इस अंक में :

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शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

भाड़े का मकान


-  डॉ. रामचन्द्र यादव -
- हाँ - हाँ बोल रहा हूं। बताओं समीर, ठीक तो हो ? कुशल क्षेम जानने की खातिर मैंने फोन जल्दी उठा लिया। सोचा क्या बात है इतना सबेरे ऐसी कौन सी अनहोनी हो गयी कि उसे मेरी नींत का ख्याल किये बगैर बार - बार फोन करना पड़ा। कुछ रूककर कुछ सहमते हुए समीर ने चुप्पी तोड़ी और उदासीन भाव से अपनी समस्या रखी। कहा - भैया, मकान मालिक आये हैं। वह कह रहे हैं कि फरवरी महीने से मकान का भाड़ा बढ़ेगा। कोई उपाय नहीं है। महँगाई आसमान छू रही है। आम आदमी की थाली से दाल, सब्जी और प्याज पहले ही नदारत है। मकान, जमीन और फ्लैट के दाम पटना में दस गुणा बढ़ गये हैं। पैंतीस से चालीस लाख रूपये में एक छोटा सा फ्लैट भी नहीं मिलेगा। जिस जमीन का मूल्य कुछ दिन पहले दस लाख रूपये प्रति कट्ठा था, उसका भाव बढ़कर पचास लाख रूपए प्रति कट्ठा हो गया है। ऐसी स्थिति में मकान भाड़ा बढ़ाना स्वाभाविक है।
- कितना भाढ़ा बढ़ेगा ? पाँच फीसदी से दस फीसदी तक, यही न ? मैंने घबड़ा कर पूछा।
- नहीं भैया,पहले से दो गुना अधिक यानि पहले चार हजार लगते थे अब सीधे आठ हजार पर अड़े हुए हैं। समीर ने बताया।
- लेकिन कारण तो बताओ, भाड़े में एकाएक उछाल कैसे आया ? मैंने फिर मारामारी के बारे में जानना चाहा।
असल में इधर के दिनों में गलत तरीके से उगाये कालेधन के प्रभाव ने जमीन, मकान और सोने - चाँदी के भाव में तेजी ला दी और इस तरह आम आदमी को अस्त - व्यस्त कर दिया। सरकार देखती रह गयी। वह अचंभे में पड़ी हुई है कि लाख सरकारी यतन के बावजूद भ्रष्ट सरकारी अधिकारी गलत धन समेटने में गुरेज नहीं करते। उन पर सरकार का नियंत्रण नहीं। ये तो उल्टे बेलगाम घोड़े की तरह लम्बी - लम्बी टाप से  गरीबो को ही रौंदते है। दो - चार रुपये के जुर्म में उनको जेल के भीतर डाल देते हैं और सरकारी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार रोकने की बात कह दी जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि बड़े - बड़े मगरमच्छ कभी नहीं पकड़े जाते उल्टे उनको ऊँची जगह देकर पुरस्कृत किया जाता है। इस तरह सत्ता में जाकर वे गरीब और बेबस लोगों की सुविधा भी छीन लेते हैं।
इस तरह राजधानी पटना तो लग रहा है, बेईमान, भ्रष्ट ऑफिसरों की गिरफ्त में आ गया है। इसके नब्बे फीसदी रकबे पर इनका कब्जा हो चुका है। आजादी के इतने दिनों बाद भी इन हुक्मरानों के प्रभाव को हम कम नहीं कर सके। दुर्भाग्य वश ये मनुवादी चेतना से बुरी तरह ग्रसित हैं और इस संकीर्ण चेतना को ही अपना हथियार बनाकर पिछड़ी चेतना के लोगों को जमीन मकान से वंचित कर दूसरे प्रांतों में जाने विवश करते हैं। जो पटने में रहकर अपना भविष्य आजमाना चाहते हैं, परिवार के बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए ये कड़ी चुनौतियाँ जान लेवा साबित हो रही है।
- तो क्या तुम्हारे मकान मालिक ने एक बार जो बोली लगाई वहीं कानून हो गया। कहने - सुनने या पैरवी - पैगाम भिड़ाने से भी वे पसीजने वाले नहीं हैं ? मैंने भाड़े में मोलभाव की नियत से समीर से बात आगे बढ़ाने को कहा।
- भाई साहब, मकान मालिक पर निशाना साधते हुए, समस्या की गम्भीरता को रखते हुए कहा - इन मकान वालों को पैसे का प्रभाव मालूम है। रूपचन्द्र के आगे आज के कलिकाल में कुछ भी नहीं है। वे समझते हैं कि उनके बाजार में जो ऊँची से ऊँची बोली लगायेगा, वही मकान लेगा। बिना मकान, बिना जमीन और बिना पैसा तो मनुष्य, मनुष्य नहीं, जानवर है। ऐसे में उनसे कोई चिरौरी करना, अपनी मर्यादा को खोने से अधिक नहीं है। वे समझते हैं कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में तो पहली पायदान पर तो मनुवादी ही विराजमान है। सत्ता उन्हीं के पास है और इस कारण पैसे और प्रतिष्ठा भी तो उन्हीं की जागीर लगती है। बाकि तो विवश और बेजमीन होकर कीड़े - मकोड़े की तरह ही धरती पर रेंग रहे है। इस जिल्लत भरी जिन्दगी से हम सब अभी तक उबर नहीं पाये है।
