बज रहे थे फिर भी अच्छी भीड़ थी। वह दिन मेरे लिये अविस्मरणीय हे। रायपुरा गाँव में उस दिन मेले जैसा दृष्य उपस्थित था। यही वह स्थान था जहाँ ममतामयी मिनीमाता जी के विचारों को, उनकी वाणी को सुनने का अंतिम बार   मुझे अवसर मिला था। उस सभा में भी उन्होंने अपनी विदेश यात्रा के संस्मरण सुनाते हुए महिला जागृति और महिला शिक्षा पर जोर दिया था। उन्होंने कहा - बालिकाओं को हर हालत में स्कूल भेजो और उन्हें भरपूर शिक्षा दिलाओ। इसी में आपका परिवार और सतनामी समाज का सही कल्याण हो सकता है।'' कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् माता जी और कोसरिया जी लौट गये। मैं रायपुरा में रुक गया। प्रात: सामाजिक बंधुओं से मेल मुलाकात हुई। उस समय के प्रतिभाशाली एवं होनहार युवक श्री यू. डी. बघेल के आग्रह पर मैं उनके गाँव गारका चला गया।
जनवरी 1972 में मैं शासकीय सेवा में आ गया था। मैं प्राथमिक शाला जंतर (कोकपुर) में शिक्षक के पद पर पदस्थ था। 11 अगस्त 1972 की सुबह ड्यूटी में जाने के लिये राजनांदगाँव के बस स्टैण्ड परपहुँचा। वहाँ जगह-जगह चार-पाँच के झुण्ड में खड़े होकर लोग कुछ गंभीर बात कर रहे थे। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि आज लोग इस तरह खड़े होकर बातें क्यों कर रहे हैं। समय काटने के लिये मैंने एक अखबार खरीद लिया। अखबार के मुख पृष्ठ के हेडजाइन को देखकर मैं स्तब्ध रह गया। उसमें मोटे अक्षरों में लिखा था - वायुयान दुर्घटना में सांसद मिनीमाता का निधन। नीचे दुर्घटना का विस्तृत ब्यौरा दर्ज था। मेरा हृदय शोक और दुख से भर गया। माता जी की मृत्यु पर केवल सतनामी समाज ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ शोक संतप्त हो उठा था।
माता जी के दशगात्र के दिन प्रत्येक गाँव में जहाँ सतनामी समाज निवास करते हैं, उनके द्वारा सामूहिक भोज का आयोजन किया गया। परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु पर दशगात्र के दिन जिस तरह का क्रियाकर्म सम्पन्न किया जाता है ठीक वैसा ही क्रियाकर्म माता जी के दशगात्र के दिन गाँव-गाँव में सम्पन्न किया गया। उसी दिन जाना कि सतनामी समाज अपने रहनुमाओं का कितना सम्मान करता है। जो लोग सतनामी समाज के हित में नि:स्वार्थ भाव से काम करते हैं, सतनामियों की एकता, समृद्धि और प्रतिष्ठा को बढ़ाने में अपना खून पसीना बहाते हैं, सतनामियों के दुखदर्द को ईमानदारी से दूर करने का प्रयास करते हैं, उन्हें सतनामी समाज अपने हृदय में बैठा लेता है और उन्हें भरपूर आदर और सम्मान देता है। मिनी माता के दशगात्र के दिन यह तथ्य स्पष्टत: उभर कर सामने आया। उस दिन एक और अच्छा काम यह हुआ कि जिन लोगों को किसी कारणवश समाज से छोड़ दिया गया था अथवा बहिस्कार कर दिया गया था, उन्हें भी बिना शर्त के माता जी के मृत्युभोज में शामिल कर लिया गया।
इस तरह ममतामयी मिनीमाता जी अपने जीवन भर सतनामियों की एकता के लिए प्रयास करती रहीं। विभिन्न समस्याओं को हल करने में जुटी रहीं; वहीं अपने मृत्यु के बाद सतलोकवासी होकर भी सतनामी समाज को एकता की सूत्र में बांध दिया।
धन्य है सतनामी समाज और धन्य है ममतामयी मिनीमाता जी।
  • ग्राम - फरहद ,पों. - सोमनी, जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)

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