इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

अंधा बांटे रेवड़ी, आप आप को देय

अंधा बांटे रेवड़ी, आप - आप को देय , इस कहावत को च रिताथर् करने छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग तुला हुआ है. गत दिनों छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग द्वारा राजधानी राय पुर में सम्मान काय र्क्रम आयोजित कर छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए उत्कृ ý काय र् करने वालों को सम्मानित किया जाना था मगर आयोजित काय र्क्रम में जिन पन्द्रह साहित्य कारों को सम्मानित किया गया, उनमें से तीन - चार साहित्य कारों को छोड़ दिया जाये तो बाकी वे साहित्य कार हैं जिनका छत्तीसगढ़ी साहित्य  से कोई लेना - देना नहीं,या यूं कहा जाये तो अधिक उपयुति होगा कि ये पूवर् में छत्तीसगढ़ी विरोधी भी रहे.
य ह समझ से परे है कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग द्वारा इतना बड़ा काय र्क्रम आयोजित किया गया और राजनांदगांव के साहित्य कारों को नकार दिया गया. ऐसा यिों ? यिा छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्य क्ष / सचि व को इतना भी ज्ञान नहीं कि छत्तीसगढ़ को साहित्य  के क्षेत्र में शिखर तक पहुंचाने में राजनांदगांव के  पदुमलाल पुÛालाल बख्शी, गजानंद माधव मुिितबोध, डाँ. बल्देव प्रसाद मिश्र, कुंजबिहारी च ौबे का महत्ती योगदान रहा. बावजूद राजनांदगांव के साहित्य कारों को यिों किनारा कर दिया गया.
य हां य ह बताना गैरवाजिब नहीं होगा कि जब छत्तीसगढ़ राज्य  बना भी नहीं था तब राजनांदगांव जिले के अनेक साहित्य कारों ने छत्तीसगढ़ी में काय र् किये. जिनमें एक नाम ग्राम भंडारपुर (करेला) निवासी नूतन प्रसाद भी है. इन्होंने  छत्तीसगढ़ी में 465 पृý का गरीबा महाकाव्य  लिखा. जिसका प्रथम संस्करण का प्रकाशन वषर् 1996 में किया गया. मजेदार बात तो य ह है कि इस महाकाव्य  में छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्य क्ष श्यामलाल च तुवेर्दी की रच ना जब आइस करिया बादर पृ. क्र. 423 में छपी है. यिा किसी ने छत्तीसगढ़ राज्य  बनने के पूवर् ही छत्तीसगढ़ी में महाकाव्य  लिखा है, इसकी भी जानकारी आयोग के अध्य क्ष / सचि व को नहीं है ? या फिर जानबूझ कर ऐसी प्रतिभाओं को दरकिनार करने के साथ उन लोगों को सामने लाने का सुनियोजित षड़यंत्र रचा जा रहा है जो छत्तीसगढ़ी में लिखना तो यिा, छत्तीसगढ़ी बोलना भी अपनी गरिमा के विरूद्ध समझते हैं. जिन साहित्य कारों को सम्मानित किया गया उनमें कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दजार् मिलने के पूवर् छत्तीसगढ़ी से परहेज करते रहे हो और जैसे ही छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दजार् मिलने की सुगबुगाहट हुई हो इनमें व्य िितगत लाभ के लिए छत्तीसगढ़ी के प्रति मोह जाग उठा हो.
छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्य क्ष श्यामलाल च तुवेर्दी को यिा य ह भी जानकारी नहीं कि उन्हीं के नगर से छत्तीसगढ़ी में लोकाक्षर पत्रिका निकलती है ? लगभग 12 वषोY से प्रकाशित लोकाक्षर राज्य  का एक मात्र ऐसी पत्रिका है जो छत्तीसगढ़ी में प्रकाशित हो रही है, बावजूद इस पत्रिका के संपादक नंदकिशोर तिवारी को यिों सम्मान के लाय क नहीं समझा गया ?
छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्य क्ष / सचि व को चाहिए कि वे मौकापरस्तों से दूरी बनाय  और ऐसे साहित्य कारों की खोज - खबर ले जो छत्तीसगढ़ राज्य  बनने के पूवर् से ही छत्तीसगढ़ी में लेखन काय र् कर रहे हैं. इस दिशा में प्रदेश के मुख्य मंत्री डाँ. रमनसिंह एवं संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को भी विशेष ध्यान देने की आवश्य कता है ताकि छत्तीसगढ़ी समृद्ध भाषा बन सके ।  

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