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सोमवार, 15 जुलाई 2013

सप्पा काका



- डां. रामशंकर चंचल -
करडावद वनवासी आंचल झाबुआ का एक बहुत छोटा गाँव है। जहाँ 20-25 झोपड़ियों में निवास करते हैं कई सह्दय ग्रामीण परिवार। यह आसपास बसे गाँवों में सबसे छोटा किन्तु सबसे प्यारा - न्यारा गाँव है। साफ - सुथरा,विशाल पेड़ों की बस्ती से हरा - भरा, सभी गाँव से अलग। पर्यावरण की दृष्टि से सभी गाँवों से सम्पन्न खुशहाल। जबकि करड़ावद से ही लगे आसपास के गाँवों में आज गिनती के पेड़ नजर आते हैं। कहते हैं - इन गाँवों के ग्रामीणों ने चूल्हा जलाने और समीप शहरों में लकड़िया बेच नमक मिर्च खरीदने में इन जंगलों को उजाड़ रेगिस्तान बना दिया है।
किन्तु करडावद में आज भी गाँव की उम्र के बूढ़े पेड़ नजर आते हैं। जहाँ बूढ़े पेड़ों को देखने का अजीब सूख - सुकून है वही अनेकानेक जवान लहलहाते खूबसूरत पेड़ों की मस्ती का आनंद भी। इस खूबसूरती और हरियाली का कारण और कोई नहीं गाँव के अस्सी वर्षीय बुजुर्ग सप्पा काका थे जिन्हें पेड़ों से बेहद लगाव है। गाँव में उनके रहते किसकी ताकत कोई पेड़ों को काटे।
सप्पा काका का मकान गाँव के बीचोंबीच प्राथमिक शाला के पास ही था। इस प्राथमिक शाला में शान्दला नगर से प्रतिदिन शिक्षक रामदास शर्मा गाँव के बच्चों को पढ़ाने आते थे। शिक्षक रामदासजी बीस वर्षों से इसी गाँव में शिक्षक है। इस बीस वर्षों मेंं उन्होंने देखा कि सप्पा काका हर बारिश में दो पौधे लगाते और उनकी सुरक्षा देखभाल भी वह तब तक करते रहते जब तक पेड़ बन लहलहाने न लगे। प्रतिदिन हैंडपम्प से दो तीन बाल्टी पानी देना, उन्हें निहारना और उनके बढ़ने पर प्रसन्न होना। यह सब उनकी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा था। रामदासजी को सप्पा काका का पेड़ों के प्रति यह प्रेम, समर्पण बहुत ही अच्छा लगता। पेड़ों के प्रति यह प्रेम - लगाव यहीं तक सीमित नहीं था बल्कि गाँव में भी सभी को वह पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करते। उनके न लगाने पर वो नाराज तो नहीं होते किन्तु गाँव के किसी भी व्यक्ति के पेड़ काटने का आभास भी हो जाता तो उसे कानून की धमकी दे डरा देते। यही कारण था कि गाँव का कोई व्यक्ति कभी पेड़ काटने की सोचता भी नहीं था।
यही सब देख सुन रामदासजी के मन में विचार आया कि आखिर यह अज्ञान अशिक्षित बुजुर्ग क्यों पेड़ लगाता है? किसने इसको पेड़ों के महत्व को बताया? इसी जिज्ञासा को लेकर एक दिन रामदासजी सप्पा काका के पास गये तब वो पेड़ों को पानी पिलाने के लिये बाल्टी ले हैण्डपम्प पर पानी भर रहे थे। सप्पा काका ने रोज की तरह रामदासजी को राम - राम कहा। रामदासजी ने भी राम - राम का उत्तर राम - राम में दिया और बोले - सप्पा काका, मैं सालों से देख रहा हूं, आप कभी पेड़ों को पानी पिलाने से नहीं चूकते। इसके पहले रामदासजी बोलते, सप्पा काका तुरन्त बोल पड़े - पाणी नी भाला तो मरी जाय। रामदासजी को पेड़ों के प्रति सप्पा काका की इस गहन चिन्ता ने प्रभावित किया। उन्होंने दूसरा प्रश्न