- क्यों पटना में इस मकान के अतिरिक्त तुम दूसरे मकान नहीं खोज सकते ? मैंने समाधान रूप में यह उपाय सुझाते हुए समीर की राय जाननी चाही।
समीर ने मकान मालिकों की चालबाजी पर व्यंग्य कसते हुए मुझसे कहा - ये सब के सब मिले हुए हैं, भैया। कहीं भी जाओ, कहेंगे जगह नहीं है। कितने कमरे चाहिए ? क्या नाम है ? कहाँ के रहने वाले हैं ? परिवार लेकर रहेंगे या अकेले ? कौन जात है ? हिन्दू हैं या मुसलमान, अगड़ी - पिछड़ी ? अत्यन्त पिछड़ी या महादलित ? मतलब साफ है अगर आप मनुवादी सोच के नहीं हैं तो आपको मकान नहीं मिलेगा। पिछड़ों और शुद्रों के हवाले वे मकान नहीं देना चाहते। आज कुछ भी देने को तैयार हैं, वे मर जाना पसंद करेंगे लेकिन अपने मकान को आपके जिम्मे देकर नरक नहीं बनने देंगे।
राजधानी में बसने वाले बाबुओं की इस सिकुड़ी हुई मानसिकता पर मैं पहले विश्वास नहीं करता था। मैं समझ बैठा था कि ये लोग ज्ञानी हैं। समाज की अगली पंक्ति में रहकर भी ये सभी छोटे - बड़ों को साथ लेकर चलते हैं। इनके सम्पर्क में रहकर पत्थर भी सोना हो जायेगा। लेकिन मेरे विश्वास के विपरीत सब ढांक के तीन पांत ही साबित हुए।
- क्या कहना चाहते हो समीर ? जरा खुलकर तो बोलो। लगता है पटना में रहना आसान नहीं है।
- हाँ, अब हम सबों के लिए दिल्ली ही नहीं, पटना भी दूर होता दिखाई दे रहा है। मेरी आप बीती सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे। तो सुनिये मेरे दस वर्ष कैसे बीते पटना में - मधेपुरा से बी. एस. सी. ऑनर्स की डिग्री पाकर मैंने पटना की ओर रूख किया। मैं वहाँ रहकर ऊँची से ऊँची शिक्षा लेना चाहता था। मेरे पिताजी तब तक कॉलेज की सेवा से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। पेंशन के रूप में पूरे का आधा ही मिलता था। इतने में खर्चा चलाना दुश्वार लग रहा था। मैंने सोचा पढ़ने के साथ - साथ कमाई भी करनी होगी। कम्प्यूटर के क्षेत्र में काफी संभावना दिखाई दे रही थी। किसी बड़े संस्थान में प्रवेश पाना मेरे लिये मुश्किल लग रहा था और हर हाल में मैं कम्प्यूटर पढ़ना चाहता था। किसी मित्र ने इग्नू से पत्राचार कोर्स कर लेने की सलाह दी। सोचा पैसे का जुगार तो करना ही होगा। इस करण मैंने एक छोटा सा कम्प्यूटर शिक्षा संस्थान खोलने का मन बनाया।
अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए समीर ने अगली कड़ी के रूप में अपना सफरनामा सुनाना शुरू किया।
मैंने कम्प्यूटर शिक्षा केन्द्र के लिए मकान खोजना शुरू किया। अपने भागीरथी प्रयास से एक छोटा सा मकान मिला। पाँच हजार रूपये प्रति माह। कमरे के नाम पर एक लम्बा सा पुराना हॉल तीसरी मंजिल पर। सीढ़ी ऐसी बेतरतीब कि चढ़ने उतरने में पूरे शरीर की नस चढ़ जाती थी। दिन भर ऊपर नीचे करने के बाद शाम में थकान ही था। लेकिन विवशता मनुष्य को बेबस कर देती है। मेरे पास इसे स्वीकार करने के सिवा और कोई उपाय नहीं था। मुझे अपनी योजना को कार्य रूप देने के लिए यह खंडहर लेना पड़ा।
- लेकिन फिर परिवार सहित अपने रहने के लिए भी तुम्हें दूसरा मकान खोजना पड़ा होगा ? मैंने समीर से स्नेह वश पूछा।
