इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

सोमवार, 15 जुलाई 2013

अफसोस



- मनोज आजि़ज  -
पढाई -लिखाई ख़त्म होते ही राघव गाँव- घर छोड़ कर, किसी काम की तलाश में शहर में ही रहने लगा।
रांची- धनबाद घूम कर जब राघव कोई अच्छी  नौकरी नहीं पा सका तो गुजरात जा कर ठीकेदारी का काम ही करने को उतारू हो गया । वह चला भी गया और दो-तीन सालों में अच्छी -खासी पूंजी जमा कर लिया।
अब गाँव आने पर उसके इत्र- पावडर के इस्तेमाल  से पूरा गाँव जान जाता था की राघव घर से निकला है।
माँ- बाप बेटे की शादी के लिए कई जगह लड़की भी देखने लगे । इस मुद्दे पर बेटे की हां भी नहीं और न भी नहीं। गुजरात में रहने के वक्त फोन से माँ - बाप से बातचीत कर लिया करता था। उन्हें अगर कोई जरुरत पड़े तो फौरन पैसे भेज दिए जाते। गाँव के हर किसी की नजर में राघव एक होनहार लड़का था ।
एक जगह लड़की पसंद आने पर राघव को फोन से खबर की गयी। एक हफ्ते में राघव की चिठ्ठी आयी। राघव जो कल तक हर बात पर फोन करता था अब अचानक चिठ्ठी भेजने पर माँ - बाप सकते में। पिता ने काफी मसक्कत कर चिठ्ठी पढ़ी ।
माँ एक तरफ बेटे की चिठ्ठी की बात सुनने के लिए घर के बाहर झाड़ी में खाने के लिए लिया गया अन्न को फेंकते हुए थोड़ी सी पानी से ही हाथ धोकर घर के अन्दर आ बैठी। तब तक चिठ्ठी पढ़ी जा चुकी थी और राघव के पिता उस कागज के टुकड़े को बेरहमी से मोड़ कर कटे हुए पुआल के ढेर की ओर फेंक दिया। फिर कहने लगे..  हमारा बाबू, बेटा बाप हुआ है। और श्वसुर का नौकरी करता है। समझी न! घर-जमाई!
तुम भी जानती होगी .. आशा में मरता किसान और ध्यान में मरता जोगी। अच्छा ही हुआ कि  जमीन अभी तक बेचा नहीं ।
ऐसा कह कर राघव के पिता खटिया लेकर आंगन में जाकर लेट गए और रिसते हुए आँखों को अपने दाहिने हाथ से ढके रहे । माँ भी सर झुका, पल्लू को भिंगोती रही।
  • पता. आदित्यपुर .2,जमशेदपुर .14

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