सप्पा काका से कर डाला - तुम्हें ये पेड़ लगाने को किसने कहा? पेड़ लगाने से क्या होगा? सप्पा काका मुस्काये बोले - भीली में टूटी फूटी हिन्दी का प्रयोग करते जितना वो जानते थे। तम्म तुम जो पूछ रहे हूं मैं भी एक दाड़ा दिन किसी से पूछा जब हूं जुवानथो जवान था। काम काम पर मजदूरी पर उज्जैन गंलां गया था त्यों वह अधिकारी चोंकमा आंगन में पेड़ लगा रहा था, त्यों वह बोला- पेड़ ही अण्णने अपने को जीवन आले देता है त भी तादा तेदे गामंमा गांव में बे दो पेड़ हर वरस वर्ष लगावजे लगाना।
रामदासजी को इसी साल में बीस वर्ष हो गये थे बहुत कुछ वो इनकी भाषा से परिचित थे। वो समझ गये थे कि सप्पा काका जब जवान थे तब मजदूरी करने उज्जैन शहर गये थे वहां जिस अधिकारी के यहां काम करते थे, उसने उन्हें पेड़ ही जीवन है बताते हुए उन्हें भी अपने गाँव में दो पेड़ हर बर्ष लगाने को प्रेरित किया था। सप्पा काका के अज्ञान मस्तिक में ज्ञान की यह महत्वपूर्ण बात बैठ गईथी कि पेड़ रहेंगे तो हम रहेंगे। उसी का सुखद परिणाम था कि करड़ावद की रौनक, हरियाली, खुशहाली और समृद्धि। रामदासजी ने सप्पा काका की सराहना करते उन्हें पेड़ों के महत्व पर और अनेक बातें उनकी भाषा में समझाई। सप्पा काका उस दिन ज्यादा खुश थे कि गाँव के गुरुजी ने उनके कार्य की प्रशंसा की और वो जो कार्य कर रहें हैं वो बहुत पुण्य का पावन और अच्छा कर्म है। सप्पा काका अब पहले से ज्यादा उत्साहित हो वृक्षारोपण कार्य में लग गये। वे गाँव वालों को भी कहते कि गाँव के गुरुजी रामदासजी भी बहुत खुश है, उनके पेड़ लगाने से। ताकि गांव के लोग उनकी सुने। बीस वर्ष की उम्र से ही गांव में हर वर्ष दो पौधे लगा पेड़ बनने तक उसकी सेवा करने वाले करडावद को पर्यावरण की दृष्टि से बेहद सुखी सम्पन्न करने वाले अकेले सप्पा काका आज 80 वर्ष की उम्र में भी इस बारिश में दो पेड़ इस बार स्कूल आंगन में लगाये। पेड़ लगाने के बाद दूसरे दिन सप्पा काका पानी डालने नहीं आए तो रामदासजी ने सोचा शायद किसी अन्य काम में व्यस्त होगे आज। यह सोच रामदासजी ने स्कूल की बाल्टी से पानी भर उन पौधों में पानी डाल दिया। किन्तु जब तीसरे दिन भी उन्हें सप्पा काका नहीं दिखे तो उन्होंने पौधों को पानी तो पिला दिया किन्तु उनका मन नहीं माना। सोचा जरुर सप्पा काका की तबीयत ज्यादा खराब होगी। वो सप्पा काका की झोपड़ी जा पहुंचे। सप्पा काका ने जब झोपड़ी के भीतर खटियां में लेटे - लेटे आंगन में रामदासजी को देखा तो खटिया से खड़े होने का प्रयास किया। किन्तु वो खड़े न हो सके। रामदासजी ने देख लिया था। सप्पा काका का उठने का प्रयास। वो तुरन्त झोपड़ी के भीतर जा सप्पा काका की खटिया के सिरहाने बैठ गये। उन्होंने सप्पा काका का हाथ पकड़ देखा - उन्हें बहुत ही तेज बुखार था। यह देख  रामदासजी घबरा गये। सोचने लगे - इतने तेज बुखार में सप्पा काका कैसे जिन्दा है। उन्होंने सप्पा काका को ध्यान से देखा और कुछ कहने वाले ही थे कि सप्पा काका ने ध्यान से रामदास जी को निहारते धीरे से होठ हिला - राम - राम। बस उसके बाद वो हमेशा के