- हारे को हरिनाम भैया। दूसरा आवास खोजने के लिए तो हिमालय का धैर्य चाहिए। मैंने पटना के चप्पे - चप्पे में अपने रहने के लिए मकान ढूँढना आरंभ किया। खोजते - खोजत कंकड़बाग में गैस गोदाम के पास पहली मंजिल पर मकान मिला। दो रूम, भाड़ा पाँच हजार रूपये। मकान मालिक ने शर्तें लगायी। नौ बजे तक घर लौटना है। बिजली रात भर नहीं मिलेगी। पानी अपने और दो बच्चों के लिए उपलब्ध होगा। अपने माँ - बाप, भाई को छोड़कर और कोई घर में नहीं आयेगा। शर्त मान ली गई। छ: महीने बीतते - बीतते कहा जाने लगा कि मकान खाली होना चाहिए। क्यों ? भाड़ा कम देते हैं और आदमी दिन रात आता रहता है। अगर एक महीने के अंदर मकान खाली नहीं हुआ तो बोरा - बिस्तर सहित सामान सड़क पर फेंक दिये जायेंगे। पटना में तो मेरा कोई था नहीं। मैंने दूसरा मकान देखना शुरू किया। एक बंगाली मोसाय ने मुझे रखना स्वीकार कर लिया। जगह होगी नीचे में जहाँ बरसात में कमरे में पानी आ सकता है। लेकिन इसी सीलन भरे कमरे का भाड़ा थोड़ा सस्ता था। लेकिन मेरे संस्थान के नजदीक था। इस अंधेरे कमरे में भी रहना मेरी मजबूरी थी। एक साल ही बीतते ही बंगाली बाबू ने भी मकान छोड़ने का फरमान दे दिया। मैंने विनम्रता पूर्वक इस मकान में रहने का निवेदन किया। लेकिन मेरे प्रति बिना किसी स्नेह सहानुभूति के उन्होंने संवेदनशून्यता ही दिखाई। यह मेरे लिये कोई नयी बात नहीं थी। धन, मकान होने पर तो संवेदना मर जाती है और आदमी कम से कम आदमी तो नहीं रह जाता है। उन्होंने घर खाली करने का सबब बताते हुए यह उद्घाटित किया- तुम्हारा मकान मधेपुरा है। बाप रे बाप, लोग कहते हैं रोम पोप का और ... वहाँ के एक नेता ने एक मोसाय के यहाँ पर घर कब्जा कर लिया। इसी डर से बाबा तुमको भी घर खाली करने के लिए कहा। मैं समझ गया और मैंने खाली कर दिया। पटना में एक समस्या और है  एक घर से दूसरे घर जाने के लिए भी कम से कम दस हजार और नये मकान मालिक को एक महीने का अग्रिम देना पड़ता है। मुझे लग रहा था मेरी जिन्दगी तो बंजारे की तरह हो गयी है, जो आज यहाँ तो कल वहाँ। अपने माल असबाब बीबी के साथ कपड़े के घर में सड़क किनारे प्रकृति की गोद में मस्त - मस्त रहता है। चलते - चलते अपने मिशन को दिल में संजोते हुए मैंने महेश नगर की राह ली। अपने मित्र के यहाँ नीचे जमीन पर एक कमरा मिला। जहाँ दिन में रहना मुश्किल लेकिन रात में मैं किसी तरह सो लेता था। कुछ दिनों बाद वहाँ से भी विदा लेना पड़ा। आज लगभग दो वर्ष बीतने लगे। तीन कमरे के मकान में अपने मित्र की बगल में रह रहा हूं। गर्दिश के दिन मुझे देखने पड़े। आज अपनी मेहनत से खून - पसीना एक कर दो जून की रोटी ही जुटा पाता हूं। इतनी कम आमदनी में न माँ - बाप और न भाई को कुछ दे पाता हूं। कम से कम साफ सुथरा रहने की कोशिश करता हूं। इस फ्लैट में सोलह परिवार रहते हैं। सबों ने मकान खरीद लिया है। ये लोग सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से सबल हैं। मैं तो भाड़े पर रहता हूं। मेरा यहाँ और इस तरह रहना, मेहनत की रोटी खाकर राजधानी में मर्यादा पूर्वक जीना भी इनको पच नहीं पाता है।
- तो ये लोग क्या चाहते हैं ? मैंने बीच ही में टोका। समीर ने अपनी आत्मकथा का अन्तिम पन्ना खोलते हुए यह कहना मुनासिब समझा - भैया, ये लोग भाड़ेदार को रैयत समझते हैं। जिस तरह जमींदार अपनी जमीन छोटे किसानों को पट्ठा पर देते हैं और मनमानी लगान वसूलते हैं। ऐसा न करने पर जमीन वापस छीन लेते हैं। उसी प्रकार मकान मालिक भाड़ेदार को अपने पांव तले की धूल समझते हैं। जो मुँह से निकला, वही मकान भाड़ा तय। बीच में न कोई पंचायत न कोई सरकारी नियंत्रण। इस मनमानी के विरोध में न कोई संगठन आगे आता है और न ही कोई शासन। तो इन बेलगाम घोड़ों को वश में करने का क्या उपाय हो सकता है ? मैंने समीर से निष्कर्ष रूप में पूछा।
- पटना में रहने को अपना घर नहीं है। दूसरा सस्ता घर तलाश रहा हूं। बच्चों को पढ़ाना है। हम सब भाई मिलकर भाड़े के इस बोझ को कम करेंगे लेकिन मगरमच्छों को सबक सिखाने के लिए तो व्यवस्था बदलनी होगी ताकि इनके अकूत और अवैध धन पर लगाम कसी जा सके।
  • पता - सुखासन, मधेपुरा, बिहार

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