लिए चीरनिन्द्रा में सो गये। सप्पा काका को दोनों पुत्र, बहू - बच्चे सब देखते रह गये। पत्नी झीतरी तो अभी एक वर्ष पूर्व ही शांत हो गई थी। उसके बाद से सप्पा काका कुछ उदास भी रहने लगे थे। शायद भीतर ही भीतर टूट गये थे। सबको और स्वयं रामदासजी को भी ऐसा लगा जैसे उनको राम - राम कहने के लिये ही उनके प्राण अटके हुए थे। रामदासजी भी आज सप्पा काका को, गाँव वालों के साथ मिलकर अग्नि देने के बाद बहुत भारी मन से घर गये।
दूसरे दिन रामदासजी स्कूल आये किन्तु उनका मन पढ़ाने को बिल्कुल नहीं हुआ। दिन भर स्कूल में वो बच्चों से सप्पा काका के मधुर व्यवहार, प्रसन्नचित चेहरा, उनके परिश्रम, सीधा जीवन, सादा खाना नियमित जीवन और प्रकृति के प्रति पेड़ों के प्रति अटूट आस्था, प्रेम की बात बता बच्चों को प्रेरित करते रहे। उन्होंने कक्षा 5 वीं में पढ़ रहे सप्पा काका के पोते राजू को पास बुलाया और समझाते हुए बोले - तुम्हारे दादाजी पेड़ों से बहुत प्रेम करते थे। उन्होंने अपने जीवन में सैकड़ों पौधे लगाये, उन्हें बड़ा किया। आज जो तुम गाँव के वृक्ष देख रहे हो इनमें आधे वृक्ष तो तुम्हारे दादाजी ने ही लगाये है। स्कूल के आंगन में लगे दोनों पेड़ तुम्हें पता है अभी तीन दिन पहले ही उन्होंने लगाये थे। तुम इनकी रक्षा करना, इन्हें पानी देना और हो सके तो तुम्हारे दादाजी के इस महान पावन कर्म को तुम आगे जारी रखना। ऐसा है राजू, ये पेड़  ही है जिसके कारण हमारा जीवन है। तुमने पढ़ा है - तुम्हारी पर्यावरण की किताब में कि पेड़ों से कितने लाभ है? राजू ने तुरन्त कहा- हा सर, मुझे पता है। मैं भी दादाजी की तरह ही पेड़ लगाऊंगा और उनकी सुरक्षा भी करुंगा। रामदासजी ने राजू की पीठ थपथपाते हुए उसे शाबासी दी - मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। चलो, आज तुम सभी की छुट्टी।
सभी बच्चे बस्ता ले चल दिये। राजू अपने साथी मित्र मंगलसिंह को लेकर हैण्डपम्प पर बाल्टी लेकर पहुंच गया। गुरुजी स्कूल के सभी कमरों को ताला लगा, घर जाने को पाठशाला की सीढ़ियों से उतर रहे थे तो देखा - राजू पौधों को पानी पिला रहा है और मंगलसिंह पौधों के आसपास काटा की बागड़ लगा रहा है ताकि कोई पशु उन पौधों को खा न पाय।
रामदासजी के चेहरे पर सुकून आया। सोचने लगे - आदमी चला जाता है किन्तु उसके अच्छे कर्म, अच्छे कार्य सदैव अमर हो सभी  को प्रेरित करते हैं और उसकी याद को जीवित भी रखते हैं। यही सोचते - सोचते उनकी नजर सप्पा काका की झोपड़ी के पास लगे उस आम पेड़ के नीचे गई जहां सप्पा काका बैठे रहते थे। और रोज हाथ हिला रामदासजी को विदा करते थे। पर आज सप्पा काका नहीं थे। रामदासजी ने अनायास हाथ तो उठा दिया पर तुरन्त उदास हो धीरे से हाथ नीचे कर दिया। राजू दूर से यह सब देख रहा था। वह स्कूल परिसर से ही जोर से किन्तु प्रेम से बोला - सर, राम - राम।
रामदासजी ने मुस्काते हुए राम - राम कहा और चल दिए।
  • पता ' माँ ' 145, गोपाल कालोनी, झाबुआ, म.प्र.- 457661, मोबाईल : 9893194302,9893704913

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